लोक साहित्य के संग्रह का इतिहास - Lok Sahitya Ke Sangrah Ka Itihas

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लोक साहित्य के संग्रह का इतिहास

लोक साहित्य के अध्ययन की श्रृंखला की आदिम कड़ी के रूप में हम उन अंग्रेज अधिकारियों तक जाते हैं जो भारत में आकर यहां प्रशासनिक कार्य के साथ ही साथ लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य के संग्राहक एवं आलोचक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते रहे। इनके अतिरिक्त ईसाई धर्म प्रचारार्थ आए अनेक धर्मोपदेशकों ने भारत के विभिन्न जनपदों में अपने धर्म प्रचार के उद्देश्य से प्रेरित होकर उनकी बोली एवं लोक संस्कृति और साहित्य का ज्ञान प्राप्त कर उसे प्रकाशित भी किया। इस प्रकार भारतवर्ष में लोक साहित्य के अध्ययन का प्रारंभ अंग्रेजों के हाथों किया गया। इसका मूल कारण यही प्रतीत है कि यूरोप में समाजशास्त्र, नृ-विज्ञान एवं पुरातत्व आदि का अध्ययन करते समय लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य के अध्ययन की ओर पर्याप्त रुचि विद्यमान थी और उस वातावरण में शिक्षा प्राप्त करके आए हुए अंग्रेज अधिकारियों की रुचि यहां की बोलियों, रीति-रिवाजों, मेलों, त्योहारों, लोक साहित्य के विविध रूपों के ज्ञानार्जन की ओर प्रवृत्त हुई। इस प्रयत्न का परिचय देने के लिए कालक्रमानुसार निम्न महत्वपूर्ण विद्वानों और उनके कार्यों का उल्लेख करना उचित प्रतीत होता है।

1829 ई. - कर्नल टॉड द्वारा भारतीय लोक संस्कृति के संकलन एवं प्रकाशन के शुभ कार्य का श्रीगणेश किया गया। उनका 'एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान नामक प्रसिद्ध ग्रंथ भी प्रकाशित हुआ, जिसे विद्वान लेखक ने राजस्थान की लोकगाथाओं के आधार पर संपादित एवं संकलित किया। राजस्थानी लोक संस्कृति के क्षेत्र में यह मील का पत्थर है।

1854 ई. – रॉय एशियाटिक सोसाइटी के मुखपत्र में श्री जे. एबट नामक विद्वान का एक लेख पंजाब की वीर गाथाओं का परिचय प्रस्तुत करता है। 1866 ई.- सर रिचर्ड टैम्पुल नामक विद्वान ने मध्य प्रदेश की जंगली जातियों की लोकवार्ता एवं लोक साहित्य को संकलित कर प्रकाशित कराया। 1868 ई. – मिस फ्रेजर द्वारा दक्षिण भारत की लोक- कहानियों का एक संग्रह 'ओल्ड डेकन डेज्' नाम से लिखा गया ।

1871 ई. - चार्ल्स ई. ग्रोवर का 'फ्रॉम सांग्स ऑफ सदर्न इंडिया नामक ग्रंथ, भारतीय लोकगीतों का सर्वप्रथम संग्रह कहा जा सकता है। कन्नड़, कुर्ग, तमिल, कूरल, मलयालम तथा तेलुगु आदि जनपदीय बोलियों के लोकगीतों के संग्रह के साथ अंग्रेजी में उनके अनुवाद का कार्य किया गया, जो इस दिशा में किया गया सार्थक प्रयत्न ही कहा जाएगा।

1872 ई.- डाल्टन का एक ग्रंथ 'डिस्क्रिप्टिव एथ्नॉलॉजी ऑफ बंगाल' बंगाल की लोक संस्कृति का विस्तृत परिचय देता है ।

1872 ई. में ही आर.सी. कपवेल ने 'इंडियन एंटिक्वैरी' नामक पत्रिका में एक निबंध लिखा, जिसका शीर्षक था- तामिल पॉपूलर पोइट्री ।

1876 ई. - एफ.टी. कॉल ने इसी पत्रिका में एक निबंध प्रकाशित कराया, जिसका विषय था- द राजमहल हिलमैन्स सांग्स |

इसी वर्ष जी.एच. दामंत ने बंगाली लोककथाओं का एक संग्रह बंगाली 'फोकलोर ऑफ दीनाजपुर' शीर्षक से प्रकाशित कराया और इसी व्यक्ति ने 1879 ई. तक निरंतर ‘इंडियन एण्टिक्वैरी' नामक पत्रिका में लोक साहित्य पर अनेक निबंध लिखकर लोक साहित्य को प्रकाश में लाने का शुभ कार्य किया।

1882 ई.– श्रीतारूदत का ‘एंशिएण्ट बैलाड्स एंड लीजेन्ड्स ऑफ हिंदुस्तान' नामक ग्रंथ प्रकाशित हुआ ।

1883 ई. – लाल बिहारी डे ने बंगाली लोककथाओं का सर्वप्रथम संग्रह 'फोक टेल्स ऑफ बंगाल' नाम से प्रकाशित किया। इसी बंगाली विद्वान लेखक ने आगे चलकर 'बंगाल पीजेन्ट लाइफ' नामक ग्रंथ भी लिखा, जिसमें बंगाल के कृषि जीवन का परिचय प्रस्तुत किया गया।

1884 ई.- सर आर. सी. टैम्पुल ने पंजाब की लोककथाओं का प्रथम प्रयास 'लीजेन्ड्स ऑफ पंजाब' नाम से प्रकाशित कराया, जिसमें छ: वर्गों (साइकिल्स) में प्राप्त पंजाबी लोकगाथाओं का विस्तृत परिचय दिया गया है। 

1885 ई. - नटेश शास्त्री द्वारा लिखित 'फोकलोर इन सदर्न इंडिया' नामक ग्रंथ प्रकाश में आया। इसी वर्ष ई. जे. रॉबिन्सन ने दक्षिण भारत के लोकगीतों एवं लोककथाओं का सम्मिलित संग्रह 'टेल्स एण्ड पोइम्स ऑफ साउथ इंडिया' नाम से प्रकाशित कराया। इसकी विशेषता यह भी थी कि साथ में अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया था। इसी वर्ष सर जी. ए. ग्रियर्सन ने इंडियन इन्टिक्वैरी में एक लेख 'द सांग्स ऑफ आल्हाज मैरिज' शीर्षक से लिखा ।

1886 ई. - सर ग्रियर्सन ने भोजपुरी जनपद के बिरहा, जैतसार और सोहर नामक लोकगीतों का संकलन 'सम भोजपुरी फोक सांग्स' नाम से प्रकाशित किया। इसमें लोकगीतों के मूलपाठ के साथ अंग्रेजी अनुवाद भी दिया गया है। इसी लेखक का अन्य प्रयास है 'बिहार पीजेंट लाइफ' जो भारतीय लोक संस्कृति क्षेत्र का मील का पत्थर कहा जाता है।

1891 ई. - विलियम कुक ने एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया जिसने पांच-छः वर्ष तक अनेक निबंध प्रकाशित किए गए, जो लोक साहित्य का परिचय प्रस्तुत करते थे। इस पत्रिका का नाम था नॉर्थ इंडियन नोट्स एण्ड कवैरीज।

1896 ई. में इसी लेखनी से प्रसूत 'पॉपूलर रिलीजन एण्ड फोकलोर ऑफ नादर्न इंडिया' तथा 'कास्ट्स एण्ड ट्राइब्ज ऑफ नॉर्थ-वेस्ट प्रॉविन्सेज' नामक पुस्तक प्रकाश में आई ।

1899 ई. में आर.एम. लॉकरनैस ने 'इंडियन एन्टिक्वैरी' नामक पत्रिका में पुर्तगाली द्वीप-समूहों के कुछ लोकगीतों का परिचय देने वाला एक निबंध लिखा ।

1905 ई. में एफ. हॉन ने उर्राव लोगों के 290 लोकगीतों का एक संग्रह 'फोकलोर इन ओरीजीनल' नामक प्रकाशित कराया।

1906 ई. में ई. थस्टन ने 'एथ्नोग्राफिक नोट्स इन सदर्न इंडिया' नामक पुस्तक प्रकाशित करायी। इसी लेखनी से निःसृत 1909 ई. में 'कास्ट्स एण्ड ट्राइब्स ऑफ सदर्न इंडिया' नामक दूसरी तथा 1912 ई. में 'ऑमन्स एंड सुपरस्टीशन्स ऑफ सदर्न इंडिया' नामक तीसरी पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें अंधविश्वासों, रूढ़ियों एवं जादू टोनों का विस्तृत परिचय दिया गया है।

1907 ई. - डब्ल्यू. टी. डेम्स ने वीरगाथाओं, प्रेमगीतों एवं पहेलियों का संग्रह 'पॉपूलर पोइट्री ऑफ बिल्लोचीज' शीर्षक से प्रकाशित कराया ।

इस प्रकार 1920 ई. तक जितने संग्रह एवं व्याख्याएं प्रकाशित हुईं, वे सब प्रायः अंग्रेज विद्वानों द्वारा ही संगृहीत थीं। किंतु इसके बाद बंगाल में दिनेश चंद्र सेन, बिहार में शरदचंद्र राय, उत्तर प्रदेश में रामनरेश त्रिपाठी और गुजरात में झबेरचंद्र मेघाणी ने अपने-अपने जनपदों के लोक संस्कृति साहित्य को प्रकाशित कराने का भागीरथ प्रयत्न किया। डॉ. दिनेश चंद्र सेन ने 1923 ई. से 1932 ई. के बीच चार भागों में ईस्टर्न बंगाली बैलड्स नाम से लोकगाथाओं का प्रकाशन किया। इन्होंने ही 1920 ई. में अपने भाषणों का एक संग्रह 'फोक लिटरेचर ऑफ बंगाल' नाम से दिया। बिहार के श्री शरतचंद्र राय ने 'मैन इन इंडिया' नामक पत्रिका निकाली, 1925 ई. में 'द बिरहाज', 1928 ई. में 'ओरॉय रिलीजन एंड कस्टम्स', 1936 ई. में 'द भुइयांज ऑफ ओरीसा और 1937 ई. में 'खारीज ' नामक ग्रंथों का प्रणयन किया। श्री झबेरचंद मेघाणी ने गुजरात के लोकगीतों को 4 भागों में 'रूढ़ियाली राते' शीर्षक से प्रकाशित कराया- (1925 से 1942 के बीच), चूंदड़ी दो भागोंमें (1928-29), सोर की गीत - कथाएं (1931), लोक साहित्य समालोचन (1939 ई.) जैसे अमूल्य ग्रंथ दिए। 

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के अन्त में लोक साहित्य के संग्रह के कार्य का श्रीगणेश श्री रामनरेश त्रिपाठी द्वारा किया गया। उनका 1929 ई. में कविता कौमुदी (भाग 5) प्रकाश में आया, जिसमें उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बिहार के लोकगीत संगृहीत थे। त्रिपाठी की एक अन्य पुस्तक 'हमारा ग्राम - साहित्य' नाम से प्रकाशित हुई, जिसमें लोकक्तियों का संग्रह संकलन समाविष्ट है।

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