Saturday, 31 August 2019

गुंडा कहानी का सारांश - Gunda Kahani ki Summary and Question Answer

Gunda Kahani ki Summary and Question Answer : मित्रों आज के लेख में हमने जयशंकर प्रसाद की सुप्रसिद्ध गुंडा कहानी का सारांश प्रस्तुत किया है। इस लेख के अंतर्गत हम गुंडा कहानी का सारांश तथा प्रश्नोत्तर (Gunda Kahani Question Answer) और इस कहानी के महत्वपूर्ण बिंदुओं (Important Points) के बारे में जानेंगे। 

    गुंडा कहानी का सारांश - Gunda Kahani ki Summary in Hindi

    'इन्द्रजाल' कहानी-संग्रह में संगृहीत जयशंकर प्रसाद जी की कहानी गुंडा' हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों में स्थान रखती है। इस कहानी की कथा वाराणसी के परिवेश पर आधारित है। ईसा की अठारहवीं शती के अन्तिम भाग में समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्र-बल के समक्ष परास्त होते देख एक नवीन सम्प्रदाय (वर्ग) की सृष्टि का प्रसाद जी ने उल्लेख किया है, जिन्हें काशी के लोग गुंडा समझते हैं। उनका धर्म वीरता था जिसका प्रदर्शन वे अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध निर्बलों और असहायों की रक्षार्थ करते थे। ऐसे ही एक पात्र नन्हकू सिंह का इस कहानी में जिक्र है, जो काशी के प्रतिष्ठित जमींदार बाबू निरंजन सिंह का वीर पुत्र है। जीवन की किसी 'अलभ्य अभिलाषा' के पूर्ण न होने पर वह मानसिक चोट से घायल हो जाता है, परन्तु स्वाभिमान के साथ निर्भय होकर अपने साथियों को लेकर काशी की गलियों में घूमता रहता है। वहीं की एक तवायफ की लड़की - दुलारी से नन्हकू के राजमाता - पन्ना के प्रति मधुर सम्बन्धों का पता चलता है, जो अपने पुत्र राजा चेतसिंह के साथ काशी के आतंकपूर्ण, भय और सन्नाटे के माहौल में कैद कर ली गई हैं। जब दुलारी के माध यम से नन्हकू सिंह को इस बात की जानकारी मिलती है, तो उसका मन अधीर हो उठता है। वह अपनी जान पर खेलकर अपने साथियों के साथ उन्हें उस कैद से आजाद करने के लिए निकल पड़ता है। वहाँ पहुँचकर वह अपने प्रयत्न में सफल होता है। वह स्वयं तिलंगों की संगीनों के सामने चट्टान सदृश खड़ा होकर अविचलित भाव से तलवार चलाता हुआ राजमाता और राजपरिवार की रक्षा करता हुआ अपने प्राणों की आहुति दे देता है।

    सजग साहित्यकार प्रसाद जी ने इस कहानी के माध्यम से काशी के गुण्डों की विशेषताओं को रेखांकित करने की कोशिश की है, जिनमें आजादी की ललक है, जो मानवीय भावनाओं से पूर्ण है। 

    गुंडा कहानी के मुख्य बिन्दु

    (1) ईसा की अठारहवीं शती के अन्तिम भाग में काशी नगरी में समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्रबल के सामने झुकते देख एक नवीन सम्प्रदाय की सृष्टि का लेखक ने उल्लेख किया है, जिन्हें वहां के लोग गुंडा समझते थे। उनका ६ गर्म वीरता था जिसे वे अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध निर्बलों और असहायों की रक्षा करने में व्यक्त करते थे। ऐसे ही एक पात्र नन्हकूसिंह का जिक्र है, जो जमींदार बाबू निरंजनसिंह का वीर पुत्र है।

    (2) नन्हकूसिंह पन्ना' से प्रेम करता था, पर राजा बलवन्तसिंह द्वारा बलपूर्वक उसके रानी बनाए जाने पर वह मानसिक चोट से घायल हो जाता है। अव्यक्त-प्रेम की कसक और असफल प्रेम का प्रतिशोध उसकी जीवन-धारा का रूख बदल देती है। वह नन्हकू से गुंडा नन्हकूसिंह बन जाता है। पर उसे अफसोस इस बात का है कि राजा बलवन्तसिंह से बदला लेने के लिए वह गुंडा तो बना, लेकिन वह उसके 'कलेजे में बिछुवा न उतार' सका।

    (3) बलवन्तसिंह से तो वह प्रतिशोध नहीं ले पाता लेकिन अपनी सम्पत्ति को पानी की तरह बहाता है, क्योंकि उसस सम्पत्ति और उस सम्पत्ति पर टिके समाज से सख्त नफरत है। संगठित शक्ति के मुकाबलेसंगठित विकल्प (प्रतिरोध) न होने के कारण प्रतिशोध की भावना एण्टीहीरो' को जन्म देती है। नन्हकू सिंह को अपराधी बनाने वाली शक्तियों का समाज पर प्रस्था है। राजा वलवन्तसिंह की जबरदस्ती, हेस्टिग्स और उसके प्रशासकों-सहयोगियों के अत्याचार एक वर्ग की संस्कृति हैउनके अपराध राज्य और कानून की दृष्टि में अपराध नहीं है। इस निरंकुश-सत्ता के अपराधों का संगठित प्रतिवाद न होने कथति में जीने और उनसे लड़ने के लिए यह सम्प्रदाय (गुंडा) प्रसिद्ध है।

    (4) अत्याचार संगठित है और वैधानिक है। वह अमानवीय समाज को जन्म देता है, जो मनुष्य की भावना और इच्छा का सम्मान नहीं करता। दुलारी से नन्हकू सिंह का जिक्र (गुणगान) सुनकर पन्ना अन्यमनस्क हो जाती है और राजा बलवन्त सिंह द्वारा बलपूर्वक महारानी बनाए जाने के पहले की एक 'सम्भावना' को सोचने लगती है कि-'काश उसका ब्याह नन्हकू सिंह से हो जाता' । उस 'सम्भावना' की कसक महारानी पन्ना के मन में अब भी है, पर कभी उसे व्यक्त नहीं कर पायीं, पर नन्हकू सिंह जब पन्ना को छुड़ाने शिवालय घाट पर पहुंचा, तब एक क्षण' के लिए चारों आँखें मिलीं, जिनमें जन्म-जन्म का विश्वास ज्योति की तरह' जल रहा था। 'एक क्षण' की यह कौंध उस समूचे कल को निरर्थक बना देती है, जो मनुष्य की सम्भावना' को कुचलता है। यहीं 'एक क्षण' कहानी की सम्बेदना का वह बिन्दु है, जहाँ 'विलभि विदेश रहे एकाएक 'जन्म-जन्म का विश्वास' बनकर सामने आ जाता है। इसी एक क्षण में पहले की सारी कोमल भावनाएँ यथार्थ के उस क्रूर सत्य से टकराती हैं जो शक्ति के संस्थानों की अमानवीयता उद्घाटित कर देता है। फाटक बलपूर्वक खोला जा रहा था। इस संकट में पन्ना की रक्षार्थ 'जन्म-जन्म के जिस विश्वास और अनुराग से नन्हकू सिंह वहाँ पहुँचा था, वह एक क्षण में उसे 'गुंडा' से 'सेवक' बना देता है। और स्वयं को दांव पर लगाकर पन्ना को बचा लेता है, जो प्रसाद जी की रोमांटिक संवेदना का एक खास गुण है।

    (5) इस प्रकार अमानवीय शक्ति-स्थानों की टकराहट में प्रतिनायक के मानवीयगुण उभरकर सामने आते हैं। बोधिसिंह से जुए के दौरान भयंकर झगड़ा, मनमुटाव रहने के बावजूद भी नन्हकूसिंह उसके लड़के की बारात लेफर जाते हैं, सारा खर्चा उठाते हैं। वे दुलारी से गाने की फरमाइश करते हैं, पर कोठे की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ते। झारी जो कि एक उपेक्षित नारी है, पर उसमें मानवीयता है, खुद्दारी है, नन्हकू के प्रति दबा सा अनुराग रखती है। सुम्भा नाले पर नन्हकू का मन बेचैन है। रात में दुलारी उनके पलंग पर आ जाती है, 'दुलारी। जीवन में आज यह पहला ही दिन है कि एकांत रात में एक स्त्री मेरे पलंग पर आकर बैठ गई है, मैं चिरकुमार।' बन्दी पन्ना और चेतसिंह को उसके विश्वासी लोग या तो गोखा देते हैं या हताश होकर बैठ जाते हैं, तब नन्हकूसिंह जान देकर राजमाता और राजपरिवार को बचाते हैं। इस तरह उनके चारित्रिक गुण सामाजिक खलनायक से लड़ने वाले व्यक्ति नायक के गुण हैं। वे सामाजिक प्रतिरूप नहीं।

    (6) 'गुंडा कहानी सामंती और साम्राज्यवादी सत्ता-विमर्श में स्त्री की यातना की कहानी भी है। पन्ना 'असवर्णता' और 'वैधव्य' का दोहरा अभिशाप झेलती है। छोटी होने के कारण पटरानी है और पुत्रवती होने के कारण सम्मानपाती है। लेकिन उसकी यातना की अनेक परतें हैं। उसने बलवन्त सिंह से स्वेच्छा से विवाह नहीं किया। उसकी इच्छा की, बलवन्त सिंहके सामने कोई कीमत नहीं। उसकी इच्छा, भावना, विश्वास इस तरह दब जाते हैं, जिन्हें वह एकांत में भी प्रकट नहीं कर सकती; पटरानी बनने के बाद वह अन्य रानियों की डाह से मुक्त नहीं रहती: विधवा होने के बाद उसके अपमान का अन्त नहीं है। यह उसकी स्त्री अस्मिता है। स्त्री होने के कारण वह उत्पीड़न की सबसे सहज शिकार है। बलवन्त सिंह उसे बलपूर्वक रामनगरकी रानी बनाते हैं और हेस्टिंगस के आदेश पर इस्टार भी उसे 'बलपूर्वक' कलकत्ता भेजने पर आमदा हैं। इस तरह सामंती और साम्राज्यवादी सत्ता की दोहरी यातना से ग्रस्त पन्ना का जीवन कई अर्थछायाएं प्रदान करता है।

    (7) 'गुंडा' कहानी का देशकाल सुनिश्चित है। प्रसाद लिखते हैं - "16 अगस्त 1781 को काशी डावांडोल हो रह थी। शिवालय घाट में राजा चेतसिंह इस्टार पहरे में थे। नगर में आतंक था। कूटनीति का दौर बीत चुका था, दमन और आतंक के बल पर अंग्रेजी राज अपने पांव फैला रहा था। इस तरह, काशी हिन्दुस्तान का प्रतीकबन जाती है, निश्चित देशकाल का चित्र बृहत्तर ऐतिहासिक यथार्थ की झलक देने लगता है। देशी सामंत अपने-अपने राग-रंग के लिए प्रजा पर अत्याचार करते थ साम्राज्यवादी शासन पहले दौर में सामंतों को भी बेदखल कर रहा था। जनता से अलगाव के कारण यह सामंतर्य अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता था, इस तरह सामाजिक जीवन में काफी उथल-पुथल थी। गुंडा' के पास संकल्प, साहस और चारित्रिक गुण हैं पर जागृत सामाजिक चेतना नहीं है, संगठित शक्ति नहीं है। वह उत्पीड़न की प्रक्रिया से पैदा हुआ है,इसीलिए साम्राज्यवादी उत्पीड़न के क्षण में वह ऐतिहासिक भूमिका अदा करता है। लेकिन उसकी यह भूमिका सीमित है। इसलिए पन्ना और चेतसिंह को खिड़की के रास्ते नदी में खड़ी डोंगी में उतारकर खुद संगीनों का प्रहार अपने शरीसर झेलता है। उसके शौर्यपूर्ण जीवन के साथ उसकी ऐतिहासिक भूमिका भी खत्म हो जाती है। गुंडा' को मृत्यु वैयक्तिक नायकत्व वाली रोमांटिक संवेदना की मृत्यु है।वह एक संदेश है कि संगठित सत्ता का विरोध संगठित माध्यम से ही हो सकता है। यह संदेश 1781 के भारत से ज्यादा प्रसाद के भारत के लिए है।

    (8) पराधीन जाति अपने स्वर्णिम अतीत से अपनी वर्तमान दशा की तुलना कर एक चेतना जगाने की कोशिश करती है। प्रसाद ऐसी तुलना के लिए खासतौर से प्रसिद्ध है। गुंडा में इस प्रवृत्ति की झलक है "ईसा की अठारहवीं शती के अन्तिम भाग में वही काशी नहीं रह गई थी, जिसमें उपनिषद के अजातशत्रु की परिषद में ब्रह्मविद्या सीखने के लिए विद्वान ब्रह्मचारी आते थे।" इत्यादि।

    (9) यह कहानी एक और महत्वपूर्ण बात की तरफ संकेत करती है- अंग्रेजी-जुल्म के समय हिन्दू-मुस्लिम आपस में लड़ें, साम्प्रदायिक प्रश्न खड़े हों, मौलवी कुबरा और हिम्मतसिंह जैसे लोग अंग्रेजों की सहायता करें- प्रसाद जी इस वस्तु स्थिति को सामने रखकर राष्ट्रीय-चेतना के लिए जमीन तैयार करते हैं।

    इस प्रकार गुंडा' कहानी के ताने-बाने में बहुत से सूत्र पिरोए हुए हैं- सामंती उत्पीड़न, साम्राज्यवादी निरंकुशता, नन्हकू सिंह जैसे (बहिष्कृत) चरित्र के प्रेम और उत्सर्ग का उत्कृष्ट रूप, उसका शौर्य, उसकी आजादी के प्रति ललक, बनारस का सांस्कृतिक जीवन, धनी वर्ग की कायरता और गद्दारी, दुलारी जैसे उपेक्षित चरित्रों की मानवीयता और खुद्दारी, भारतीय समाज का ऐतिहासिक संक्रमण, साम्प्रदायिक प्रश्न, स्वर्णिम अतीत से वर्तमान की तुलना, राष्ट्रीय जागरण की भावना को जगाने का प्रयत्न इत्यादि।

    Gunda Kahani ke Question Answer - गुंडा कहानी के प्रश्न उत्तर

    प्रश्न 1. अठारहवीं शती के काशी की सामाजिक और धार्मिक स्थिति क्या थी?
    उत्तर- धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से काशी भारत की बहुत ही महत्त्वपूर्ण नगरी है। अठारहवीं शती के अन्तिम चरणों में काशी पूरी तरह बदल गई थी। पहले यहाँ अजातशत्रु की परिषद में ब्रह्मविद्या सीखने के लिए अनेक विद्वान बह्मचारी आया करते थे। गौतमबुद्ध व शंकराचार्य के धर्म-दर्शनों में अभिव्यक्त सिद्धान्तों के खिलाफ खूब वद-विवाद होते थे। इसका कारण था - आततायियों द्वारा मन्दिरों व मठों का ध्वंस तथा तपस्वियों का निरंतर वध। वहां अब पहले जैसी पवित्रता नहीं रह गई थी। समाज में भयंकर विश्रृंखलता फैली हुई थी। वैष्णव धर्म विकृत हो रहा था। 'धर्मोन्माद' ने काशी में भयंकर रूप धारण कर लिया था। ज्ञानार्जन के उद्देश्य से आने वाला अध्येता अपने उद्देश्य-प्राप्ति से वंचित हो जाता। दरअसल, बुद्धिवाद शस्त्रबल के समक्ष झुका जा रहा था। इस तरह वहाँ की स्थिति डावांडोल थी।

    प्रश्न 2. धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से 'काशी नगरी' के महत्त्व पर प्रकाश डालिए?
    उत्तर - धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से काशी भारत की एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण नगरी है। गंगा के सुरम्य तट पर बसी हुई इस नगरी को मन्दिरों का शहर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां मन्दिरों की संख्या अनगिनत है, जिनमें काशी विश्वनाथ' का मन्दिर सबसे प्रसिद्ध है। कहते हैं काशी में मरने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पहले उपनिषद के अजातशत्रु की परिषद में ब्रह्मविद्या सीखने के लिए विद्वान ब्रह्मचारी यहाँ आया करते थे। वैष्णव-धर्म के लोग यहाँ जमे हुए थे। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी धर्म-दर्शनों के अनुयायी व प्रचारक यहाँ पहले भी आते थे और अब भी आते हैं तथा रहते हैं। शास्त्रार्थ होता है। मान्यताएं, नियम आदि बनाए व तोड़े जाते हैं। विभिन्न धर्म-दर्शनों के प्रवर्तक यहाँ आकर अपने-अपने धर्म-दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करते हैं व प्रचार करते हैं। यह एक बहुत ही पवित्र नगरी माने जाती है। अतः अठारहवीं शती के अन्त में जब यहाँ अराजकता फैली तब उसे रोकने के लिए एक नवीन सम्प्रदाय उभरकर आया।

    प्रश्न 3. गुंडा वर्ग काशी के किस सम्प्रदाय की ओर संकेत करता है और उसकी मुख्य विशेषता क्या थी?
    उत्तर- ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरणों में काशी नगरी में समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्रबल के सामने झुकते देखकर एक नवीन सम्प्रदाय की सृष्टि का लेखक ने उल्लेख किया है, काशी के लोग जिन्हें गुंडा कहते हैं। उनका धर्म वीरता था, जिसे वे अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध निर्बलों और असहायों की सहायता करने में व्यक्त करते थे। यह वर्ग संघर्षशील था और उनमें आजादी की ललक थी।

    प्रश्न 2. 'मनुष्य स्वभाव हिसाब रखने की प्रथानुसार कभी-कभी यह कह बैठता है कि "यदि यह बात हो गयी होती तो" इसको प्रथम या सिद्धान्त वाक्य मानकर इस पर एक अनुच्छेद लिखिए?
    उत्तर- मनुष्य स्वभाव हिसाब रखने की प्रथानुसार कभी-कभी यह कह बैठता है कि यदि यह बात हो गयी होती तो?" हाँ, व्यक्ति ऐसा सोचता है। ठीक इसी तरह पन्ना भी राजा बलवन्त सिंह द्वारा जबरदस्ती रानी बनायी जाने के पहले की एक 'सम्भावना' को सोचने लगती है, वह भी दुलारी के मुख से नन्हकूसिंह का नाम सुनकर। गंगा के किनारे एक छोटे से मंच पर बैठी पन्ना, गंगा की उमड़ती हुई धारा को अन्यमनस्क होकर देखने लगी थी और सोचने लगी थी अपने अतीत को और अतीत की उस बात को जो उसके जीवन में उसी तरह गुम हो गई थी, जैसे व्यक्ति के हाथ से कोई वस्तु फिसलकर गुम हो जाती है। उस अतीत की घटना को सोचने का जबकि कोई कारण न था। क्योंकि उस घटना को सोचने से कोई परिणाम निकलने वाला नहीं था, फिर भी स्वभाव के अनुसार वे यह सोचने लगीं थीं कि 'अगर यह बात हो गई होती तो' अर्थात् उनका ब्याह बलवन्त सिंह से न होकर नन्हकूसिंह से हो जाता तो, शायद उनको इतनी यातनाओं का सामना न करना पड़ता और जीवन खुशियों से पूर्ण होता ।

    प्रश्न 3. गेंदा कौन थी? राजमाता पन्ना उसे क्यों पसंद करती थीं?
    उत्तर- गेंदा राजमाता पन्ना की एक मुँहलगी दासी थी। वह उनके साथ उसी दिन से रह रही थी, जिस दिन से राजमाता पन्ना राजा बलवन्त सिंह की प्रेयसी बनी। गेंदा को राजमाता बहुत पसन्द करती थीं। वह उनकी हर बात को मानती थी, उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती थी और राज्यभर की खबर राजमाता पन्ना को लाकर देती थी। उसे राज्यभर की बातों की जानकारी रहती थी।

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