शिक्षण के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत स्पष्ट कीजिये (Psychological Principle of Teaching in Hindi)

शिक्षण के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत स्पष्ट कीजिये (Psychological Principle of Teaching in Hindi) बालकों की क्षमताओं रुचियों तथा बुद्धि को मध्य नजर रखते हु

शिक्षण के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत स्पष्ट कीजिये (Psychological Principle of Teaching in Hindi)

बालक के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए शिक्षण को प्रभावशाली बनाने का प्रयास करते हैं। बालकों की क्षमताओं रुचियों तथा बुद्धि को मध्य नजर रखते हुए शिक्षण के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का निर्माण किया गया है। बाल केंद्रित शिक्षण द्वारा अधिगम के लिए एक उचित वातावरण का निर्माण किया जा सकता है, जिससे कि बालकों में अधिगम के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है और वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति भी संभव है। 

शिक्षण के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत (Psychological Principles of Teaching)

  1. अभिप्रेरणा का सिद्धांत
  2. आवृत्ति एवं अभ्यास का सिद्धांत
  3. परिवर्तन, विश्राम एवं मनोरंजन का सिद्धांत
  4. तत्परता का सिद्धांत
  5. प्रतिपुष्टि एवं पुनर्बलन का सिद्धांत
  6. सहानुभूति एवं सहयोग का सिद्धांत
  7. ज्ञानेंद्रियों को प्रशिक्षित करने का सिद्धांत 
  8. समूह गतिशीलता का सिद्धांत
  9. स्व-अधिगम को प्रोत्साहित करने का सिद्धांत
  10. सृजनात्मक एवं आत्माभिव्यक्ति के पोषण का सिद्धांत

अभिप्रेरणा का सिद्धांत (Principle of Motivation)

अभिप्रेरक किसी भी व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए सक्रिय एवं शक्ति प्रदान करते हैं। छात्र अपने अधिगम संबंधी लक्ष्यों को तभी प्राप्त कर सकता है यदि वह अभिप्रेरित है। अध्यापक छात्रों के पूर्व अनुभवों तथा विशेषकर रुचियों को प्रयोग में लेकर अधिगम के लिए अभिप्रेरित कर सकता है।

आवृत्ति एवं अभ्यास का सिद्धांत (Principle of Repetition and Exercise)

निरंतर अभ्यास द्वारा व्यक्ति निपुण बनता है। शिक्षण प्रक्रिया में आवृत्ति एवं अभ्यास का अत्यंत महत्त्व है। आवृत्ि द्वारा छात्र विषय को सफलतापूर्वक स्मरण रख पाते हैं। अभ्यास के लिए अध्यापक छात्रों को गृह कार्य दे सकता है।

परिवर्तन, विश्राम एवं मनोरंजन का सिद्धांत (Principle of Change, Rest and Recreation)

एकरसता तथा थकान अधिगम गति को धीमा करती है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दौरान विश्राम तथा मनोरंजन सं छात्रों का दिमाग विश्रांत होता है, जिससे कि छात्र अधिक अधिगम लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। उद्दीपक क भिन्नता, विषय-वस्तु, शिक्षण विधियों एवं शिक्षण अधिगम वातावरण में परिवर्तन लाने से तथा छात्रों के विश्राम एव मनोरंजन का विशेष ध्यान रखने से शिक्षण प्रभावशाली होता है।

तत्परता का सिद्धांत (Principle of Readiness )

छात्रों को अधिगम के लिए तत्पर होना आवश्यक है। यदि छात्र अधिगम के लिए उद्यत नहीं है तो अध्यापक क यह कर्त्तव्य बनता है कि वह उनको अधिगम के लिए तत्पर करें। यह सिद्धांत अध्यापकों को सुझाव देता है कि शिक्षण के लिए उन्हीं क्रियाओं को चयन करें जो छात्रों की मानसिक परिपक्वता के अनुरूप हों ।

प्रतिपुष्टि एवं पुनर्बलन का सिद्धांत (Principle of Feedback and Reinforcement)

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में अधिगम संबंधी सिद्धांतों ने प्रतिपुष्टि एवं पुनर्बलन का महत्त्व सिद्ध कर दिया है। छात्र उस कार्य को दोहराएगा जिसके लिए उसे पुनर्बलन दिया गया हो अन्यथा जिस कार्य लिए पुनर्बलन नहीं दिय गया हो उसे छोड़ देगा। इसलिए अध्यापक को छात्रों की अधिगम संबंधी जानकारी जल्द से जल्द देनी चाहिए। इस प्रकार प्रतिपुष्टि के लिय पुनर्बलन देने की प्रक्रिया से अधिगम प्रभावशाली होता है।

सहानुभूति एवं सहयोग का सिद्धांत (Principle of Sympathy and Co-operation)

एक अच्छा अध्यापक अच्छे मित्र, दार्शनिक तथा मार्गदर्शक के समान होता है। अधिकतर परिस्थितियों में छात्र अध्यापक से भयभीत रहते हैं। यह बहुत हानिकारक होता है। अध्यापक की विचारधारा प्रजातांत्रिक होनी चाहिए जिससे कि वह छात्रों की अनुभूतियों तथा विचारों को समझ सके, उनके प्रति सहानुभूति तथा सहयोग प्रदान कर सके 

ज्ञानेंद्रियों को प्रशिक्षित करने का सिद्धांत (Principle of Providing Training to Senses)

ज्ञानेंद्रियों को ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी कहते हैं। सभी ज्ञानेंद्रियों में देखना सबसे महत्त्वपूर्ण है। एक व्यक्ति लगभ 80 प्रतिशत ज्ञानेद्रिंय से देखने का अनुभव ही प्राप्त करता है। हम सीखते हैं-

  • 1.0 प्रतिशत स्वाद चखने से 
  • 1.5 प्रतिशत स्पर्श से 
  • 3.5 प्रतिशत सूंघने से 
  • 11.0 प्रतिशत सुनने से एक 
  • 83.0 प्रतिशत देखने से।

यदि एक ज्ञानेंद्रिय के स्थान पर कई ज्ञानेंद्रियों को शिक्षण का आधार बनाया जाये तो निश्चय ही शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति अधिक सफलता से हो सकती है। इसलिए अध्यापक को छात्रों की ज्ञानेंद्रियों को प्रशिक्षण अवश्य देना चाहिए।

समूह गतिशीलता का सिद्धांत (Principle of Group Dynamics)

एक प्रजातांत्रिक विचारधारा वाला अध्यापक समूह गतिशीलता का उपयोग भली-भाँति कर सकता है। छात्र समूह मे बेहतर सीखते हैं तथा उनमें सहनशीलता, सहयोग तथा बलिदान की भावनाएँ विकसित होती हैं। इसलिए अध्यापक को समूह गतिशीलता का उपयोग अवश्य करना चाहिए ।

स्व-अधिगम को प्रोत्साहित करने का सिद्धांत (Principle of Encouraging Self - Learning)

अच्छे अध्यापक को छात्रों में स्व-अधिगम की आदत उचित परिस्थितियों तथा प्रशिक्षण द्वारा डालनी चाहिए। स्व-अधिगम का अभिप्राय छात्रों को निस्सहाय करना नहीं है। अध्यापक एक मार्गदर्शक के रूप में छात्रों को व्यक्तिगत शिक्षण की ओर अग्रसर करता है जिससे छात्रों में आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्भरता की उपलब्धि होती है।

सृजनात्मक एवं आत्माभिव्यक्ति के पोषण का सिद्धांत (Principle of Fostering Creativity and Self-Expression)

अधिकतर अध्यापक प्रसन्न होते हैं, जब छात्र जैसा कि पढ़ाया गया हो वैसा ही रट कर अध्यापक के सम्मुख पेश करते हैं। यह अनुचित है। अध्यापक को उन छात्रों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो कक्षा में नवीन तथा कल्पनाशील विचार पेश करते हैं क्योंकि किसी भी देश का भविष्य सृजनात्मक विचारों पर भी निर्भर होता है। इसलिए अध्यापक को कक्षा में ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए जिससे कि छात्रों में सृजनात्मकता तथा आत्माभिव्यक्ति बढ़ सके। 

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