गबन उपन्यास के आधार पर जालपा का चरित्र चित्रण कीजिए।

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गबन उपन्यास के आधार पर जालपा का चरित्र चित्रण कीजिए।

जालपा का चरित्र चित्रण

जालपा का चरित्र चित्रण- हिन्दी गद्य साहित्य के महान आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी रचनाकार, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद न केवल भारतीय जनजीवन के कुशल पारखी थे अपितु मानव मनोवृत्तियों के निपुण चितेरे भी थे। 'गबन' उपन्यास में मानव मनोवृत्तियों के चित्रण में मुंशी प्रेमचन्द को अद्भूत सफलता मिली है। 'गबन' उपन्यास की नायिका 'जालपा' विभिन्न दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जाती है। सामन्ती वातावरण में पत्नी जालपा रमानाथ की पत्नी, दीनदयाल की एकलौती पुत्री और मुंशी दयानाथ की पुत्रवधू है। एक ओर तो वह रमानाथ जैसे दुर्बल मनोवृत्ति वाले व्यक्ति की पत्नी है, दूसरी ओर, उसमें आभूषणों, विशेषतः चन्द्रहार - के प्रति उत्कट प्रेम है। वास्तविकता तो यह है कि उसके पति ने आय की वास्तविक स्थिति उससे छिपाकर उसका आभूषण प्रेम और भी तीव्र कर दिया।

जालपा को आभूषणों से प्रेम बचपन से हीं था। जालपा की माँ उसे बिसाली से बिल्लौरी चन्द्राहार दिलवा देती है। उसे पहनकर वह संपूर्ण गाँव में फुदकती रही। उसके लिए इससे बढ़कर दूसरी संपत्ति दुनियाँ में थी ही नहीं। यह नकली चन्द्रहार बद में असली चन्द्रहार का स्थान ग्रहण कर लेता है। उसे आश्वासन दिलाया जाता है कि विवाह में असली चन्द्रहार ससुराल से आ जाएगा लेकिन ससुराल से चन्द्रहार नहीं आ पाता है। जालपा को पता चलता है कि सभी प्रकार के आभूषण तो आ गए हैं परन्तु चन्द्रहार नहीं है तो वह अत्यंत दुःखी होती है। वह उन्माद की सी हालत, मैं अपने कमरे में आकर फूट-फूट कर रोने लगी। बाद में ससुराल आने पर भी वह कोई भी गहना नहीं पहनती। उसे से मात्र चन्द्रहार चाहिए। वास्तव में रमानाथ अपने घर की वास्तविक स्थिति पत्नी से छिपाकर रखी थी। उसने जालपा से घर के बारे में बहुत बढ़ा चढ़ाकर बातें की थीं। इसलिए जालपा यह समझने लगती है, कि घर वाले जानबूझकर उसकी उपेक्षा कर रहे हैं और चन्द्रहार नहीं बनवा रहे हैं। कुछ दिनों के बाद परिस्थितिवश पति के द्वारा उसके सभी गहने-चुरा लिए जाते हैं। इस घटना के बाद वह वह सारे परिवारवालों को उपेक्षा की नज़र से देखने लगती है। अन्त में रमानाथ सर्राफ से उसके लिए गहने उधार लाता है। उधार लाए हुए आभूषण का पैसा चुक नहीं पाता है। अत: विवश होकर रमानाथ के 'द्वारा 'गबन' की घटना घट जाती है। फलस्वरूप रमानाथ कलकत्ता को पलायन करता है और कथानक कलकत्ता तक आगे बढ़ जाता है।

जालपा में आत्म-सम्मान और आत्मगौरव की भावना भी कूट-कूट कर भरी हुई है। जालपा पड़ोसी के पास इसलिए नहीं जाती है कि उसके पास अच्छे कपड़े और गहनें नहीं हैं। अच्छे कपड़े और अच्छे गहने प्राप्त होते हीं वह अपने मुहल्ले में जाकर अपना प्रभाव छोड़ आती है। उसे पड़ोस के सभी लोग सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। वकील साहब की पत्नी रतन को तो वह अपने यहाँ चाय पर भी बुला लाती है। उसके स्वाभिमान का पता इससे भी चलता है कि वह अपने माता द्वारा भेजा हुआ चन्द्रहार वापस लौटा देती है। जब रमानाथ उधार आभूषण लेने की बात करता है तब जालपा बिल्कूल इनकार कर देती है क्योंकि उसे कर्ज लेकर आभूषण पहनना पसंद नहीं। इन सभी बातों से उसके आत्म- सम्मान एवं आत्मगौरव का पता चलता है।

गबन की नायिका जालपा आदर्श पत्नी के रूप में भी हमारे सामने प्रस्तुत होती है। उसमें भारतीय नारी और धर्मपत्नी का अत्यंत ऊँचा आदर्श मिलता है। जालपा को गहना के लिए इतनी उत्सुकता इसलिए थी क्योंकि उसे घर की वास्तविक स्थिति बताई ही नहीं गयी थी। यदि रमानाथ उससे अपने घर की वास्तविक स्थिति बता देता तब यह कभी भी 'आभूषण के लिए जिद्द नहीं करती। उसको इस बात का अत्यंत दुःख है कि पति ने उससे यथार्थ पर पर्दा रखकर उसके लिए उधार गहने लाया। सारी बातों को जानने के बाद वह पश्चाताप करती है और अपने को हीं दोषी ठहराती है। यह उसकी सबसे बड़ी महानता है। वह अपने गहनों को बेचकर रमानाथ द्वारा गबन किया हुआ रूपया नगरपालिका में जमा कर आती है और सरोफ का कर्ज भी चुका देती है इतना करने के बाद भी उसे संतोष नहीं होता है तब वह समस्त श्रृंगारिक वस्तुओं को जमा करके गंगा की पावन धारा में बहाकर शांति का अनुभव करती है। 

जालपा में आत्म-प्रदर्शन की प्रकृति भी है। स्त्रियों के स्वाभावानुसार वह वह अन्य महिलाओं " के सामने अपने को सज धजकर प्रस्तुत करना चाहती है। वह अच्छे कपड़े और गहने पहनकर मुहल्ले में जाती है और महिलाओं के सभा में बैठते हुए गौरव का अनुभव करती है। वह छ. सौर रूपये के कंगन का मूल्य रतन को आठ सौ रूपये बताती है।

जालपा अत्यंत ही तीक्ष्ण बुड़ी की नारी है। वह अपने पतिदेव 19. रमानाथ का पता लगाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाती है उससे उसके बुद्धि कौशल का पता चलता है। वह शतरंज के खेल का नक्सा पुरस्कार के लिए प्रकाशित कर पति का पता लगा लेती है। इससे प्रमाणित होता है कि जालपा कुशात बुड़ी की महिला थी।

जालपा कृतज्ञ नारी है। अपने पति का पता लगाने के लिए वहा कलकत्ता पहुँचकर देवी दीन के यहाँ आश्रय पाती है। देवीदीन ने उसके पति रमानाथ को भी आश्रय दिया था। वह देवीदीन के उपकारों के भार से दबी हुई है। देवीदीन जादि का खटीक है, लेकिन, जालपा के लिए ब्राह्मण से भी बढ़कर है। वह स्पष्ट शब्दों में अपने देवर से कहती है-' खटीक हो या चमार लेकिन हमसे या तुमसे सौ गुणा अच्छे हैं।" जालपा देवीदीन की पत्नी जग्गो का सम्मान माता के समान करती है। इन सभी बातों से पता चलता है कि जालपा किए गए उपकारों को मानने वाली नारी है।

जालपा के कार्यक्षेत्र का विस्तार कलकत्ता में होता है। वह नहीं चाहती है कि उसका पति झूठी गवाही देकर निर्दोषों को फंसाए ।वह अपने बुद्धीचातुर्य का परिचय देती है और बड़ी - चतुरता से रमानाथ के लिए पत्र लिखकर फेंक आती है। पत्र पढ़ने के बाद रमानाथ बयान बदलने की प्रतिज्ञा करता हैं। बाद में मुकदमे के पश्चात् रमानाथ को पुलिस से पुरस्कार मिलता है। वह जालपा के लिए आभूषण लाता है लेकिन जालपा उसे स्वीकार नहीं करती

'जालपा के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने दोषों को स्वीकार करती है। रमानाथ के द्वारा गबन की जो घटना घटित हुई उसका दोष वह अपने सिर पर लेती है। वह अपनी गलती के लिए पश्चाताप करती है और पश्चाताप के जल से उसका यह दोष भी घुल जाता है

'इस प्रकार 'वन' के अंतर्गत जालपा का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में चित्रांकित है जो जटिलतम परिस्थितियों में भी अपनी सहिष्णुता धीरज, संयम, विवेक एवं आत्मविश्वास नहीं खोती है। वह अपने विवेक एवं चातुर्य से अपने भविष्य को अनुकूल बनाने में सफल होती है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि जालपा का चरित्र उर्ध्वगामी है और वह नारी जीवन का आदर्श प्रस्तुत करती है।

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