जालपा का चरित्र-चित्रण - Jalpa ka Charitra Chitran

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जालपा का चरित्र-चित्रण: इस लेख में गबन की नायिका जालपा के चरित्र की विशेषताएं बताते हुए चरित्र चित्रण किया गया है। 

जालपा का चरित्र-चित्रण - Jalpa ka Charitra Chitran

जालपा का चरित्र-चित्रण: गबन इस उपन्यास की कथा इसकी नायिका जालपा के आभूषण - प्रेम से आरम्भ होती है और बराबर उसी से गति पाती रहती है किन्तु उपन्यास का मूल उद्देश्य यह बताना बिल्कुल नहीं है कि एक स्न्नी के आभूषण - प्रेम का कितना भीषण दुष्परिणाम होता है। यदि यह दिखाना प्रेमचन्द का उद्देश्य होता तो वे रमानाथ के चरिन्न को इस तरह पतित रूप में प्रस्तुत नहीं करते। रमानाथ जिन विकट परिस्थितियों के भवंर - जाल में पड़ता है। वे जालपा के आभूषण - प्रेम से उतना उद्भूत नहीं है। जितना कि स्वयं उसकी चारित्रिक कमजोरी की उपज है। विदित हो कि प्रेमचन्द जी बार-बार यह महसूस कराते है कि रमानाथ परिस्थितियों के जो थपेड़े खा रहा है । वे उसी की निर्मित है, जालपा की नहीं, चाहें वह उसका उधार चन्द्रहार लाना हो या उधार पाटने के लिए उसके आभूषणों की चोरी करना हो या रतन के रूपयों से अपने उधार को पाटने की धांधली हो या म्यूनिसिपैलिटी के रूपयों को घर लेकर चले आने की चालाकी हो या रूप्या न दे पाने पर घर छोड़कर भाग जाना हो। इन सभी घटनाओं के मूल में स्वयं रमानाथ और उसकी कमजोरियाँ है। जालपा या जालपा का आभूषण - प्रेम नहीं । उसका आभूषण प्रेम तो आग में घी का काम करता है क्योंकि रमानाथ को जलाकर राख कर देनेवाली आग, जिसे उसका मध्यवर्गीय चरित्र कहना चाहिए, वह पहले से ही मौजूद थी।

प्रेमचन्द ने जालपा को जितना ही आभूषण की प्रेमिका चित्रित किया है, उतना ही उससे निस्पृह भी। वह यदि यह प्रण करती है कि जब तक चन्द्रहार नहीं आ जायेगा कोई दूसरा गहना न पहनूंगी तो इसलिए कि रमानाथ ने अपनी वास्तविक स्थिति को छिपाकर झूठी शान बघारी और धनपति होने का बोध कराया। यदि घर में आते ही उसे यह पता चल जाता कि यहाँ जीने-खाने की ही किल्लत है तो वह शायद गहनों के लिए जिद करने को कौन कहे, उनके नाम तक न वह लेती। यह विश्वास करने के लिए समय-समय पर व्यक्त किये गये उसके विचार इस प्रकार से देखा जा सकता है- जब जालपा के गहने चोरी हो गये तो रमानाथ की बनावटी सहानुभूति के उत्तर में उसने कहा- ' तो मैं तुमसे गहनों के लिए रोती तो नहीं हूँ। भाग्य में जो लिखा था वह हुआ..................जो औरते गहना नहीं पहनती, क्या उनके दिन नहीं कटते ?'

जालपा के ये वाक्य उसके चरित्र की उदात्तता का परिचय देते हैं, उस निम्नता का नहीं जो पति को पतित करती है या उसे दुष्कर्म करने के लिए बाध्य करती है। प्रेमचन्द जी ने निरन्तर जालपा के चरित्र को आभा मण्डित किया है। यही इस बात का प्रमाण है कि वे उसकी आभूषणप्रियता को उतना निन्द्य नहीं मानते हैं जितना कि रमानाथ की प्रदर्शन - भावना, झूठी-मूठी शान और मिथ्या गौरव की भावना को।

इसी उपन्यास में रतन और देवीदीन की बुढ़िया दो और स्त्रियाँ हैं जिन्हें गहनों से विशेष लगाव है, लेकिन रतन जहाँ एक धनी परिवार की ओर अपने पति की लाडली पत्नी है, वहीं बुढ़िया उद्योगशील एवं कर्मठ; वह अपने पति के बूते पर गहनों का शौक नहीं पूरा करती। इसलिए वह एक मिथ्यापूर्ण परिस्थिति में जीती है। यदि जालपा को अपनी वास्तविक आर्थिक दशा की जानकारी होती तो वह आभूषणों की जरा सी भी लालसा अभिव्यक्त नहीं करती, और तब उसकी आभूषण प्रियता रतन या बुढ़िया की आभूषणप्रियता के समक्ष एकदम नगण्य साबित होती है। हाँ, जालपा का आभूषण - प्रेम इस उपन्यास का मूल कथ्य तब हो सकता था। यदि वह उनके लिए किसी प्रकार की कृतघ्नता या अविवेकपूर्ण व्यवहार का परिचय देती जैसा कि उपेन्द्रनाथ 'अश्क' की 'गोखरू' कहानी की नायिका ने किया है। उसे अपने गोखरूओं से इतना प्रेम था कि उन्हें उसने अपनी मृत लड़की के हाथ से निकाल लिया।

जालपा तो ऐसी स्न्नी है जो परिस्थिति के अनुसार जीना जानती है। यदि परिस्थिति भोग-विलास की है तो वह भोग विलास कर सकती है। यदि स्थिति फांके मारने की है तो वह बिना आह भरे कई दिनों तक भूखी रह सकती है। वह पति के सुख के कम किन्तु दुःख के दिनों की 'साथिन अधिक है। अपने इस चरिन्न का पूरा प्रमाण उसने दिया है। उसके जिन गहनों को चुराकर रमानाथ ने अपना कर्ज अदा किया या जिन्हें उधार खरीदा और आर्थिक दयनीयता प्रकट न हो सके। इसके लिए एक के बाद एक छल किया, उन गहनों को जालपा ने बड़ी सरलता के साथ बेचकर म्यूनिसपैलिटी के रूपयों को जमा कर दिया और ऐसा करने में उसे रंचमान्न भी क्लेश नहीं हुआ, बल्कि बड़े गौरव की अनुभू हुई-जिस हार को उसने इतने चाव से खरीदा था, जिसकी लालसा उसे बाल्यकाल ही में उत्पन्न हो गयी, उसे आधे दामों में बेचकर उसे जरा भी दुःख नहीं हुआ, बल्कि गर्वमय हर्ष का अनुभव हो रहा था।'

उपन्यास की ये पंक्तियाँ जालपा के गौरवशाली चरित्र को उद्घाटित करती है जिसका आगे हम भव्य विकास देखते हैं। कुछ आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि प्रेमचन्द जी ने उपन्यास के उत्तरार्द्ध में जालपा के जिस भव्य एवं गौरवशाली चरित्र को चिन्नित किया है। वह अस्वभाविक एवं मूलहीन आदर्श की सृष्टि है। नायिका के हृदय में गहनों के प्रति अगाध प्रेम अवश्य है, किन्तु इसके साथ ही उसमें उचित - अनुचित, करणीय - अकरणीय का विवके भी है। वह स्थान पर स्वयं कहती है-'

क्या मैं इतना भी नहीं जानती कि संसार में अमीर-गरीब दोनों ही होते है ? क्या सभी स्त्रियाँ गहनों से लदी रहती है? गहना न पहनना क्या कोई पाप है? जब जरूरी काम से रूपये बचते है तो गहने भी बन जाते है। पेट और तन काटकर, चोरी या बेईमानी करके तो गहने नहीं पहने जाते। क्या उन्होंने मुझे ऐसी गयी - गुजरी समझ लिया?'

जिस स्त्री में इतनी बुद्धि हो, जिसके पास जीने के लिए इस तरह का व्यावहारिक दर्शन हो उसे आभूषणों की कठपुतली कहना न्याय संगत न होगा। जालपा का स्वाभाविक श्रृंगार–प्रेम, परपरांगत रीति-रिवाजो को तोड़कर स्वतंत्र चिंतन की क्षमता विशाल हृदयता, देशभक्ति, मानव प्रेम की भावना, त्याग करने की अपार शक्ति उसे भारतीय नारी के नए रूप का प्रतीक बना देते है । उनके चरित्र से स्वयं उसकी महानता ही नहीं झलकती बल्कि प्रेमचंद की दृष्टि का विकास भी हमारे सामने आता है। उनकी देशभक्ति तथा मानव - प्रेम के कारण ही जालपा का चरित्र इस सफलता के साथ चिन्नित हो सका।

जालपा जिसमें आरम्भ में आभूषण - प्रेम ही प्रमुख रूप से दिखायी पड़ता है वह उत्तरार्द्ध में त्याग, बलिदान, साहस, राष्ट्रीय गौरव और कर्तव्यपरायणता की प्रतिमूर्ति बन जाता है। वह रमानाथ को हर कीमत पर कान्तिकारियों के खिलाफ गवाही देने से रोकती है और जब वह नहीं मानता है तो उसके रास्ते से हट जाती है यहाँ तक कि उसके इस अपराध के फलस्वरूप फांसी की सजा पा जाने वाले दिनेश के बाल-बच्चों की जाकर परवरिश करने लगती है। भले ही लोगों को इसमें प्रेमचन्द की आदर्श भावना नजर आये किन्तु जालपा का यह चरिन्न परिस्थितियों की उपज होने के कारण और उसके नारी हृदय की पहचान होने के कारण परम विश्वसनीय है। जो लोग 'गबन' के मूल उद्देश्य को एक स्त्री का आभूषण प्रेम मानते है, उन्हें यह सोचना चाहिए कि उपन्यास के उत्तरार्द्ध में वह आभूषण-प्रेमिका क्यों लुप्त हो गयी और उसकी जगह एक कान्तिकारी राष्ट्रप्रेमिका के रूप में क्यों प्रधान हो गया? रमानाथ के साथ ऐसा नहीं हुआ । उसमें जो मध्यवर्गीय कमजोरियाँ(संकोच, झूठी शान, प्रदर्शन आदि) थीं वे ही उसे निरन्तर पतित करती गयीं। उन्हीं के कारण वह पुलिस के प्रलोभन में आकर कान्तिकारियों के खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार हुआं उपन्यास के अंत में उसने जो अपना बयान बदला है वह प्रेमचन्दजी की आदर्श भावना की देन है इसलिए इतना करने के बावजूद वह जालपा की सी प्रतिष्ठा नहीं सका। अतः गबन उपन्यास की नायिका जालपा भारतीय आर्दश नारी की प्रतीक है।

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