Sunday, 13 January 2019

ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से का सारांश - रामधारी सिंह दिनकर

ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से का सारांश - रामधारी सिंह दिनकर

irshya to na gayi mere man se
ईर्ष्या तू न गई मेने मन से’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित एक निबंध हैं। इसमें लेखक ने ईर्ष्या की उत्पत्ति का कारण एवं उससे होने वाली हानियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। साथ ही ईर्ष्या से विमुक्ति का साधन भी प्रस्तुत किया है। लेखक कहता है कि उसके घर के दाहिनी तरफ एक वकील साहब रहते हैं, जिनके पास सभी सुख साधन हैं, परंतु वे फिर भी सुखी नही हैं। उनके अंदर कौन-सी अग्नि जल रही है, वह मैं जानता हूँ। उसका नाम ईर्ष्या है क्योंकि उनके बराबर में रहने वाले बीमा एजेंट अधिक संपन्न हैं, उनके पास मोटर व अच्छी मासिक आय है। वकील साहब अपनी सुविधाओं का आनंद न उठाकर केवल बीमा एजेंट की सुविधाओं को प्राप्त करने की चिंता में जल रहे हैं। ईर्ष्या मनुष्य को यही विचित्र वरदान देती है जिसमें मनुष्य बिना दु:ख के दु:ख भोगता है। जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या वास करने लगती है, वह उन चीजों का आनंद नहीं ले पाता जो उसके पास होती है वरन् उन वस्तुओं के लिए दु:ख उठाता है जो दूसरे व्यक्तियों के पास होती हैं। वह अपनी तुलना निरंतर दूसरों के साथ करता रहता है। ईष्यालु व्यक्ति असंतोषी प्रवृत्ति के होते हैं। वे भगवान द्वारा दिए गए उपवन अर्थात् सुख सुविधाओं को पाकर उसका धन्यवाद करने व आनंद लेने के विपरीत इस चिंता में मग्न रहते हैं कि मुझे बड़ा उपवन (अधिक सुविधाएं) क्यों प्राप्त नहीं हुआ। इसके लिए वह लगातार विचार करते हुए अपनी उन्नति के प्रयासों को छोड़कर दूसरों को हानि पहंँुचाने के प्रयत्न करने लगता है। लेखक ने ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा बताया है। ईर्ष्या के कारण ही व्यक्ति दूसरों की निंदा करता है जिससे वह व्यक्ति दूसरों की नजरों से गिर जाए और स्वयं दूसरों की नजरों में श्रेष्ठ बन जाए। परंतु आज तक ऐसा नहीं हुआ। निंदा के कारण कोई भी व्यक्ति नजरों से नहीं गिरता बल्कि उसके गिरने का कारण उसके गुणों का ह्रास है। ईर्ष्या का काम जलाना है। सबसे पहले यह उसी को जलाती है जिसके हृदय में वास करती है। चिंता को चिता कहा जाता है क्योंकि चिंता में मग्न व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है,परंतु ईर्ष्या तो चिंता से भी बुरी है, क्योंकि इसमें मनुष्य के मौलिक गुण समाप्त हो जाते हैं।

ईर्ष्या किसी मनुष्य का चारित्रिक दोष होने के साथ-साथ उसके जीवन आनंद में भी रुकावट डालती है, उसे जीवन का सुख नजर ही नहीं आता है। जो व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वियों को बेधकर हंसता है वह राक्षस के समान होता है और उससे प्राप्त आनंद भी राक्षसों का ही होता है। ईर्ष्या प्रतिद्वंद्विता से संबंधित होती है। प्रतिद्वंद्विता से मनुष्य का विकास होता है, किंतु अगर आप संसार का लाभ चाहते हैं तो रसेल के अनुसार आप स्पर्द्धा नेपोलियन से करेंगे। नेपोलियन भी सीजर से और सीजर भी हरकुलिस से प्रतिस्पर्धा रखता था। अर्थात् सभी प्रतिभाशाली व्यक्ति स्वयं से श्रेष्ठ लोगों से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

जो व्यक्ति सादा व सरल होता है, वह यह सोचकर परेशान होता है कि दूसरा व्यक्ति मुझसे ईर्ष्या क्यों करता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी कहते हैं कि ‘‘तुम्हारी निंदा वही करता है, जिसकी तुमने भलाई की है।’’ और जब महान् लेखक नीत्से इससे होकर गुजरे तो इसे उन्होंने इसे बाजार में भिनभिनाने वाली मक्खियाँ बताया, जो सामने व्यक्ति की प्रशंसा और पीठ पीछे उसी की निंदा करती है।’’ ये मक्खियाँ हमारे अंदर व्याप्त गुणों के लिए हमें सजा देती हैं और अवगुणों को माफ कर देती हैं। उन्नत चरित्र वाले ईर्ष्यालु व्यक्तियों की बातों पर नहीं चिढ़ते क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति तो स्वयं ही छोटी प्रवृत्ति के होते हैं। मगर छोटी सोच वाले व्यक्ति संपन्न लोगों की निंदा को ही सही मानते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हम इन लोगों का जितना भी भला करें ये हमारा बुरा ही करेंगे। ऐसे व्यक्ति निंदा का उत्तर न देने वाले लोगों को उनका अहंकार समझते हैं, अगर हम भी उनके जैसे बन जाते हैं, तो वे खुश हो जाते हैं। नीत्से ने भी कहा है आदमी के गुणों के कारण भी लोग उनसे जलते हैं। इन ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय है कि एकांत में रहा जाए । जो लोग संसार में नए मूल्यों का निर्माण करते हैं वे इनसे दूर ही रहते हैं और ईर्ष्या से बचने के लिए ईर्ष्यालु व्यक्ति को सोच-विचार की आदत का त्याग कर देना चाहिए। उसे अपनी सुविधाओं के अभाव को पूरा करने का रचनात्मक उपाय खोजना चाहिए। इस उपाय को खोजने की ललक उसके अंदर ईर्ष्या को समाप्त कर देगी।

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