जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत का वर्णन कीजिये

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जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के सिद्धांत का वर्णन कीजिये 

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का परम्परागत सिद्धांत 

    जाति प्रथा की उत्पत्ति का परम्परागत सिद्धांत सबसे प्राचीन है। इसके प्रतिपादक वेद, शास्त्र, उपनिषद व स्मृतियों के रचयिता हैं। इसका स्रोत ऋग्वेद का मन्त्र पुरुष सूक्त है। इसके अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य उदर से और शूद्र उसके पैर से उत्पन्न हुए। ब्राह्मणों का जन्म सृष्टिकर्ता के मुख से होने के कारण उनको श्रेष्ठ समझा गया तथा क्षत्रिय को बाहु से उत्पन्न होने के कारण उनका कार्य शक्ति व शौर्य से सम्बन्धित हुआ। इसी प्रकार वैश्यों का जन्म उदर उनको श्रेष्ठ समझा गया तथा क्षत्रिय को बाहु से उत्पन्न होने के कारण उनका कार्य कृषि और व्यापार माने गये। पैरों से उत्पन्न होने के कारण शूद्रों का कार्य उपरोक्त तीन जातियों की सेवा हुआ। अंगों के क्रमानुसार जातियों को सामाजिक प्रतिष्ठा मिली।

    मूल्यांकन - 

    1. यह सिद्धान्त वैज्ञानिक जिज्ञासाओं को सन्तुष्ट नहीं करता। आज के युग में इस अलौकिक कल्पना पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
    2. यह सिद्धान्त वर्ण की उत्पत्ति को बताता है। भ्रमवश इसे जाति प्रथा की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने वाला सिद्धान्त माना जाता है।
    3. इस सिद्धान्त का स्रोत सूक्त का मौलिक मन्त्र नहीं है, बल्कि बाद में जोड़ा गया है। 

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का राजनैतिक सिद्धांत

    1. ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थिति मिली होने के कारण ऐसा लगता है कि जाति प्रथा ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मणों की रचना है। किन्तु यह बात समझ में नहीं आती कि हजारों वर्षों से ब्राह्मणों की यह चतर योजना लोगों की समझ में नहीं आई और सभी लोग इसे स्वेच्छा से स्वीकार किये रहे।
    2. जाति प्रथा उन क्षेत्रों में भी मिलती है जहाँ ब्राह्मणों का प्रभाव नहीं है।
    3. यह सिद्धान्त ब्राह्मणों और क्षत्रियों की उत्पत्ति पर प्रकाश डालता है किन्तु वैश्य और शूद के विषय में मौन है।
    4. यह सिद्धान्त व्यावसायिक भिन्नता को स्पष्ट नहीं करता।

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का व्यावसायिक सिद्धांत

    व्यावसायिक सिद्धांत को कुछ लोग कार्यात्मक सिद्धान्त भी कहते हैं। नेसफील्ड दहलमन, इबेटसन व ब्लन्ट ने जाति प्रथा को व्यवसाय के आधार पर स्पष्ट किया। इसमें सबसे प्रमुख नेसफील्ड हैं इनकी दृष्टि से जाति की उत्पत्ति में धर्म का कोई हाथ नहीं है। उसका उदभव समाज में निहित है। नेसफील्ड का विश्वास है कि समस्त जाति प्रथा का आधार पेशा या व्यवसाय है। इसीलिए उसने यह निष्कर्ष निकाला है। "भारत में जाति प्रथा की उत्पत्ति के लिए पेशा और केवल पेशा ही एकमात्र उत्तरदायी कारण है।

    मूल्यांकन - 

    1. नेसफील्ड के सिद्धान्त को कई कारणों से मान्यता नहीं मिली। जाति जैसी जटिल संस्था की उत्पत्ति को केवल पेशे के आधार पर नहीं समझाया जा सकता।
    2. हट्टन ने लिखा है कि यदि पेशे के आधार पर ऊँच-नीच का भेदभाव है तो क्या कारण है कि देश के विभिन्न भागों में रहने वाले तथा एक पेशे को अपनाने वाले व्यक्तियों के सामाजिक स्तरों में इतना अन्तर पाया जाता है।
    3. इस सिद्धान्त में धर्म व प्रजाति की अवहेलना हुई है।

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का प्रजातीय सिद्धांत

    जाति प्रथा की उत्पत्ति को प्रजातीय आधार पर सबसे अधिक संख्या में विद्वानों ने स्पष्ट किया है। रिजले ने सबसे पहले इसे वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया। बाद में राय, दत्ता, घुरिये, मजूमदार, मैक्स वेबर व क्रोबर आदि अनेक विद्वानों ने प्रजातीय सिद्धान्त को स्वीकार किया।

    रिजले के अनुसार जाति प्रथा की उत्पत्ति में तीन कारण प्रमुख हैं : (i) प्रजातीय सम्पर्क (ii) वर्णसंकरता (iii) वर्णभेद की भावना।

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का धार्मिक सिद्धांत

    सेनार्ट ने जाति की उत्पत्ति में धार्मिक कार्यों को प्रमुख माना है और अपने सिद्धांत में होकार्ट के भोजन सम्बन्धी प्रतिबन्धों की कमी को दूर किया। इन्होंने भोजन सम्बन्धी निषेधों के आधार पर जाति प्रथा की उत्पत्ति को स्पष्ट किया। भोजन के प्रतिबन्ध, पारिवारिक पूजा और कुल देवताओं के अन्तर के कारण लगाये गये साथ ही आर्यों के आने पर प्रजातीय शुद्धता व धार्मिक पवित्रता की भावना कट हुई और समूह एक-दूसरे से पृथक हो गये। पुरोहित वर्ग ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए धर्म के आधार पर अपनी स्थिति ऊँची रखते हुए जाति प्रथा का निर्माण किया।

    मूल्यांकन - 

    1. होकार्ट के सिद्धांत का प्रमुख दोष यह है कि उन्होंने जाति संस्था को सामाजिक न मानकर पूरी तरह से धार्मिक माना है।
    2. उन्होंने जाति की उत्पत्ति में देवताओं पर बलि चढ़ाने के धार्मिक कृत्य को आवश्यकता से अधिक बल दिया । यह आधार जाति प्रथा के विकास के लिए पर्याप्त नहीं है।
    3. यह भी नहीं माना जा सकता कि जातियों की ऊंचाई-निचाई केवल पेशों की पवित्रताअपवित्रता की मात्रा पर निर्भर है। इसमें आर्थिक आधार की अवहेलना हुई है।

    जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का आदिम संस्कृति सिद्धांत

    1. 'माना' की धारणा संसार के अनेक भागों में प्रचलित है, किन्तु उन जगहों में जाति प्रथा का विकास नहीं हुआ है। इससे इस कारक के आधार पर ही जाति-प्रथा की उत्पत्ति नहीं समझायी जा सकती।

    2. सामाजिक संस्तरण को माना के आधार पर समझा जा सकता है, किन्तु जाति-प्रथा की उत्पत्ति के लिए यह पर्याप्त नहीं है।

    सांस्कृतिक एकीकरण का सिद्धांत

    1. विभिन्न प्रजातियों की विशेषताओं के एकीकरण की पुष्टि इतिहास में नहीं होती।

    2. यदि सांस्कृतिक एकीकरण से जाति को जन्म मिला तो जाति से जन्म का महत्व कैसे हो गया।

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