Saturday, 24 August 2019

सुभाष चंद्र बोस पर निबंध – Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi

Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi : दोस्तो आज हमने सुभाष चंद्र बोस पर निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 के विद्यार्थियों के लिए लिखा है। 

    इस लेख के माध्यम से हमने एक Subhash Chandra Bose जी के जीवन का और उनके आंदोलनों वर्णन किया है इस निबंध की सहायता से हम भारत के सभी लोगों को हमारे नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके विचारों के बारे में बताएंगे.

    Short Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi

    सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। भारतीय जनमानस उन्हें नेता जी कहकर संबोधित करते हैं। आपका जन्म उड़ीसा के कटक में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्री जानकी नाथ बॉस तथा माता का नाम प्रभावती बोस था। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। 
    सुभाष चंद्र बोस पर निबंध – Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi
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    अपने सभी भाइयों में से सुभाष चंद्र बोस को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। उनका विश्वास था कि अंग्रेजों से आजादी पाने के लिये अहिंसा आंदोलन काफी नहीं है इसलिए उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया तथा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा दिया। 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत हवाई दुर्घटना में हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया।

    Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi 200 words

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजो के खिलाफ बगावत करने वाले एक सच्चे देशभक्त तथा महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ। वह जानकीनाथ बोस तथा प्रभावती देवी की नौवीं संतान थे। उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की तत्पश्चात उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु वह इंग्लैंड चले गए। भारत वापस लौटने पर जब उन्होंने अपने देश की दयनीय स्थिति देखी तो उन्हें बहुत दुख हुआ। तत्पश्चात वह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए। सुभाष बाबू के जीवन पर देशबन्धु चितरंजन दास के त्याग और राजनीतिक सूझबूझ का बड़ा गहन प्रभाव पड़ा। गांधीजी से असहमत होने के कारण उन्होंने कांग्रेस से अपना त्यागपत्र दे दिया। सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए एक सेना का निर्माण किया, जिसे आजाद हिंद फौज के नाम से जाना गया। नेता जी ने देश को दासता के बंधन से मुक्त कराने के लिए "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का नारा दिया। 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक विमान दुर्घटना में मारे गए लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली तथा वाणी आकर्षक थी उनका जीवन हम सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 

    Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi 400 words

    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक महान देशभक्त और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। वो स्वदेशानुराग और जोशपूर्ण देशभक्ति के एक प्रतीक थे। हर भारतीय बच्चे को उनको और भारत की स्वतंत्रता के लिये किये गये उनके कार्यों के बारे में जरुर जानना चाहिये। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके अपने गृह-नगर में पूरी हुयी थी जबकि उन्होंने अपना मैट्रिक कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में ग्रेज़ुएशन पूरा किया। बाद में वो इंग्लैंड गये और चौथे स्थान के साथ भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा को पास किया।

    अंग्रेजों के क्रूर और बुरे बर्ताव के कारण अपने देशवासियों की दयनीय स्थिति से वो बहुत दुखी थे। भारत की आजादी के माध्यम से भारत के लोगों की मदद के लिये सिविल सेवा के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया। देशभक्त देशबंधु चितरंजन दास से नेताजी बहुत प्रभावित थे और बाद में बोस कलकत्ता के मेयर के रुप में और उसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। बाद में गांधी जी से वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस पार्टी छोड़ने के बाद इन्होंने अपनी फारवर्ड ब्लॉक पार्टी की स्थापना की।

    वो मानते थे कि अंग्रेजों से आजादी पाने के लिये अहिंसा आंदोलन काफी नहीं है। इसलिये देश की आजादी के लिये हिंसक आंदोलन को चुना। नेताजी भारत से दूर जर्मनी और उसके बाद जापान गये जहाँ उन्होंने अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना बनायी, ‘आजाद हिन्द फौज’। ब्रिटिश शासन से बहादुरी से लड़ने के लिये अपनी आजाद हिन्द फौज में उन देशों के भारतीय रहवासियों और भारतीय युद्ध बंदियों को उन्होंने शामिल किया। सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजी शासन से अपनी मातृभूमि को मुक्त बनाने के लिये “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के अपने महान शब्दों के द्वारा अपने सैनिकों को प्रेरित किया।

    ऐसा माना जाता है कि 1945 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु एक प्लेन दुर्घटना में हुयी थी। ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिये उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना की सभी उम्मीदें उनकी मृत्यु की बुरी खबर के साथ समाप्त हो गयी थी। उनकी मृत्यु के बाद भी, कभी न खत्म होने वाली प्रेरणा के रुप में भारतीय लोगों के दिलों में अपनी जोशपूर्ण राष्ट्रीयता के साथ वो अभी-भी जिदा हैं। वैज्ञानिक विचारों के अनुसार, अतिभार जापानी प्लेन दुर्घटना के कारण थर्ड डिग्री बर्न की वजह से उनकी मृत्यु हुयी। एक अविस्मरणीय वृतांत के रुप में भारतीय इतिहास में नेताजी का महान कार्य और योगदान चिन्हित रहेगा।

    Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi 450 words

    ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सशक्त रूप से बगावत का परचम लहराने वाले और “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" के नारे की गर्जना करने वाले क्रांतिवीर सुभाष चंद्र बोस का जन्म उड़ीसा प्रांत के कटक नामक नगर में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।

    उनके पिता रायबहादुर जानकी नाथ बोस वहां के नगरपालिका एवं जिला बोर्ड के प्रधान तो थे ही, नगर के एक प्रमुख वकील भी थे। उनकी आरम्भिक शिक्षा कटक के एक अंग्रेजी स्कूल में हुई थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़कर वहीं से बी.ए. ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। वे सन 1919 ई. में आई. सी. एस की परीक्षा पास करने इंग्लैण्ड गए। वहां से लौटकर एक सरकारी नौकरी में अधिकारी नियुक्त हुए। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर देश-सेवा का व्रत ले लिया और बंगाल के प्रसिद्ध देशभक्त बाबू चितरंजन दास के प्रभाव में आकर उनके सेवा दल में भर्ती हो गए।

    नेताजी पर आज़ादी का परवान इतना चढ़ चुका था कि सन् 1921 ई. में उन्होंने स्वयं सेवक संगठन की स्थापना कर दी। गरम दल के इस नेता को अंग्रेजी सरकार ने जेल में बंद कर दिया लेकिन क्या कभी तूफान को कमरे में कैद किया जा सकता है, वह बाहर आये और आज़ादी के कार्यों में लिप्त हो गए। गांधी जी से मतांतर होने के बावजूद वह उनका सम्मान करते थे। सन् 1938 व 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष तो चुने गए किन्तु मत न मिलने के कारण त्यागपत्र दे कर फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना कर डाली। पूर्ण स्वराज्य और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर आधारित इस संगठन के गतिविधियों के कारण सन् 1940 में उन्हें हिरासत में ले लिया गया परन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण पुनः रिहा कर दिया गया। घर में नजरबन्द सुभाष चन्द्र बोस पर कड़ा पहरा भी बिठा दिया गया।

    विलक्षण प्रतिभा और अनोखी सूझ-बूझ से उत्पलावित नेताजी का भेष बदल कर काबुल के रास्ते जर्मनी पहँचना और फिर जर्मनी से सन् 1942 में टोकियो (जापान) पहुंचकर आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना करना एक मिसाल है।

    साधनों के कम होने पर भी उन्होंने अंग्रेजी सेना से डटकर लोहा लिया। इम्फाल में उनके बीच जमकर लड़ाई हुई जिसमें उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के छक्के छुड़ाए तथा बर्मा एवं मलाया तक अंग्रेजों को पराजित कर मार भगाया परन्तु बाद में विवश होकर 'आजाद हिन्द फौज' को हथियार डालने पड़े।

    23 अगस्त, 1945 को टोकियो रेडियो ने शोक समाचार प्रसारित किया कि सुभाष बाबू एक विमान दुर्घटना में मारे गए परन्तु लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ। परिणामतःइनकी मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है। आज भी 'जय हिन्द' तथा 'कदम-कदम बढ़ाये जा' गीत हमारे कानों में गूंज रहे हैं। उनकी वाणी में जादू तथा व्यक्तित्व में एक आकर्षण था।

    Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi 500 words

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक उड़ीसा में हुआ। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखते थे। 1920 में वह उन गिने-चुने भारतीयों में से एक थे, जिन्होंने आई सी एस परीक्षा उत्तीर्ण की। 1921 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बने। 1938 में वह कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष बने। पुणे 1939 त्रिपुरा सेशन कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। 

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय संग्राम में सबसे अधिक प्रेरणा के स्त्रोत रहे हैं। यह वह व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा और इस नारे के तुरंत बाद सभी जाती और धर्मों के लोग खून बहाने के लिए खड़े हो गए। इतना अधिक वह लोग अपने पिता से प्रेम रखते थे और उनके मन में नेताजी के लिए श्रद्धा थी 

    उनके पिता जानकीनाथ के प्रसिद्ध वकील थे और उनकी माता प्रभादेवी धार्मिक महिला थी। सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज में रहते हुए भी वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते रहे, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। एक बार तो उन्होंने अपने इंग्लिश अध्यापक की भारत के विरुद्ध की गई टिप्पणी का कड़ा विरोध किया। जब उनको कॉलेज से निकाल दिया गया तब आशुतोष मुखर्जी ने उनका दाखिला स्कॉटिश चर्च कॉलेज में कराया, जहां से उन्होंने दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी में बीए पास किया। उसके बाद भारतीय नागरिक सेवा की परीक्षा में बैठने के लिए लंदन गए और उस परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। साथ ही साथ उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में M.A. किया .क्योंकि वह एक राष्ट्रवादी थे इसलिए ब्रिटिश अंग्रेजों के राज्य में काम करने से इंकार कर दिया। उसके पश्चात उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय संग्राम में भाग लेना प्रारंभ कर दिया। 

    उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में देशबंधु चितरंजन दास के सहायक के रूप में कई बार स्वयं को गिरफ्तार करवाया। कुछ दिनों के बाद उनका स्वास्थ्य भी किया परंतु उनकी इच्छा शक्ति में कोई अंतर नहीं आया उनके अंदर राष्ट्रीय भावना इतनी जटिल थी कि दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होंने भारत छोड़ने का फैसला किया। वह जर्मनी चले गए और वहां से फिर 1946 में सिंगापुर गए। जहां उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी की कमान संभाली। जापान और जर्मनी की सहायता से उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने के लिए एक सेना का गठन किया, जिसका नाम उन्होंने आजाद हिंद फौज रखा। कुछ ही दिनों में उनकी सेना ने भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह नागालैंड और मणिपुर में आजादी का झंडा लहराया। किंतु जर्मनी और जापान की द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा। किंतु उनकी बराबरी बहादुरी और हिम्मत यादगार बन गई आज भी हम ऐसा विश्वास करते हैं कि भारत को आजादी आजाद हिंद फौज के सिपाहियों की बड़े दिनों के बाद मिली है 

    ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 को उनकी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हो गई लेकिन आज तक नेताजी की मौत का कोई सबूत नहीं मिला आज भी कुछ लोगों का विश्वास है कि वह जीवित है नेताजी से संबंधित फाइलें सार्वजनिक हो चुकी है इससे नेताजी के रहस्य से पर्दा उठ जाएगा

    Essay On Subhash Chandra Bose In Hindi 700 words

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था । बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था।

    नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेजिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अंग्रेजी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

    1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मकसद एक है, यानी देश की आजादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।

    1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस 'विद्रोही अध्यक्ष' ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गाधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।

    इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आजादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नजरबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

    सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का । नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अंग्रेजों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।

    सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी _छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आजाद हिंद फौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आजाद हिंद फौज के नेता थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।

    नेताजी के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' दिया।

    18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।

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