Sunday, 26 December 2021

जलियाँवाला हत्याकांड की घटना तथा उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।

जलियाँवाला हत्याकांड की घटना तथा उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।

Jallianwala Bagh Massacre in Hindi : इस लेख में हम आपको जलियांवाला बाग हत्याकांड कब और कहां हुआ था, जलियाँवाला हत्याकांड (1919) का भारतीय जनमानस पर पड़ने वाले प्रभाव तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय गवर्नर जनरल कौन था आदि बता रहे हैं।

जलियाँवाला हत्याकांड (Jallianwala Massacre)

(Jallianwala Massacre) ब्रिटिश शासन की भारतीयों के प्रति अत्याचार पूर्ण नीतियों के चलते एवं रौलेट एक्ट के विरूद्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा पंजाब के अमृतसर जिले के जालियाँवाला बाग नामक स्थान पर 13 अप्रैल. 1919 ई को बैसाखी के दिन एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हेतु एक सभा का आयोजन किया गया था। उस दिन अमृतसर में बहुत सारे गाँव वाले एक मेले में शिरकत करने के लिए जलियाँवाला बाग मैदान में जमा हुए थे। यह सभा पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को बिना वजह बताए गिरफ्तार किए जाने के विरोध में थी। परन्तु शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए जुटी भीड़ पर जनरल डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने अंधाधुंध गोलीबारी की जिसमें सैकड़ो लोग मारे गए थे। इस नरसंहार को भारतीय इतिहास के सबसे घातक हमलों में से एक के रूप में याद किया जाता है। बैसाखी पर्व खुशियों की जगह मातम में परिवर्तित हो गया था और अमृतसर की धरती रक्तरंजित हो गई थी। घटना में बच्चे, बूढे और औरतें सभी शामिल थे। बेकसूर लोग अपने प्राणों की भीख माँग रहे थे परन्तु जनरल डायर ने किसी पर भी दया नहीं दिखाई। उसने अपनी सेना को जलियाँवाला बाग में मौजूद सभी लोगों को मारने का आदेश दे दिया। गोलियों से बचने के लिए बहुत से लोगों ने बाग में स्थित एक कुएं में छलांग लगा दी थी। गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे। वहीं निकास का रास्ता संकरा होने की वजह से लोग भगदड़ में कुचले गए थे।

ब्रिटिश सरकार के आँकड़ें बताते हैं कि जलियाँवाला बाग नरसंहार में 375 लोग मारे गए थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनुसार, उस घटना में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे और लगभग दो हजार गोलियों से जख्मी हुए थे।

देश उस समय पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। लोगों को जश्न मनाने व सभाएं करने की अनुमति नहीं हुआ करती थी। पर्व के दिनों में ब्रिटिश सरकार कर्फ्यू लगा देती थी, ताकि लोग एकत्र न हो सकें। ब्रिटिश सरकार को इस बता का डर था कि अगर हिन्दुस्तानी एक हो गए तो उनके लिए मुसीबत बन सकते हैं। उस दौर में ब्रिटिश राज द्वारा किए जाने वाले दमन के खिलाफ पंजाब में खास तौर से विशेष आक्रोश था। बैसाखी के दिन भी ऐसा ही कुछ हआ। ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर में एक दिन पहले ही कर्फ्यू लगा दिया था। आदेश पारित हुआ कि बैसाखी के दिन लोग इकठ्ठा न हों तथा अपनेअपने घरों में ही रहें। इसी बीच ब्रिटिश प्रशासन को किसी मुखबिर के द्वारा यह खबर मिली कि जलियाँवाला बाग में आंदोलनकारी जमा हो रहे हैं, तो प्रशासन ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। हालांकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने आये थे। और सभा की खबर सुनकर वहाँ जा पहुँचे थे। सभा शुरू होने तक वहाँ 10-15 हजार लोग जमा हो गए थे। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहाँ पोजीशन ले ली और बिना किसी चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी।

अफरा-तफरी के माहौल में फायरिंग से बचने के लिए अनेक बच्चे और महिलाए बाग में बने गहरे कुएं में कूद गईं जिस कारण उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। दीवारों पर चढ़कर वहां से निकलने की कोशिश करने वाले निहत्थे लोगों पर भी क्रूर डायर फायरिंग करवाता रहा। महज आधे घंटे के अंदर ही पूरे बाग में हजारों लाशें बिछ गई।

जलियाँवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के निकट होने के कारण एक विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहाँ पर्व अथवा विशेष मौकों पर अक्सर लोग एकत्र होते हैं। इस स्थान पर विभिन्न प्रयोजनों के लिए सभाएं भी आयोजित की जाती रही हैं। यहाँ एकत्रित हुए लोगों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध में कोई आयोजन करना नहीं था।

जलियाँवाला हत्याकांड का प्रभाव

इस नरसंहार ने भारत के इतिहास की दिशा में परिवर्तन ला दिया था। इस हत्याकांड के पीछे ब्रिटिश सरकार का काला कानून रौलेट एक्ट था जिसका विरोध उस समय पूरे भारत में हो रहा था। रौलेट एक्ट के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मात्र संदेह के आधार पर मिला किया जा सकता था अथवा गुप्त मुकदमा चलाकर उसे दण्डित किया जा सकता था। इस कानून के द्वारा सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को दो साल तक जेल में बंद रखने का अधिकार मिल गया। भारतीयों ने काला कानून कहकर इस एक्ट का विरोध किया। महात्मा गांधी ऐसे अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ अहिंसक ढंग से नागरिक अवज्ञा चाहते थे, देश भर में महात्मा गांधी के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किए गए। इस कानून के खिलाफ बढ़ते आक्रोश को देखकर ब्रिटिश सरकार ने दमन का मार्ग अपनाया।

इस नरसंहार की दुनियाभर में कड़ी निंदा की गई। इस निंदा के दबाव में ब्रिटिश सरकार को इस घटना की जाँच के लिए एक आयोग (हंटर कमीशन) का गठन करना पड़ा। हंटर कमीशन की रिपोर्ट में वास्तविकता सामने आ गई।

दबाव में आकर, सिर्फ दिखाने के ब्रिटिश सरकार ने ब्रिगेडियर जनरल डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया तथा उसे भारत में कोई पद न देने का फैसला किया। उधर ब्रिटेन की संसद में हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने जनरल डायर के इस घृणात्मक कृत्य के लिए निंदा प्रस्ताव पारित किया। परंतु इसके विपरीत हाउस ऑफ लॉर्डस ने इस नरसंहार की प्रशंसा करते हुए जनरल डायर का प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। पूरे विश्व भर की कड़ी निंदा के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और इस घटना के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। वर्ष 1920 में जनरल डायर को अपना त्यागपत्र देना पड़ा।

जलियाँवाला बाग नरसंहार के दोषियों को दण्डित करने के स्थान पर सरकार द्वारा पंजाब में मार्शल लॉ लागू किया गया। इस घटना के परिणामस्वरूप पंजाब पूर्ण रूप से भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हो गया। इन घटनाओं की प्रतिक्रिया में गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई। वहीं गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जालियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में अपनी 'नाइटहुड' की उपाधि वापस कर दी। उधमसिंह ने प्रण लिया कि वे इस नरसंहार का प्रतिशोध अवश्य लेंगें। इसी दिशा में उन्होंने 13 मार्च, 1940 को लंदन में जनरल डायर को गोली मार दी। इस हत्याकांड का देश के एक और बड़े क्रान्तिकारी शहीद भगत सिंह के मन पर भी काफी असर पड़ा। इस घटना की खबर मिलते ही भगत सिंह जलियांवाला बाग पहुँच गए और उन्होंने भी बाग की मिट्टी उठाकर यह कसम ली कि देश की आजादी के लिए वे अपना सब कुछ कुर्बान कर देंगे। शहीद उधम सिंह और शहीद भगत सिंह की जिंदगी से जुड़ी हुई यह दो छोटी-छोटी मिसालें बतलाती हैं कि हत्याकांड ने उस वक्त देशवासियों के दिलो दिमाग पर कितना असर डाला था।

जलियाँवाला बाग कांड की निंदा पूरे विश्व ने की थी। ब्रिटेन सरकार इसे आज भी अपनी सबसे बड़ी भूल मानती है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने हाल ही में इस संदर्भ में खेद प्रकट किया है। वहाँ के नेताओं ने कई बार सार्वजनिक रूप से इस घटना के संबंध में खेद प्रकट किया है। ब्रिटेन का जब भी कोई बड़ा नेता भारत आता है तो जलियाँवाला बाग जरुर जाता है। वर्ष 1997 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय भारत आई तो उन्होंने भी वहाँ जाकर मृतकों को श्रद्धांजली दी।

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