Monday, 31 January 2022

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीतिक दर्शन में परस्पर संबंध पर टिप्पणी करो।

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीतिक दर्शन में परस्पर संबंध पर टिप्पणी करो।

अथवा राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण में राजनीतिक दर्शन का क्या महत्व है?

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीतिक दर्शन में संबंध 

राजनीतिक सिद्धांत को अन्य धारणाओं एवं विषयों में अलग किया जाना चाहिए। अधिकांश राजनीतिशास्त्री राजनीतिक दर्शन एवं राजनीतिक सिद्धांत को पर्याय समझते रहे हैं। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय राजदर्शन (political philosophy) है। अधिकांश राजदार्शनिक राजनीतिक दर्शन एवं राजनीतिक सिद्धांत को एक ही समझते आये हैं। आधुनिक दृष्टि से, ये दोनों पृथक्-पृथक् अवधारणाएँ हैं। राजदर्शन सामान्य दर्शन का एक भाग है तथा राजनीतिक विषय-सामग्री पर दार्शनिक दृष्टि से विचार करता है। उसकी धारणाएँ व्यापक, अमूर्त, व्यक्तिनिष्ठ तथा आनुभविकता से परे होती हैं। प्लेटो, रूसो, हीगल आदि के राजदर्शन इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। वह चिन्तन, कल्पना, अन्तर्प्रज्ञा अथवा अनुमान के आधार पर कतिपय शाश्वत सत्यों, स्वयंसिद्ध प्रमाणों और तथ्य तक पहुँच जाता है। इन निगमनात्मक रूप से प्राप्त निष्कर्षों के प्रकाश में राजदर्शन शेष राजनीति संस्थाओं, धारणाओं आदि को देखता है। वह व्यक्ति एवं संस्थाओं को उन तक ऊपर उठने का आग्रह, उपदेश या निर्देशन करता है। उसकी मान्यताओं एवं निष्कर्षों का जांचशील होना आवश्यक नहीं है। उसका क्षेत्र ‘आदर्शो' एवं 'चाहिए' (वनहीज) का है।

राजदर्शन की तुलना में आधुनिक राजसिद्धांत जगत की सम्पूर्णता या व्यापकता के बजाय केवल राजनीतिक पक्षों से सम्बन्ध रखता है। वह तथ्यों और घटनाओं के इन्द्रियजन्य ज्ञान पर आधारित होता है। उसकी प्रकृति व्याख्यात्मक, आगमनात्मक तथा तथ्यात्मक होती है। राजदर्शन के मूल्य, आदर्श आदि उसके लिए प्रस्तावनाओं (Propositions), परिकल्पनाओं या , प्राक्कल्पनाओं (hypotheses) आदि के रूप में कार्य कर व्यक्ति एवं संस्थाओं को उन तक ऊपर उठने का आग्रह, उपदेश या निर्देशन करता है। उसकी मान्यताओं एवं निष्कर्षों का जांचशील होना आवश्यक नहीं है। उसका क्षेत्र ‘आदर्शो' एवं 'चाहिए' (वनहीज) का है।

राजदर्शन की तुलना में आधुनिक राजसिद्धांत जगत की सम्पूर्णता या व्यापकता के बजाय केवल राजनीतिक पक्षों से सम्बन्ध रखता है। वह तथ्यों और घटनाओं के इन्द्रियजन्य ज्ञान पर आधारित होता है। उसकी प्रकृति व्याख्यात्मक, आगमनात्मक तथा तथ्यात्मक होती है। राजदर्शन के मूल्य, आदर्श आदि उसके लिए प्रस्तावनाओं (Propositions), परिकल्पनाओं या प्राक्कल्पनाओं (hypotheses) आदि के रूप में कार्य कर सकते हैं।

राजसिद्धांत और राजनीतिक विश्लेषण (political analysis) भी एक नहीं है। राजनीतिक विश्लेषण में व्याख्या नहीं की जाती। उसमें घटनाओं अथवा विचारों में तार्किक संगति, यथार्थ के साथ अनुकूलता, विवरणों की परस्पर सम्बद्धता, प्रयोजन और परिणामों में तालमेल आदि को देखा जाता है। इसी प्रकार राजनीतिक विचारवाद (ideology) भी राजसिद्धांत से भिन्न है। विचारवाद या विचारधारा में कतिपय मूल्यों एवं लक्ष्यों को श्रेष्ठ मानकर सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। उन्हें प्राप्त करने के लिए, सबको आन्दोलन एवं संगठन करने हेतु आमन्त्रिण किया जाता है। इसमें भी वैज्ञानिकता और वास्तविकता का दावा भी किया जाता है, परन्तु वस्तुतः वह 'वैज्ञानिक' नहीं होता। विचारवाद और राजसिद्धांत की प्रकृति क्रमशः राजनीति और राजविज्ञान जैसी है। निष्कर्ष यह है कि राजसिद्धांत को सीमित एवं विशेष अर्थों में ग्रहण किया जाता है।

सम्बंधित लेख :


SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: