बूढ़ी काकी कहानी की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।

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बूढ़ी काकी कहानी की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।

बूढ़ी काकी कहानी की प्रासंगिकता: 'बूढ़ी काकी' प्रेमचंद की एक अति चर्चित कहानी है। यह हृदयविदारक व मार्मिक कहानी है। इसे पढ़कर हम करुणा, शर्म और ग्लानि से भर जाते हैं। बुजुर्गों के प्रति अपने व्यवहार को लेकर आत्ममंथन करते हैं, परिष्कृत होते हैं। 

बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं, 'बूढ़ी काकी' में यह मनोविज्ञान स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रेमचंद बूढ़ी काकी को चित्रित करने में पूरी तरह से सफल हुए हैं। प्रेमचंद लिखते हैं- "बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा - स्वाद के सिवा कोई चेष्टा शेष न थी और न ही कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इंद्रिया, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहतीं और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का सामय टल जाता या उसका परिमाण पूर्ण न होता, अथवा बाज़ार में कोई वस्तु आती और उन्हें न मिलती तो वे रोने लगती थीं। उनका रोना- सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़ रोती थी।" स्पष्टत: यह सभी क्रियाएँ एक बच्चे की भी होती हैं, परंतु त्रासदी है कि इस दुनिया में कम ही लोग हैं जो बूढ़ों और बच्चों के भावों को समझते हों, ऊपर से वे अगर बेसहारा हों फिर तो समाज उन्हें दुत्कार ही देता है। ऐसा नहीं हैं कि बचपन व बुढ़ापे की वय निर्दोष है, मगर बेशक दोनों वयों से निर्दोष प्रेम व आत्मीयता पाई जा सकती है। बूढ़े व बच्चे सच्चे स्नेह से भरे होते हैं। प्रायः बाल अवस्था और वृद्धावस्था में एक स्वाभाविक अपेक्षा, चिड़चिड़ापन, ज़िद और अकेलापन होता ही है, जिसे एक प्यारभरी बात, नज़र, साथ और सम्मान देकर दूर किया जा सकता है।

इस कहानी का कथ्य संक्षिप्त और रोचक है। कथा में एक स्वाभाविक प्रवाह है। आरम्भ से अंत तक कहानी बांधे रखती है। बूढ़ी काकी का कोई नहीं है। उसका पति और बेटे मर गए हैं। वह एक सहारा पाने की खातिर अपने भतीजे बुद्धिराम को अपनी संपत्ति दे देती है। जब तक संपत्ति नहीं मिली थी, बुद्धिराम और उसकी पत्नी रूपा ने काकी के प्रति बड़ा अच्छा व्यवहार रखा। जायदाद मिलते ही उनकी आँखें फिर जाती हैं। वे उसकी उपेक्षा करते हैं। वह अच्छे व भरपेट खाने, अच्छे वस्त्र और स्नेह से वंचित कर दी जाती है। माँ-बाप के व्यवहार का अनुसरण करके उनके बेटे भी बूढ़ी काकी को परेशान करते हैं, मगर रूपा की बेटी लाडली ज़रूर काकी को प्यार करती थी, वह भाइयों से परेशान होकर काकी के पास छुप जाती थी। दादी को लाडली से मिठाई आदि में कुछ हिस्सा भी मिल जाता था। 

रूपा के घर में बेटे का तिलक उत्सव था। इस अवसर पर घर में पकवान बन रहे थे, उनकी खुशबू बूढ़ी काकी को बेचैन कर रही थी। वह बाल- बुद्धिवश खाने के लिए लालायित हो जाती है, मगर मन में बहू रूपा का डर भी था। वह हिम्मत करके कड़ाही के पास जाकर बैठ जाती है और बनती हुई पुड़ियाँ देखने लगती है, बूढ़ी काकी को यूँ बैठे देखकर रूपा आग बबूला होकर उसे दुत्कारती है तो काकी अपने कमरे में चली जाती है। कुछ देर बाद वह यह सोचकर फिर बाहर आती है कि अब तो मेहमान खा चुके होंगे, मगर मेहमान अभी खा रहे थे, वह वहाँ बैठकर उन्हें देखने लगती है। इस पर बुद्धिराम क्रोध से भरकर उसे खींचकर अन्दर छोड़ आता है। उसके बाद वह चुपचाप अन्दर पड़ी रहती है। अन्दर से उसे लग रहा था कि उसे अंत में थाली परोसी ही जाएगी, मगर अँधेरा हो जाता है और कोई उसे पूछने तक नहीं आता। दिन में यह सब देखकर लाडली ने बूढ़ी काकी के लिए चार-पाँच पुड़ियाँ छुपा कर रख ली थीं। रात को जब सभी सो गए तो अवसर पार लाडली ने जाकर यह पुड़ियाँ काकी को दीं, जिन्हें खाकर उसकी क्षुधा और जग गई। वह लाडली को साथ लेकर आँगन में वहाँ पहुँच जाती है, जहाँ जूठी पत्तलें पड़ी होती हैं। वह उन्हें देखती है और उसमें बचे व्यंजनों को बीनकर खाने लगती है। कुछ खटका सुनकर रूपा जाग जाती है। वह जैसे ही यह दृश्य देखती है, उसके पैरों तले ज़मीन नहीं रहती। उसके मन में धर्म-अधर्म, ईश्वर और पाप-पुण्य के विचार आते हैं, वह डर, करुणा और प्रायश्चित भाव से भर जाती है। 

बूढ़ी काकी का कूड़े की पत्तलों से खाना खाने और रूपा के मन की अवस्था को प्रेमचंद बड़ी सूक्ष्मता से उकेरेते हैं। वे लिखते हैं- "किसी गाय की गर्दन पर छूरी चलते देखकर जो अवस्था उसकी होती, वही उस समय हुई। एक ब्राह्मणी दूसरों की जूठी पत्तल टटोले, इससे अधिक शोकमय दृश्य असंभव था। पुड़ियों के ग्रासों के लिए विपत्ति आने वाली है।" आगे प्रेमचंद कहते हैं- "रूपा को क्रोध न आया। शोक के सम्मुख क्रोध कहाँ? करुणा और भय से उसकी आँखें भर आयीं। इस अधर्म के पाप का भागी कौन है? उसने सच्चे हृदय से गगनमंडल की ओर हाथ उठाकर कहा- परमात्मा, मेरे बच्चों पर दया करो। इस धर्म का दंड मुझे दो, नहीं तो मेरा सत्यानाश हो जाएगा ।" यहाँ सवाल है कि क्या रूपा का हृदय स्वाभाविक रूप से परिवर्तित हुआ या इसके पीछे कोई और कारण भी है ? उपरोक्त उद्धरणों में परमात्मा, गाय, ब्राह्मणी, अधर्म, पाप आदि शब्दों का सचेत पाठ होना चाहिए। दरअसल प्रेमचंद हमारे समाज की सही नब्ज़ पकड़ते हैं। यहाँ वे बड़ी सूक्ष्मता से ईश्वर, धर्म व जाति के लिए लोक में व्याप्त मनोस्थिति को उकेरेते हैं। इस कहानी का परिवेश अति प्रामाणिक व पात्र अति जीवंत हैं। भाषा शैली बहुत प्रभावित करती है। संवाद एक आत्मीयता व करुणा पैदा करते हैं। आलोच्य कहानी में बूढ़ी काकी के चरित्र - अंकन के साथ-साथ हमारे समाज का बड़े-बूढ़ों के प्रति व्यवहार भी दर्शाया गया है। समाज में अगर अनाथ आश्रम और आम घरों में बूढ़ों की स्थिति देखें तो 'बूढ़ी काकी' अपवाद की कहानी नहीं है। समाज के बड़े हिस्से के सच को दर्शाती यह कहानी आज भी प्रासंगिक है।

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