अस्तित्ववाद से क्या अभिप्राय है ?

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अस्तित्ववाद से क्या अभिप्राय है ?

  1. अस्तित्ववाद पर एक निबंध लिखिए।
  2. अस्तित्ववाद के आधार बताइये।

अस्तित्ववाद का अर्थ : अस्तित्ववाद एक ऐसी विचारधारा है जो व्यक्ति को अपने अस्तित्व का बोध कराती है। मीहान के अनुसार, अस्तित्ववाद वैज्ञानिक, तानाशाही व्यवस्था, अवैयक्तिकरण तथा अन्धविश्वास के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है। एडवर्ड बर्न्स के अनुसार, अस्तित्ववाद, विचारों के दर्शन तथा वस्तुओं के दर्शन की पराकाष्ठाओं के विरुद्ध मानव दर्शन की प्रक्रिया है। अस्तित्ववाद का आग्रह वातावरण पर नहीं, व्यक्ति पर है। इसके अनुसार, वातावरण व्यक्ति को नहीं बनाता, व्यक्ति स्वयं अपने आपको बनाता है। अस्तित्ववाद की रुचि मनुष्य को समझने, उसकी व्याख्या करने, उसे संचार के समक्ष साहस के साथ खड़े होने का मार्ग तलाश करने में सहायता देने तथा उसके जीवन को जीने योग्य बनाने हेतु है।

अस्तित्ववाद अस्तित्व की प्राथमिकता अथवा सर्वोपारिता की पुष्टि करता है। अस्तित्ववादी की तत्त्वों, सम्भावनाओं, सारों तथा अमूर्त संकल्पनाओं में कोई रुचि नहीं होती, वह गणितज्ञ अथवा तर्कशास्त्र अथवा आध्यात्मिकी के व्यक्ति से बहुत दूर रहता है। उसका एकमात्र सम्बन्ध उस वस्तु से है जो उपस्थित है, बल्कि जो अस्तित्व के प्रमाण में है। अस्तित्व कोई विशेषता नहीं है, बल्कि सभी विशेषताओं की वास्तविकता है। सार्च के अनुसार, व्यक्ति वनस्पति अथवा गोभी का फल नहीं है, जिसका विकास सर्वथा वातावरण की स्थितियों के अनुसार होता है। उसके पास अपना मार्ग चुनने की क्षमता है। उसका अनुभव उसके स्वयं का अनुभव है, उसके कार्य उसके खद के कार्य हैं तथा अपना जीवन स्वयं जीकर तथा अपने मार्ग को स्वयं चुनकर वह अपने मूल्यों का निर्माण स्वयं करता है। वह अपने कार्यों हेतु स्वयं ही सम्पूर्ण रूप से उत्तरदायी है।

वस्तुतः अस्तित्ववाद में अनेक विचारधाराओं, रोमांसवाद, नाशवाद, संशयवाद तथा परिणामवाद का मिश्रण है। कभी-कभी यह मुक्तिदायिनी दर्शन होने का दावा करता है। यह निवास के अयोग्य जगत से बच निकलने की आवश्यकता पर विशेष बल देता है। स्वयं व्यक्ति द्वारा अपने सन्तोष हेतु सजन मूल्यों के अतिरिक्त अन्य सभी मूल्यों का निषेध करने के कारण इसे नाशवादी विचारधारा भी कहा जाता है। नैतिकता तथा धर्म के क्षेत्र में निरपेक्ष का खण्डन करने के कारण इसे सापेक्षवादी तथा संशयवादी विचारधारा भी माना जाता है।

संक्षेप में, अस्तित्ववादी विचारों का ध्येय स्वतन्त्रता को एक लक्ष्य की भाँति प्रतिष्ठित करना है तथा मनुष्य को कर्म की ओर प्रकृत करना है। अस्तित्ववादी विचाराकों का मत है कि राजनीतिशास्त्र पर चिन्तन निस्सार है। अस्तित्ववादी ने हीगल के दर्शनतन्त्र के विरोध स्वरूप एक प्रतिक्रिया के रूप में जन्म लिया था। अस्तित्ववादी दर्शन ने व्यक्ति को पुनः दार्शनिक चिन्तन का केन्द्र बिन्दु बना दिया। इसकी मान्यता यह है कि व्यक्ति के अस्तित्व, चेतना, अनुभव व भावनाएँ ही स्वयं व्यक्ति के लिए एक दर्शन हेतु महत्त्वपूर्ण विषय हैं। 

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