पंच परमेश्वर कहानी का प्रतिपाद्य - Panch Parmeshwar Kahani Ka Pratipadya

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पंच परमेश्वर कहानी का प्रतिपाद्य - Panch Parmeshwar Kahani Ka Pratipadya

पंच परमेश्वर कहानी का प्रतिपाद्य - आलोचक और कथाकार गंगाप्रसाद विमल ने लिखा है, 'दरअसल 'पंच परमेश्वर' में पहली बार प्रेमचंद जीवन की कुछ जीवंत समस्याओं को लेकर आए थे। पंच परमेश्वर' का सारा विधान समस्याओं के अन्तर्वृत्त से अलग-अलग कथा - कोणों में विभक्त है। आरम्भिक कहानियों में विवरण की सपाटता में नाटकीय अन्विति के साथ-साथ अलग–अलग कथा - कोणों की उपस्थिति कहानी के विस्तृत फलक को नीरस भी बना देती है, किन्तु 'पंच परमेश्वर' में वह विस्तृत फलक होने पर भी नीरस नहीं है। जुम्मन और अलगू की मूल कथा में खाला की जायदाद, अलगू का सत्य भाषण, जुम्मन और अलगू वैमनस्य, बैल के लेन-देन का प्रसंग और अंत में सुखद पुनर्मिलन का निर्णय ही वे कथाकोण हैं जिनके बीच सहज कहानी चलती है और एक असहज मूल्यारोपण उभरता है। प्रेमचंद कृत्रिम स्वाभाविकता के लिए पंचायतों के वातावरण की सृष्टि तो करते हैं किन्तु उससे विश्वसनीयता के लिए वह कलात्मक सुघड़ता नहीं रख पाते जिनकी वजह से उत्तरवर्ती कहानियाँ विशिष्ट हो जाती हैं, क्योंकि वहाँ विश्वसनीयता के लिए वातावरण में एक आधिकारिक सचाई का भ्रम कलात्मक सुघड़ता के साथ बना रहता है।' प्रो विमल जिस कलात्मक सुघड़ता के अभाव को लक्षित कर रहे हैं वस्तुतः वह इसलिए प्रतीत हो रहा है कि जिस दृष्टि से हम न्याय व्यवस्था को देखने-समझने के मुखापेक्षी हो गए हैं वह उपनिवेशवाद की देन है। न्याय और ईमान के लिए हमारे देश में जिस उच्च नैतिक धरातल की कल्पना की जाती रही है वह सचमुच उतना दुर्लभ नहीं है जितना न्याय व्यवस्था के बाजारीकरण के चलते अब प्रतीत होता है। आश्चर्य नहीं कि प्रेमचंद स्वयं अंग्रेजी न्याय प्रणाली से घनघोर असहमत थे और महात्मा गाँधी भी आलोचक शिवकुमार मिश्र ने इस कहानी के सम्बन्ध में लिखा है, 'सचमुच पंच में परमेश्वर का, खुदा का वास होता है। इस तरह एक नैतिक आदर्श की प्रतिष्ठा इस कहानी में है, जो आदर्श जरूर है, किन्तु अप्राप्य नहीं। अपने दैनंदिन व्यवहार में हम सोते-जागते, सुबह के भूलों को शाम को घर वापस लौटते देखते हैं। यह आरोपित आदर्श नहीं है, हमारे साधारण जीवन- व्यवहारों में देखी गई सच्चाई है।

कहानी का उद्देश्य ऐसे ही नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना भी है जो प्रेमचंद ने स्वाधीनता आंदोलन से अंगीकार किए थे। ऊपर कहा जा चुका है कि प्रेमचंद मनुष्य में उच्च नैतिक गुणों को देखने के हिमायती थे और अपनी रचनाओं से ऐसे मानवीय समाज की रचना का स्वप्न देखते थे जहाँ गैर बराबरी - अन्याय न हो। यहाँ इस कहानी में खाला द्वारा पूछा गया सवाल 'क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?' असल में गहरा सवाल है जो मनुष्य सभ्यता के समक्ष सदैव खड़ा रहेगा । जैसे जैसे अधुनातन जीवन सभ्यता में ऐश्वर्य और सम्पन्नता की बढ़ोतरी दिखाई दे रही है ठीक उसी के साथ यह जीवन सभ्यता अनेक नैतिक संकटों से ग्रस्त भी दिखाई दे रही है। रोजमर्रा की सच्चाई है कि अब कोई किसी के झगड़े में बीच-बचाव नहीं करता बल्कि उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाने में ही समझदारी मानता है। यह एक या कुछ मनुष्यों का स्वभाव होने में उतनी दिक्कत नहीं है जितनी कि समूची मनुष्य जाति या सभ्यता का स्वभाव बन जाना। प्रेमचंद की यह पुरानी कहानी अन्याय के विरुद्ध सहज न्याय बोध की स्थापना की कहानी है। प्रेमचंद अपनी अन्यान्य रचनाओं की तरह यहाँ भी राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात नहीं भूलते और उसी अंतःप्रेरणा के चलते उनकी कहानी में यह कदापि असहज नहीं लगता कि खाला अपने न्याय के लिए अलगू चौधरी का चुनाव करे और समझू साहु जुम्मन शेख को अपना पंच स्वीकार करे ।

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