Monday, 7 January 2019

विष्णु प्रभाकर का जीवन परिचय व साहित्यिक परिचय

विष्णु प्रभाकर का जीवन परिचय व साहित्यिक परिचय

विष्णु प्रभाकर का जीवन परिचय
जीवन परिचय— विष्णु प्रभाकर हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक के रूप में विख्यात हुए। उनका जन्म 21 जून 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ था। उनके पिता दुर्गा प्रसाद धार्मिक विचारों वाले व्यक्ति थे और उनकी माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थी, जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का विरोध किया था। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। बाद में वे अपने मामा के घर हिसार चले गए, जो तब पंजाब प्रांत का हिस्सा था। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के चलते वे आगे की पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए और गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के तौर पर काम करते समय उन्हें प्रतिमाह 18 रुपये मिलते थे, लेकिन मेधावी और लगनशील विष्णु ने पढ़ाई जारी रखी। पंजाब विश्वविद्यालय से बी़ ए़ और फिर हिंदी की ‘प्रभाकर’ परीक्षा उत्तीर्ण की। यही डिग्री इनके नाम के साथ ऐसी जुड़ी कि इनका नाम ही ‘विष्णु प्रभाकर’ हो गया। इनका आरंभिक नाम ‘विष्णु दयाल’ था। विष्णु प्रभाकर पर महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा। इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में उन्होंने अपनी लेखनी का भी एक उद्देश्य बना लिया, जो आजादी के लिए सतत संघर्षरत रही। अपने दौर के लेखकों में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही। विष्णु प्रभाकर ने पहला नाटक ‘हत्या के बाद’ नामक शीर्षक से लिखा। हिसार में नाटक मंडली में भी काम किया और बाद के दिनों में उन्होंने लेखन को ही अपनी जीविका बना लिया। आजादी के बाद वे नई दिल्ली आ गए और सितंबर १९५५ में आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक के तौर पर नियुक्त हो गए, जहाँ उन्होंने १९५७ तक काम किया। विष्णु प्रभाकर ने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई। 1931 में ‘हिंदी मिलाप’ में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आठ दशकों तक निरंतर चलता रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचंद्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ लिखने के लिए प्रेरित हुए, जिसके लिए वे ‘शरतचंद्र’ को जानने के लगभग सभी दााोतों, जगहों तक गए, बांग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गई। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद ‘आवारा मसीहा’ उनकी पहचान का पर्याय बन गई। बाद में ‘अर्धनारीश्वर’ पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किंतु ‘आवारा मसीहा’ ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा। विष्णु प्रभाकर ने अपनी वसीयत में अपने संपूर्ण अंगदान करने की इच्छा व्यक्त की थी। अत: 19 अप्रैल, 2009 में इनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया।
प्रमुख कृतियाँ—
उपन्यास— ढलती रात, स्वप्नमयी, अर्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है, क्षमादान, दो मित्र, पाप का घड़ा, होरी आदि
नाट्य रचनाएँ— हत्या के बाद, नवप्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक, अब और नहीं, टूटते परिवेश, इंसान और अन्य एकांकी, नए एकांकी, डरे हुए(एकांकी संग्रह) आदि
कहानी संग्रह— संघर्ष के बाद, मेरा वतन, खिलौने, आदि और अंत
आत्मकथा— ‘पंखहीन’ नाम से उनकी आत्मकथा तीन भागों में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
जीवनी— आवारा मसीहा। 
यात्रा वृत्तांत्— ज्योतिपुँज हिमालय, जमुना-गंगा के नैहर में।

पुरस्कार— विष्णु प्रभाकर जी ने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओें में अपनी लेखनी चलाई। विष्णु जी को भारत सरकार ने पद्मभूषण की उपाधि से सम्मानित किया। उनके उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ के लिए इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी सम्मान तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार इत्यादि प्रदान किए गए।

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