Monday, 14 January 2019

क्या लिखूँ पाठ का सारांश - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

क्या लिखूँ पाठ का सारांश - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

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'क्या लिखूँ’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी का एक ललित निबंध है। जिसके विषय-प्रतिपादन, प्रस्तुतीकरण एवं भाषा-शैली में इनकी सभी विशेषताएँ सन्निविष्ट हैं। इस निबंध की उत्कृष्टता के दर्शन उस समन्वित रचना-कौशल में होते हैं, जिसके अंतर्गत लेखक ने दो विषयों पर निबंध की विषय सामग्री करने आदि का संकेत ही नहीं किया है, वरन् संक्षिप्त रूप में उन्हें प्रस्तुत भी कर दिया है। 

बख्शी जी के अनुसार आज उनके लिए लेखन कार्य करना अनिवार्य है। उन्हें अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर का कथन याद आ गया कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है, जब मनुष्य लेखन के लिए उद्धत होता है। उस समय उसे विषय के बारे में ध्यान ही नहीं रहता है। जिस प्रकार हैट को टाँगने के लिए किसी भी खूँटी का प्रयोग किया जा सकता है, उसी प्रकार मन के भावों को किसी भी विषय पर प्रस्तुत किया जा सकता है। गार्डिनर साहब का यह कथन सर्वथा उपयुक्त है, परंतु लेखक बख्शी जी को लेखन कार्य के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता है। लेखक को नमिता ने ‘दूर के ढोल सुहावने’ व अमिता ने ‘समाज सुधार’ पर निबंध लिखने को दिया, जिस पर आदर्श निबंध लिखकर उन्हें निबंधरचना का रहस्य समझाना था। इसके लिए लेखक ने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं। एक विद्वान का कथन था कि निबंध छोटा होना चाहिए क्योंकि यह बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। परंतु निबंध के दो अंग सामग्री और शैली है। इसलिए लेखक को सामग्री एकत्र करने के लिए मनन करना होगा। लेखक के पास ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर निबंध लिखने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। विद्वानों के अनुरूप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। जिसमें लेखक कठिनाई का अनुभव करता है। 

जिस प्रकार ए. जी. गार्डिनर को अपने लेखों का शीर्षक बनाने में कठिनाई होती थी। इसी प्रकार शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई नहीं होती थी जितनी कि उनके नामकरण से होती थी, इसलिए उन्होंने अपने नाटक का नाम ‘जैसा तुम चाहो’ रख दिया। लेखक को दूसरा प्रमुख कार्य निबंध की शैली का निश्चय करना था, जिससे अमिता और नमिता यह न समझें कि यह निबंध मोटी अक्ल वालों के लिए लिखा गया है। अंग्रेजी के निबंधकार मानटेन ने जो कुछ स्वयं देखा, सुना, अनुभव किया उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। जो कि उनके मन की स्वच्छंद रचनाएँ थी। लेखक ने यहाँ अमीर खुसरो की प्रतिभा का उदाहरण दिया है कि एक बार वे एक कुएँ पर गए जहाँ चार औरतें पानी भर रही थी। पानी माँगने पर एक ने खीर, दूसरी ने चर्खे, तीसरी ने कुत्ते व चौथी ने ढोल पर कविता सुनाने की इच्छा प्रकट की। अमीर खुसरो विद्वान थे। उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छा पूरी कर दी–
खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।
लेखक कहता है मैं उनके जितना प्रतिभाशाली नहीं हूँ कि एक ही निबंध में दोनों विषयों का समावेश कर दूँ। लेखक कहता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं क्योंकि जब ढोल पास में बजता है तो लोगों के कानों को पीड़ा होती है, परंतु जब ढोल की ध्वनि दूर से आती है तो वही मधुर ध्वनि बनकर लोगों के मन को आनंदित करती है और मनुष्य के मन में विभिन्न कल्पनाएँ जन्म लेने लगती हैं। लेखक के अनुसार जिसने अभी तक जीवन-संघर्षों का सामना नहीं किया है उन्हें भविष्य सुंदर लगता है पर जो इससे गुजर चुके हैं उन्हें अतीत की स्मृतियों में ही रहना अच्छा लगता है। दोनों ही अपने वर्तमान से संतुष्ट नहीं होते, युवा, भविष्य को वर्तमान व वृद्ध, अतीत को वर्तमान बनाना चाहते हैं। जिस कारण वर्तमान सदैव सुधारों का काल बना रहता है। मनुष्य के इतिहास में हमेशा सुधारों की आवश्यकता हुई है। कितने ही सुधारक जैसे– बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य आदि हुए। अत: न दोषों का अंत होता है और न सुधारों का। जो अतीत में सुधार थे वे भविष्य में दोष बन जाते हैं। हिंदी में भी प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है, परंतु वह भी समय के साथ-साथ अतीत का स्मारक होता जाता है। आज जो युवा हैं वे ही कल वृद्ध होकर अतीत को याद करेंगे और नए युवा वर्ग का जन्म होगा, जो भविष्य की सुखद कल्पना करेगा। दोनों ही सुखद कल्पनाओं में रहते हैं। क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

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