Wednesday, 2 January 2019

गुरु नानकदेव एक संस्मरणात्मक निबंध का सारांश

गुरु नानकदेव एक संस्मरणात्मक निबंध का सारांश

guru nanakdev
हिंदी गद्यकारों में विशिष्ट स्थान रखने वाले महान साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘गुरु नानकदेव’ एक संस्मरणात्मक निबंध है। इस निबंध में द्विवेदी जी ने सिक्ख धर्म के प्रवर्तक और महान संत गुरु नानकदेव के जीवन, चिंतन, सामाजिक कार्यों एवं आदर्श आचरण की झलक प्रस्तुत की है। द्विवेदी जी ने इस निबंध के माध्यम से महान् संत गुरु नानकदेव के आदर्श जीवन का अनुकरण करने और मानवतावादी मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित किया है। लेखक कहते हैं कि भारतवर्ष में कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पूरे भारत में कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। इस दिन शरद् ऋतु में चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं सहित पूरे वैभव पर होता है। इसी दिन महान् संत गुरु नानकदेव का जन्म उत्सव मनाया जाता है। भारतीय जनता ने बहुत समय से कार्तिक पूर्णिमा से ही गुरु नानकदेव के जन्म का संबंध जोड़ दिया है। गुरु किसी एक ही दिन भौतिक शरीर में अवतरित हुए होंगे परंतु श्रद्धालुओं के मन में वे प्रतिक्षण प्रकट होते हैं। गुरु जिस क्षण भी मन में प्रकट हो जाएँ, वही उत्सव का क्षण होता है। चंद्रमा के साथ महान पुरुषों जैसे राम व कृष्ण के साथ ‘चंद्र’ जोड़कर जनता खुशी प्रकट करती है, उसी प्रकार नानकदेव के साथ पूर्णचंद्र जोड़कर जनता खुश होती है। भारत की मिट्टी में महापुरुषों को जन्म देने का विशेष गुण है। आज से पाँच सौ साल पहले जब देश में अनेक कुसंस्कार व्याप्त थे और देश जातिवाद, संप्रदाय, धर्म व संकीर्ण विचारों वाले घमंडी व्यक्तियों के कारण खंडित हो रहा था, उस समय गुरु नानकदेव का जन्म हुआ। ऐसी कठिन स्थिति में इन सड़ी-गली रूढ़ियों, दूषित संस्कारों आदि को दूर करने के लिए अनेक संतों ने जन्म लिया। इन संतों में नानकदेव ऐसे संत थे जो शरद्काल के चंद्रमा की तरह शांत थे। इनके मधुर वचनों ने विचार और आचरणों की बहुत बड़ी क्रांति ला दी। ये किसी का मन दु:खी किए बिना कुसंस्कारों को छिन्न करके श्रद्धालुओं के मन में विराजमान हो गए। नानकदेव जी ने प्रेम का उपदेश दिया क्योंकि मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य प्रेम है, वही उसका साधन व मार्ग है। प्रेम से ही मान-अभिमान, छोटे-बड़ों का भेद समाप्त हो जाता है। इनकी वाणी में एक अद्भुत शक्ति थी, जो सहज रूप से हृदय से निकलती थी। इसी मीठी वाणी से गुरु नानकदेव ने भटकती हुई जनता को मार्ग दिखाया। लेखक कहते हैं कि गुरु नानकदेव ने क्षुद्र अहंकार व छोटी मानसिकता के लिए शाध्Eाार्थ को गलत बताया है। उन्होंने जनता के समक्ष सत्य को प्रत्यक्ष कर देना उचित मार्ग बताया है। भगवान जब भलाई करते हैं तो गुरु नानकदेव जैसे संतों को उत्पन्न कर देते हैं, जो नैतिकता से गिरे हुए लोगों के मन में भी प्रेम की भावना जगा देते हैं। आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व भी ऐसी ही एक भलाई भगवान ने की जो आज भी क्रियाशील है। हे महागुरु, आपके चरणों में हम प्रार्थना करते हैं कि हमारे अंदर आशाओं का संचार करो, मित्रता व प्रेम की अविरल धारा में हमें डुबो दो अर्थात् हमारे हृदय में मित्रता व प्रेम की भावना का संचार करो। हम उलझे हुए व भटके हुए हैं पर अभी भी उपकार मानने का गुण हमसे दूर नहीं हुआ है। हम आपकी अमृतमयी वाणी को अभी तक भूले नहीं हैं। अत: हमें आप उचित मार्ग दिखाएँ तथा ऋणी भारत का प्रणाम स्वीकार करें।

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