देवीदीन का चरित्र चित्रण - Devideen Ka Charitra Chitran

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देवीदीन का चरित्र चित्रण - Devideen Ka Charitra Chitran

देवीदीन का चरित्र चित्रण - उपन्यास के पात्रों में देवीदीन महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उसका प्रवेश कथानक के मध्य भाग में होता है, लेकिन वह अपने आश्चर्यजनक व्यक्तित्व से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह जाति का खटीक है और धर्म-कर्म में उसकी विशेष श्रद्धा है। लेखक ने उसी ब्राह्म आकृति का वर्णन करते हुए लिखा है - कोई 50-70 साल का बूढ़ा घुला हुआ आदमी था। माँस तो क्या हड्डियाँ तक गल गई थीं। मूँछ और सिर के बाल मुँड़े हुए थे। वह तीर्थ स्थानों की यात्रा करके लौट रहा था, तभी रमानाथ की उससे रेल के डिब्बे में भेट होती है।

देवीदीन को संसार का सच्चा अनुभव है। उसके अनुभवी होने का परिचय उपन्यास में उसके प्रवेश से ही स्पष्ट हो जाता है। वह रमानाथ के जीवन की सभी घटनाओं को अपने अनुभव के बल पर बता देता है। वह उसके भागने का कारण उसके सामने ऐसे रख देता है जैसे रमानाथ के घर एवं जीवन से परिचित है - तो तुम भी घर से चले आए हो? समझ गया। घर में झगड़ा हुआ होगा । बहू कहती होगी - मेरे पास गहने नहीं, मेरा नसीब जल गया। सास-बहू में पटती न होगी ।

जीवन का इतना अनुभवी होने पर भी वह विनोदी है, हास-परिहास करते रहने की उसकी आदत है। रेल-यात्रा में यह अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर रमानाथ के संबंध में एक ज्योतिषी के समान सब कुछ बता देता है और साथ ही मनोविनोद के लिए हँसी-मजाक करता चलता है। वह इतना हँसोड़ व प्रसन्नचित था कि रमानाथ को आश्चर्य हुआ। जिस बात पर और लोग रोते थे उस पर उसे हँसी आती थी। किसी जवान को रमानाथ ने यों हँसते न देखा था । वह विनोद का भंडार था । वह रमानाथ से कहता है- पराईमर का मतलब है - पराई स्त्री मर जाय । मै कहता हूँ, हमारी मर । पराई के मरने से हमें क्या सुख! वह अंग्रेजी मेहनत से पढ़ता है और अपने अध्यवसाय से अंग्रेजी भाषा के दुर्गुणों की क्लिष्टता पर वह विनोद में व्यंग्य करता है - "एस - आई - आर 'सर' होता है तो पी-आई-टी 'पिट' क्यों हो जाता है? बी-यू- टी 'बट' होता है लेकिन पी-यू- टी 'पुट' क्यों होता है ।

देवीदीन के चरित्र में अनुभव, विनोद एवं अध्यवसाय के गुण एक साथ संयुक्त है । मानवीय गुणों से ओत-प्रोत लेखक ने निम्न जाति में उत्पन्न होने पर भी उसमें मानवीय गुणों की अवतारणा करके एक क्रांतिकारी रूप प्रस्तुत किया है। वह खटीक जाति में उत्पन्न अवश्य हुआ है, लेकिन उसमें धर्म-कर्म के प्रति विशेष श्रद्धा है। वह प्रतिवर्ष तीर्थ स्थानों की यात्रा करने जाता है। रेल - यात्रा में रमानाथ की दयनीय स्थिति देखकर उसका हृदय पिघल उठता है और उसके टिकट के लिए दस रूपये निकालकर दे देता है । रमानाथ उसके इस सरल व्यवहार ने गाड़ी के अन्य मुसाफिरों को भी श्रद्धा से नत कर दिया। वह रमानाथ को दरी पर सुलाता है और स्वयं रमानाथ की जगह पर जाकर लेट जाता है । रमानाथ के अपरिचित होने पर भी उसे वह अपने घर पर ही ठहरा लेता है। अपनी दो कोठरियों में से एक कोठरी उसे दे देता है। उसमें इतने मानवीय गुणों को देखते हुए उसको दैनिकचर्या बड़ी विचित्र है। उसका काम चिलम पीना और दिनभर गप्पें लड़ाना था । दूकान का सारा काम बुढ़िया करती थी, मँडी जाकर माल लाना, स्टेशन से माल भेजना या लाना, यह सब काम भी वही कर लेती थी । देवीदीन ग्राहकों को पहचानता तक न था। थोड़ी-सी हिंदी जानता था। बैठा-बैठा रामायण, तोता मैना, रामलीला या माता मरियम की कहानी पढ़ा करता ।

देवीदीन के गुण घटनाओं के साथ सामने आते चले जाते हैं। वह रमानाथ की हर प्रकार से सहायता करता है। यह ज्ञात होने पर भी कि रमानाथ गबन करके भागा है और पुलिस को उसकी तलाश है, वह उससे पहले की भाँति ही व्यवहार करता है। किसी परदेशी को अपने घर में ठहराना पाप नहीं है। किसी को क्या मालूम होता कि किसके पीछे पुलिस है? यह पुलिस का काम है, पुलिस जाने । वह रमानाथ से कहता है कि मैं पुलिस का मुखबिर नहीं, जासूस नहीं, गोइंदा नहीं । तुम अपने को बचाए रखो, देखो भगवान् क्या करता है? वह रूपयों के जोर पर रमानाथ को छुड़ाने के लिए पचास गिन्नियाँ भी देने को तैयार हो जाता है। उसके साहस और नेकनीयता की पुलिस के कर्मचारी भी प्रशंसा करते है।

देवीदीन रुपयों का लालची नहीं है। उसे यह ज्ञात हो जाता है कि रमानाथ का पता बताने वाले को पाँच सौ पचास रूपये इनाम मिलेंगे, लेकिन वह रमानाथ की अनिच्छा होने पर उसके माता-पिता को कोई सूचना नहीं भेजता । वह दूसरों की सहायता के लिए अपना घर फूँकने को तैयार है । रमानाथ के मुखबिर बनने पर वह उससे कहता है- "अगर मेरे रूपये से डरते हो तो यही समझ लो कि देवीदीन ने अगर रूपयों की परवाह की होती तो आज लखपति होता । इन्हीं हाथों से सौ-सौ रूपये रोज कमाए और सबके सब उड़ा दिए है। वह रमानाथ के समान ही जालपा की सहायता करता है।

देवीदीन रुपयों का लालची नहीं है। उसे यह ज्ञात हो जाता है कि रमानाथ का पता बताने वाले को पाँच सौ पचास रूपये इनाम मिलेंगे, लेकिन वह रमानाथ की अनिच्छा होने पर उसके माता-पिता को कोई सूचना नहीं भेजता । वह दूसरों की सहायता के लिए अपना घर फूँकने को तैयार है । रमानाथ के मुखबिर बनने पर वह उससे कहता है- "अगर मेरे रूपये से डरते हो तो यही समझ लो कि देवीदीन ने अगर रूपयों की परवाह की होती तो आज लखपति होता । इन्हीं हाथों से सौ-सौ रूपये रोज कमाए और सबके सब उड़ा दिए है। वह रमानाथ के समान ही जालपा की सहायता करता है। जालपा उसके सद्व्यवहार एवं उसके मानवीय गुणों से बहुत प्रभावित होती है। वह अपने देवर गोपी को फटकार कर कहती है- चाहे ये खटीक हों या चमार, लेकिन हमसे सौ गुने अच्छे है। एक परदेशी आदमी को छः महीने तक अपने घर में ठहराया, खिलाया पिलाया। हमसें है इतनी हिम्मत? अगर वह नीच है, तो हम इससे कहीं अधिक नीच है।

जालपा की सभी योजनाओं में देवीदीन उसको अपना सहयोग प्रदान करता है और रमानाथ के 'सरकारी गवाह' बन जाने से उसे भारी दुःख होता है। उपन्यास के अंत में वह रमानाथ के साथ ही प्रयाग चला आता है और जमीन लेकर सबके साथ रहने लगता है ।

देवीदीन के चरित्र की यह विशेषता उसे उपन्यास के अन्य पात्रों के संमुख प्रमुख स्थान प्रदान कर देती है। उसके चरित्र में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। वह स्वदेशी वस्तुओं का प्रबल समर्थक है। इसका तर्क है कि हम जिस देश में रहते हैं, जिसका अन्न-जल खाते हैं, उसके लिए इतना भी न करें, तो जीने को धिक्कार है। वह देशी वस्त्रों पर अधिक व्यय करने को तैयार है, क्योंकि वह विदेशी वस्त्र खरीदकर भारतीय धन विदेशों को भेजना नहीं चाहता । अपनी इस राष्ट्रीय भावना के कारण अपने दो जवान बेटों को देश पर शहीद कर देता है- दो जवान बेटे इसी स्वदेशी पर भेंट कर चुका हूँ, भैया | ऐसे-ऐसे पट्टे थे कि तुम से क्या कहूँ। दोनों विदेशी कपड़े की दुकान पर तैनात थे। वह बेटों के शहीद हो जाने पर छाती के गज-भर चौड़े हो जाने का अनुभव करता है। उसे इस बात का दुःख होता है कि उसके अन्य बेटे पहले ही चल बसे, अन्यथा वह उन्हें भी देश की बलि - वेदी पर चढ़ा देता । देवीदीन की भावनाओं में देश और राष्ट्रीयता का बहुत बड़ा आदर है। वह अपने समय के भारतीय नेताओं की कटु आलोचना करता है-बड़े-बड़े देशभक्तों को बिना विलायती शराब के चैन नहीं आता । •••••अरे तुम क्या देश का उद्धार करोगे। पहले अपना उद्धार तो कर लो। वह देश तथा उसके नेताओं के संबंध में विचार व्यक्त करता है। उसकी देशभक्ति स्वार्थ और विलास में लिप्त रहकर स्वराज्य का नारी लगाने वाले नेताओं से प्रश्न करती है कि क्या स्वराज्य के मिलने पर दस-दस पाँच-पाँच हजार के अफसर नहीं रहेंगे? वकीलों की लूट नहीं होगी? पुलिस की लूट बंद हो जाएगी? वस्तुतः प्रेमचंद के स्वराज्य की कल्पना देवीदीन के चरित्र द्वारा थोड़ी-बहुत देखी जा सकती है। आज हम देवीदीन के भविष्य दर्शन को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं।

अतः देवीदीन के चरित्राकंन में प्रेमचंद ने एक वैचित्र्य की योजना की है। वह घर के काम से प्रायः विरक्त रहता है, लेकिन बाह्य कर्म-क्षेत्र में वह क्रियाशील है। अल्प- शिक्षित और साधारण स्थिति का व्यक्ति होने पर भी वह अपने पुत्रों को राष्ट्रीय सेवा में लगा देता है। किसी भी परिचित के प्रति उसकी संवेदना सदैव जागृत रहती है और यथाशक्ति वह सबकी सहायता करना चाहता है। असीम उत्साह और असीम अकर्मण्यता दोनों उसके चरित्र में साथ-साथ व्यक्त हुए हैं। देवीदीन के इस अनोखे चरित्र के प्रति प्रेमचंद ने दिलचस्पी दिखाई है। उसकी देशभक्ति उसके चरित्र को और भी ऊँचा उठा देती है।

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