विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

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विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन का जन्‍म 27 मार्च, 1845 को जर्मनी के लेन्‍नेप में हुआ और वह नीदरलैंड में पले-बढ़े। उन्‍होंने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की ओर 1869 में पीएच.डी. की डिग्री प्राप्‍त की। रॉटजन ने सन् 1901 के एक्स रे की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार जीता। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लैबोरेटरी असिस्‍टेंट के रूप में कार्य किया। इसके बाद कुछ जगह प्रोफरेसर, कहीं डायरेक्‍टर बनकर स्‍कॉलर के रूप में ऊपर उठते गए।
विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi
Wilhelm Rontgen
रॉटजन ने 8 नवंबर, 1895 को संयोगवश ही एक खोज कर ली, जब वह क्रूक्‍स ट्यूब (एक कांच की निर्वात नली, जिसके दोनों ओर इलेक्‍ट्रॉड थे) से होने वाले उत्‍सर्जन की जांच कर रहे थे। जिस उत्‍सर्जन को रॉटजन देख रहे थे। वह कैथोड किरणें थीं, जो अत्‍यधिक गति वाले इलेक्‍ट्रॉन्‍स से बनी थीं, जिससे नेगेटिव इलेक्‍ट्रॉड बाहर आते थे, जब क्रूक्‍स ट्यूब के इलेक्‍ट्रॉड पर वोल्‍टेज एप्‍लाई किया जाता, तब निर्वात पर्याप्‍त शक्‍तिशाली होता है और वोल्‍टेज उस पर एप्‍लाई किया जाता है तब कैथोड किरणें निर्वात नली को चमका रही थीं। यह वह चमक थी, जिसे विलहम कॉनरैड रॉटजन देख रहे थे, जब उन्‍होंने अपनी खोज की।
रॉटजन एक एलयूमिनियम खिड़की के बिना क्रूक्‍स टृयूब का उपयोग कर रहे थे और उन्‍होंने नली को काले गत्‍ते से घेरा हुआ था, ताकिवह ट्यूब को चमकते हुए अच्‍छे तरीके से देख सकें। इसलिये जब उन्‍होंने ने देखा कि एक चमक बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन से आ रही है, जो थोड़ी ही दूर थी, वह जानते थे कि इसका कारण कैथोड किरणें नहीं हैं, क्‍योंकि कैथोड किरणें न तो कांच की नली से, न ही गत्‍ते से गुजर सकती हैं। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने इसे प्रमाणित करने के लिये कई और परीक्षण किये के क्रूक्‍स ट्यूब उस उत्‍सर्जन का स्‍त्रोत है, जो स्‍क्रीन को चमका रहा है। उन्‍होंने अनुमान लगाया कि ये उत्‍सर्जन उनकी तरह के सभी उत्‍सर्जनों में उपस्‍थित थे, लेकिन वह पहले थे, जिन्‍होंने इन्‍हें नोटिस किया।
विलहम कॉनरैड रॉटजन ने नये खोजे हुए उत्‍सर्जन को एक्‍स-रे (गणित में एक्‍स अज्ञात का प्रतीक है) ना‍म दिया और इसके प्रमाण के लिये आगे और कार्य किया। उन्‍होंने देखा कि मेज की दराज में एक फोटोग्रॉफिक प्‍लेट रखी थी, उसी कमरे में, जिसमें क्रूक्‍स ट्यूब थी और नोटिस किया कि वह अनावृत हो गई है। जब उन्‍होंने इसे विकसित किया, तो उन्‍हें उस पर चाबी की इमेज मिली, जो मेज पर रखी थी, उन्‍हें समझ में आया कि एक्‍स-रे आसानी से मेज की लकड़ी के पार हो जाती है, लेकिन चॉबी की धातु से कम अंश में। बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन और एक क्रूक्‍स ट्यूब का उपयोग करके विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लेड की डिस्‍क की एक इमेज उत्‍पन्‍न की और उनकी उंगलिया की हड्डी की, जो उस डिस्‍क को पकड़े हुए थीं।
उनके प्रयोगों ने यह दिखा दिया एक्‍स-रे अलग-अलग सामाग्रियों से अलग-अलग अंशों में पार होती हैं। जब उनकी इस खोज को सार्वजनिक किया गया, तो सारे विश्‍व में एक्‍स-रे के बारे में सनसनी फैल गई। इसे विलहम कॉनरैड रॉटजन किरणें का नाम भी दिया गया। रोग की पहचान में इसके चिकिस्‍तकीय उपयोग तुरंत ही प्रारंभ हो गये। एक्‍स-रे का इस्‍तेमाल चिकित्‍सीय उपचार, दंत परीक्षण, औद्योगिक निरीक्षण और कई दूसरे क्षेत्रों में किया जाने लगा। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने अपने तीन वैज्ञानिक पत्रों में एक्‍स–रे के कई आधारभूत नियमों का वर्णन किया, जो 1895, 1896 और 1897 में प्रकाशित हुए। उन्‍हें 1901 में नोबल पुरस्‍कार मिला। 10 फरवरी, 1923 को उनका निधन हो गया। 

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