संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। संयुक्त राज्य अमरीकी के संविधान का निर्माण 1787 ई. में हुआ और यह विश्व का प्रथम लि

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। 

    संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान

    संयुक्त राज्य अमरीकी के संविधान का निर्माण 1787 ई. में हुआ और यह विश्व का प्रथम लिखित संविधान है। यह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का जन्मदाता है। इस संविधान की महत्ता के बारे में ग्लैडस्टोन ने लिखा है, “अमेरिकी संविधान मानव जाति की आवश्यकता तथा मस्तिष्क से उत्पन्न किसी निश्चित समय की सर्वाधिक आश्चर्यपूर्ण कृति है।" 1787 ई. के फिलाडेल्फिया सम्मेलन में इसका निर्माण किया गया और 1789 ई. से यह लागू हो गया।

    विश्व के लिखित संविधानों में अमेरिका का संविधान सबसे अधिक संक्षिप्त है। इसमें कुल 7 अनुच्छेद हैं, जबकि कनाडा के संविधान में 147 अनुच्छेद, ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 अनुच्छेद तथा भारत के संविधान में 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ हैं। मुनरो ने लिखा है,“संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में केवल 4,000 शब्द हैं,जो 10 या 12 पृष्ठों में मुद्रित हैं और जिन्हें आधे घण्टे में पढ़ा जा सकता है।" अमेरिका के संविधान में केवल मूलभूत तथा महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख है, शेष बातें विवेक पर छोड़ दी गई हैं।

    हम इन सत्यों को स्वयं सिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य जन्म से एकसमान हैं, सभी मनुष्यों की परमात्मा ने कुछ ऐसे अधिकार प्रदान किए हैं जिन्हें छीना नहीं जा सकता है और इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और अपनी समृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहने के अधिकार भी शामिल है।

    उपर्युक्त भावना 4 जुलाई, 1776 ई० को 'स्वतंत्रता की घोषणा-पत्र' में, अमेरिका में गूंजी। प्रस्तुत भावना रूसो के 'Social Contract' (सामाजिक अनुबन्ध) से अभिप्रेरित थी। इन आदर्शों से मार्गदर्शन प्राप्त करके अमेरिकी गणराज्य की स्थापना हुई। 1787 ई० में 'फिलाडेलफिया सम्मेलन' से वर्तमान अमेरिकी संविधान का निर्माण हुआ, जो 30 अप्रैल 1789 को कार्यान्वित किया गया। उस समय की शासन कला में यह एक नवीन प्रयोग था और प्रजातंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय। 1789 में, यूरोप के किसी भी महान राज्य में लिखित संविधान न था और इंगलैंड के अतिरिक्त किसी देश में भी लोक प्रतिनिधिक संस्थायें न थीं। वास्तव में अमेरिकी संविधान द्वारा एक ऐसी शासन प्रणाली का जन्म हुआ, जो समकालीन अंग्रेजी शासन प्रणाली से भी अधिक प्रजातांत्रिक थी।

    वस्तुतः अमेरिका का संविधान; उन थोड़े से संविधानों में से हैं, जो कुछ बुनियादी सिद्धान्तों को अपनी नींव में बैठाये हुए हैं। सबसे बड़ी बुनियादी सिद्धान्त, जिसने अमेरिकी संविधान को अनुप्रमाणित किया है, वह है, "राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का साधन मात्र मानने वाला विचार"-जिसका प्रमुख व्याख्याता 'लॉक' रहा है। राज्य सत्ता' का प्रतिष्ठा करते समय संविधान निर्माताओं ने इस बात का ध्यान रखा कि पूरा शासन तंत्र, किसी एक व्यक्ति या व्यक्ति के समूह के नियंत्रण में न चला जाए। इसलिए शक्ति के विभाजन, नियंत्रण और संतुलन के सिद्धान्त के आधार पर, इसे सम्पूरित व संशोधित किया गया। साथ ही, अमेरिकी संविधान में केन्द्रीय अधिकार तथा स्थानीय स्वशासन के संतुलन की झलक मिलती है। यह सन्तुलन बड़ी सफलतापूर्वक किया गया है। इस तरह संवैधानिक इतिहास में पहली बार एक मर्यादित संघीय राज्य के विधान की रचना हुई।

    अमेरिकी संविधान की रचना के उद्देश्य

    (1) संविधान द्वारा एक कुशल शासन तंत्र की स्थापना हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने एक शक्तिशाली कार्यकारिणी का प्रावधान किया।

    (2) शासन का प्रत्येक अंग परस्पर स्वतंत्र हो। इस उद्देश्य की पूर्ति, शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त द्वारा की गई, जिसके अन्तर्गत व्यवस्थापिका, कार्यकारिणी और न्यायपालिका परस्पर पृथक कर दिये गये, परन्तु इसके साथ-साथ व्यवस्था की गई कि तीनों एक दूसरे पर संतुलन तथा नियंत्रण रखें।

    (3) सरकार जनता पर निर्भर रहे। इस सिद्धान्त को कार्यान्वित करने हेतु संविधान में यह व्यवस्था __ की गई कि प्रशासन के सब महत्वपूर्ण पदाधिकारी जनता द्वारा निर्वाचित हों और चुनाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात पुनः होते रहें।

    (4) सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य था, व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा का प्रश्न। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए व्यवस्थापिका, कार्यकारिणी एवं न्यायपालिका को पृथक कर दिया गया, जिससे कि एक विभाग दूसरे विभाग से मिलकर वैयक्तिक स्वतंत्रता को आघात न पहुँचा सके। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के कुछ अधिकारों को संविधान द्वारा सुरक्षित कर दिया गया, जिनके उल्लंघन किये जाने पर व्यक्ति न्यायालय की शरण ले सकता है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की विशेषताएँ

    (1) लोक-प्रभुता (Popular Sovereignty) : सर्वप्रथम, अमेरिकी संविधान लोक-प्रभुता के सिद्धान्त पर आधारित है। संविधान जनकृत्य का ही परिणाम है। उसका स्रोत सार्वजनिक इच्छा है। अतः प्रस्तावना में घोषित किया गया है कि, अमेरिका के लोग अधिक शक्तिशाली संघ बनाने, न्याय स्थापित करने, सामान्य प्रतिरक्षा की व्यवस्था करने, सार्वजनिक कल्याण की बढ़ोत्तरी करने तथा स्वयं अपने तथा संविधान को अपनाते हैं।" जैसा कि डॉ० टकबिले ने कहा था- "अमेरिका की जनता राजनीतिक दुनिया में इस प्रकार राज्य करती है, जैसे विधाता सृष्टि में।" वस्तुतः इस संविधान द्वारा एक प्रतिनिधि मूलक लोकतंत्रीय शासन प्रणाली स्थापित होती है। संविधान का आधार जनता है, अर्थात् राज्य की अंतिम शक्ति जनता के हाथ में है और जनता अपने प्रतिनिधियों द्वारा संविधान में आवश्यक संशोधन कर सकती है।

    (2) गणतंत्र प्रणाली (Democratic System) : दूसरी विशेषता, अमेरिकी संविधान की यह है कि इसके द्वारा एक गणतंत्र की स्थापना की गई है और इस गणतंत्र के आधारभूत सिद्धान्त हैं- निर्वाचित कार्यकारिणी तथा निर्वाचित व्यवस्थापिका। एक गणतंत्र की विशेषता यह होती है कि इसमें कोई पद व्यक्ति विशेष अथवा परिवार विशेष के लिए सुरक्षित नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति साधारण से साधारण नागरिक, राज्य के प्रत्येक पद, यहां तक कि सर्वोच्च पद तक पहुँचने की आज्ञा और अभिलाषा कर सकता है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद पाने की प्रत्येक नागरिक अभिलाषा कर सकता है, परन्तु ब्रिटेन में राजपद की प्रत्येक नागरिक अभिलाषा नहीं कर सकता, क्योंकि यह पद राजपरिवार के लिए सुरक्षित है। अतः अमेरिका एक 'गणतंत्र' कहलाता है।

    (3) अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (Presidential System) : अमेरिकी गणतंत्र संसदीय न होकर अध्यक्षात्मक' है, जो कि ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से अलग पहचान बनाती है। अतः इसमें वे गुण पाये जाते हैं, जो कि एक अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में होते हैं। जैसे-अमेरिका में राष्ट्रपति कार्यकारिणी का वास्तविक अध्यक्ष होता है। वह शासन तथा राज्य दोनों का अध्यक्ष होता है। दूसरे शब्दों में, ब्रिटिश शासन प्रणाली के अन्तर्गत महारानी और प्रधानमंत्री जो भूमिकाएं निभाते हैं, अमेरिकी शासन प्रणाली के अन्तर्गत उन्हें अकेला राष्ट्रपति निभाता है। उसका कार्यकाल चार वर्ष के लिए निश्चित है। अपनी पदावधि के लिए वह कांग्रेस (विधानमण्डल) पर निर्भर नहीं रहता न ही अपने कार्यों के लिए वह उसके प्रति उत्तरदायी होता है। इस प्रकार राष्ट्रपति और कांग्रेस दो पृथक व स्वाधीन संस्थाएँ होती हैं।

    (4) शक्तियों का पृथक्करण सिद्धान्त तथा अवरोध और सन्तुलन की व्यवस्था (Principle of separation of powers and system of checks and balances)-प्रोफेसर 'ऑग' के शब्दों में- "अमेरिकन सरकार की जिसमें राष्ट्रीय राज्यों की और स्थानीय सरकार भी शामिल है, कोई और विशेषता इतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि शक्तियों का पृथक्करण सिद्धान्त, जिसके साथ अवरोध और सन्तुलन की व्याख्या सावधनी से शामिल की गई है।"

    अमेरिकी संविधान के निर्माता लॉक तथा मॉन्टेस्क्यू के राजनीतिक सिद्धान्तों से अत्यधिक प्रभावित हुए थे और वे इस विचार से सहमत थे कि, व्यक्ति स्वातंत्र्य के लिये यह आवश्यक है कि व्यवस्थापिका, कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका इन तीनों शासन शक्तियों का पृथक्करण किया जाये। अर्थात् सरकार के ये तीनो विभाग परस्पर पृथक और स्वतंत्र हों, ताकि एक-दूसरे की निरंकुशता को रोक सकें अथवा उसपर नियंत्रण कर, सरकार में संतुलन स्थापित कर सकें। अतः शक्ति पृथक्करण और परस्पर नियंत्रण व संतुलन अमेरिकी शासन प्रणाली की मुख्य विशेषता बन गये। परिणामस्वरूप, संयुक्त राज्य में कांग्रेस, राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च न्यायालय तीनों के अधिकार क्षेत्र भिन्न और पृथक हैं। कांग्रेस विधि निर्माण के क्षेत्र में सर्वोपरि है, राष्ट्रपति कार्यकारिणी का सर्वोच्च अध्यक्ष है और सुप्रीम कोर्ट तथा उसके अधीन संघीय न्यायालयों में सर्वोच्च न्यायाशक्ति निहित है। ये तीनों विभाग अपने-अपने क्षेत्र में संप्रभु तथा परस्पर स्वतंत्र हैं, कोई एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी नहीं है। राष्ट्रपति कांग्रेस के प्रति उत्तरदायी नहीं है और न ही अपनी पदावधि के लिए वह कांग्रेस पर निर्भर है। न्यायपालिका द्वारा व्यक्ति के अधिकारो तथा स्वतंत्रता की रक्षा होती है। इसी प्रकार कांग्रेस विधि निर्माण तथा वित्त संबंधी क्षेत्रों में सर्वोपरि है। वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय जहां संविधान का संतरी है, वह कांग्रेस तथा कार्यकारिणी दोनों के आक्रमणों से उसकी रक्षा करता है। इस प्रकार मांटेस्क्यू का सिद्धान्त संयुक्त राज्य की व्याख्या के रूप में जीवित हो उठा।

    अवरोध एवं सन्तुलन की व्याख्या-यद्यपि शासन के तीनों विभागों कांग्रेस, राष्ट्रपति (कार्यकारिणी) तथा सर्वोच्च न्यायालय पृथक कर दिया गया हैं तथापि सरकार के किसी अंग को भी अपने क्षेत्र में मनमानी शक्तियां नहीं दी गईं। संविधान निर्माताओं को यह विदित था कि तीनों के मध्य परस्पर संबंध तथा सम्पर्क स्थापित करना भी सफल शासन के लिए परमावश्यक है, क्योंकि इसके बिना सरकार में एकता व समरूपता की भावना नहीं आ सकती। अतः यह व्यवस्था की गई कि, सरकार के तीनों अंग परस्पर एक दूसरे को नियंत्रित करें और परस्पर संतुलन की स्थापना करें। अर्थात् चूँकि शक्ति विभाजन का सिद्धान्त मूल रूप में अव्यावहारिक है, इसलिए उसे व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करने के लिए शक्ति विभाजन की व्यवस्था को, विरोध एवं सन्तुलनों की पद्धति से पुष्ट किया गया। शक्ति विभाजन का सिद्धान्त, एक सीमा तक ही खींच कर ले जाया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था से यह डर हो सकता है कि तीनों अंग एक दूसरे से इतने स्वतंत्र हो जायें कि, सरकार का काम ही कठिन हो जाये। इसलिए संविधान निर्माताओं ने निरोध एवं सन्तुलन की प्रणाली अपनायी है, जिसके अनुसार तीनों शक्तियाँ एक-दूसरे को मर्यादित करती हैं, रोकती हैं, मानती हैं और फलस्वरूप एक ऐसा संतुलन स्थापित हो सकने की सम्भावना पैदा हो जाती है जिसकी मिसाल आकाश के नक्षत्रों से दी जा सकती है। इस पद्धति के अनुसार, राष्ट्रपति कांग्रेस से स्वतंत्र रहता हुआ भी, नियुक्तियों तथा संधियों के मामले में सीनेट का मुखापेक्षी बनता है। इसी तरह युद्ध एवं शांति की घोषणा, बजट की स्वीकृति, जनता पर कर लगाने जैसे मामलों के लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस की अनुमति लेनी पड़ती है। इसी प्रकार, कांग्रेस कानून बनाने की क्षमता रखते हुए भी राष्ट्रपति के 'वीहो' अधिकार द्वारा रोकी जा सकती है। धन विधेयकों के लिए जरूरी है कि प्रतिनिधि सभा भी इनका समर्थन करे, नहीं तो अकेली सीनेट कुछ नहीं कर सकती। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होनेवाले तथा सीनेट द्वारा जिनकी नियुक्ति की संपुष्टि हुई हो, ऐसी सर्वोच्च न्यायापालिका के न्यायाधीश संविधान की कसौटी पर किसी भी कानून या आदेश को कसकर उसे 'खोटा' घोषित कर सकते हैं। अर्थात् उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के न्यायाधीश, राष्ट्रपति तथा कांग्रेस द्वारा बनाए हुए किसी भी कानून को अवैध घोषित कर सकते हैं, यदि वह संविधान के विरुद्ध हो। कांग्रेस भी न्यायाधीशों की संख्या कानून द्वारा घटा या बढ़ा सकती है। न्यायाधीशो को महाभियोग द्वारा हटा सकती है। संघीय न्यायालय के क्षेत्राधिकार को सीमित कर सकती है। जैसा कि यहां पर लॉर्ड ब्राइस ने लिखा है कि शक्ति का मूल स्रोत जनता की प्रभुता है जो सदा भरा हुआ और अपनी गहने स्रोत से पानी लेता हुआ बहता है किन्तु इसके पश्चात यह अनेक नहरों में बंट जाता है। प्रत्येक नहर इतनी कुशलता से बनाये गये तटबन्धों से बंधी हुई है कि पानी ऊपर से नहीं निकल सकता, न्यायपालिका का जागृत हाथ किनारे के उस स्थान पर मरम्मत करने के लिए तत्पर रहता है, जहां से धारा के टूट कर बहने का भय होता है।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां सरकार के तीनों अंगों में शक्ति पृथक्करण किया गया है, वहां तीनों में पारस्परिक संबंध भी स्थापित किया गया है।

    (5) संघात्मक शासन प्रणाली (Federal System) : अमेरिकी संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह एक संघात्मक प्रणाली की स्थापना करता है। इस शासन प्रणाली के अन्तर्गत विभिन्न 'प्रभुता सम्पन्न राज्य', कुछ सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु, इस प्रकार अपने को एक संघ में संगठित करते हैं कि अपने कार्यक्षेत्र में स्वतंत्र तथा सर्वोच्च रहते हुए भी, राष्ट्रीय एकता एवं सुदृढ़ता प्राप्त की जा सके। (लार्ड ब्राइस के शब्दों में), संयुक्त राज्य अमेरिका एक ऐसा राज्यमण्डल है, जिसमें अनेक राज्य हैं और एक ऐसा गणतंत्र है, जिसमें विविध गणतंत्र सम्मिलित हैं। वह विभिन्न संघीय राज्यों का समूह है।

    संघात्मक राज्य में- सार्वभौमिकता केन्द्रीय सरकार तथा स्थानीय सरकारों में इस प्रकार विभक्त रहती है कि, दोनों अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में संप्रभु और परस्पर स्वतंत्र रहते हैं। दोनों के मध्य अधिकारों का सीमा विभाजन, संविधान द्वारा होता है। दूसरे- संघात्मक राज्य में, संविधान सर्वोच्च कानून माना जाता है और संघीय सरकार (केन्द्रीय सरकार) तथा राज्य की सरकारें दोनों ही इसके अधीन होती हैं।

    तीसरे, संघ में एक 'उच्चतम न्यायालय' होता है, जो संघीय सरकार तथा राज्यों की सरकारों के संवैधानिक विवादों (सगड़ो) का निर्णय करता है। साथ ही, केन्द्रीय तथा संघीय राज्य, दोनों की अपनी-अपनी पृथक सरकारें होती हैं। अर्थात् एक संघीय विधानमण्डल, संघीय कार्यकारिणी तथा एक संघीय न्यायपालिका के साथ-साथ प्रत्येक राज्य में भी ये तीनों राजनीतिक संस्थाएं होती हैं।

    इस दृष्टिकोण से संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान संघात्मक है और उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ विलक्षणीय हैं।

    (क) केन्द्रीय सरकार तथा संघातरित राज्यों के मध्य अधिकार विभाजन, 

    (ख) संविधान का लिखित होना और उसकी दुष्परिवर्तनशीलता, 

    (ग) संविधान की सर्वोपरिता, 

    (घ) न्यायपालिका का 'संविधान-अभिभावक' होना, 

    (ङ) संघीय विधानमण्डल में दो भवनों का होना, जिनमें से एक में संघातरित राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त होना। 

    (6) लिखित तथा संक्षिप्त संविधान (Written and Short-constitution)-चूँकि अमेरिकी संविधान ‘संघात्मक' है। प्रत्येक संघ में एक केन्द्रीय सरकार तथा विभिन्न राज्यों के मध्य एक प्रकार का अनुबन्ध होता है और अनुबन्ध स्वभावतः लिखित होता है। फलस्वरूप, अमेरिकी संविधान भी लिखित है। इसके अतिरिक्त अमेरिकी संविधान बड़ा संक्षिप्त है। इसमें केवल 7 अनुच्छेद (धारायें) हैं और आजतक कुल मिलाकर 27 संशोधन इसमें किये गये हैं, जो मूल संविधान के अतिरिक्त पृथक धाराओं के रूप में हैं। यद्यपि अमेरिकी संविधान लिखित है तथापि उसके विकास में प्रथाओं, परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों का एक विशेष स्कान रहा है। यह परम्पराएँ तथा प्रथाएँ जो स्वभावतः अलिखित हैं, उतनी ही मान्य है, जितना कि संविधान का लिखित भाग। ब्रोगन के शब्दों में- "अमेरिका का लिखित संविधान एक ढाँचे के समान है जिसको रीति-रिवाजों, राजनीतिक दलों, राष्ट्रीय विपत्तियों तथा आर्थिक उन्नति ने एक और मांस प्रदान किया है, और देश प्रेम ने जीवन दान।"

    (7) संविधान की सर्वोच्चता या सर्वश्रेष्ठता (Supremacy of the Constitution) : अमेरिका के संविधान की एक प्रमुख विशेषता, इसकी 'सर्वोच्चता' है। संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान, संघात्मक होने के नाते राज्यों तथा संघ दोनों के ऊपर सर्वोपरि है। यह सर्वोच्च कानून है और राष्ट्रपति, कांग्रेस तथा उच्चतम न्यायालय, सभी संविधान के अधीन हैं। अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद 6 में कहा गया है- "यह संविधान और इसके अनुसार बनाए हुए सभी कानून तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का प्राधिकार के अधीन की हुई सभी संधियां या जो भविष्य में की जाएँगी, देश का सर्वोच्च कानून होगा और प्रत्येक राज्य में न्यायाधीश उससे बाह्य होंगे। किसी भी राज्य के संविधान अथवा कानून में कोई भी बात, जो इस संविधान के विरुद्ध होगी, अवैध समझी जाएगी।"

    अतः संघीय संविधान, केन्द्रीय सरकार, राज्यों के संविधान तथा उसकी सरकार और स्थानीय सरकार, अर्थात् अमेरिकी शासन प्रणाली की प्रत्येक संस्था पर सर्वोपरि है। इस सिद्धान्त के अनुसार जो कानून कांग्रेस द्वारा संविधान के अन्तर्गत बनाये जाते हैं वे सर्वोपरि हैं, क्योंकि संविधान की समस्त शक्ति इन्हीं कानूनों द्वारा कार्यान्वित होती है। परन्तु संघीय सरकार द्वारा बनाया हुआ यदि कोई कानून संविधान की किसी धारा का उल्लंघन करता है, तो ऐसा कानून, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा सकता है। इस सिद्धान्त को 'न्यायपालिका की सर्वोच्चता या सर्वोपरिता" का सिद्धान्त कहते हैं। इस प्रकार जहां एक ओर ब्रिटेन में पार्लियामेन्ट की सर्वोच्चता है वहीं दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका में संविधान की सर्वोच्चता है।

    (8) न्यायपालिका की सर्वोच्चता (Supremacy of Judiciary) : वास्तव में संघात्मक शासन प्रणाली में यह सिद्धान्त नितान्त आवश्यक है, क्योंकि संविधान की घटनाओं के विषय में राज्यों तथा केन्द्रीय सरकार के मध्य समय-समय पर मतभेद उत्पन्न होते रहते हैं, जिसका निर्णय करने के लिए एक निष्पक्ष तथा सर्वोच्च संख्या की आवश्यकता पड़ती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में संविधान द्वारा किसी ऐसी संस्था की स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई थी, परन्तु क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय ने यह शक्ति ग्रहण कर ली और गर्भित शक्ति सिद्धान्त द्वारा यह न्यायालय धीरे-धीरे संविधान का संरक्षक बन गया है। आज यह संविधान की व्याख्या करने में अंतिम निर्णायक बन गया है और यदि संघीय सरकार या राज्यों की सरकार का कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है तो यह उसको अवैध घोषित कर सकता है। इस सिद्धान्त को न्यायिक पुनरीक्षण का सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कई कानूनों को अवैध घोषित किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां ब्रिटेन में व्यवस्थापिका की सर्वोच्चता है, वहीं अमेरिका में न्यायिक सर्वोच्चता है। जहाँ ब्रिटेन में संसद द्वारा पास किये गये विधेयक को अवैध ठहराने की शक्ति न्यायपालिका में नहीं है, वहीं अमेरिका में यह शक्ति न्यायपालिका को प्राप्त है। अमेरिका में न्याय विभाग की महत्ता इतनी अधिक है कि जेम्स बैक ने सर्वोच्च न्यायालय को “संविधान का संतुलन चक्र" कहा

    (9) एक कठोर दुर्दमनीय (दुष्परिवर्तनशीलता) प्रणाली (Rigid Constitution) : अमेरिका का संविधान एक लचीला संविधान नहीं अपितु 'कठोर दुर्दमनीय संविधानों का श्रेष्ठ नमूना है। इसकी संशोधन विधि अपेक्षाकृत कुछ कठिन है। इसके अन्तर्गत साधारण तथा संवैधानिक कानूनों में भेद किया गया है और संवैधानिक कानूनों के संशोधन की जो व्यवस्था की गई है, वह बहुत जटिल है। अमेरिका में संविधान संशोधन के लिए कांग्रेस के विशिष्ट बहुमत के (2/3 सदस्यों) साथ-साथ राज्यों के विधानमण्डलों के और विशिष्ट बहुमत द्वारा (3/4 राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा) समर्थन मिलने पर ही संशोधन सम्भव है। यही कारण है कि आरम्भ से आज तक अमेरिकी संविधान में केवल 27 संशोधन ही हो पाये हैं, जिनमें प्रथम बारह संशोधन जो लगभग एक साथ प्रारम्भ में ही हो गये थे। इससे यह सिद्ध होता है कि संविधान संशोधन विशेष आवश्यकता पड़ने पर ही किये जा सके हैं।

    (10) अप्रत्यक्ष लोकतंत्र की स्थापना (Indirect Democracy) : संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान निर्माता प्रत्यक्ष लोकतंत्र के अधिक पक्ष में नहीं थे और न ही इतने बड़े देश में जहाँ इतनी अधिक भिन्नताएँ हों, प्रत्यक्ष लोकतंत्र सम्भव था। इसलिए उन्होंने लोकतंत्र केन्द्र में नहीं रखा और उसको केवल राज्यों में रखने की आज्ञा दी। आज भी जनमत संग्रह प्रस्तावाधिकार (Initiative) तथा प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की पद्धति (System of Recall) कुछ राज्यों में तो विद्यमान है, परन्तु केन्द्र में नहीं है। राष्ट्रपति का चुनाव अभी तक अप्रत्यक्ष ही है, ताकि लोगों में बहुत अधिक जोश उत्पन्न न हो और उम्मीदवारों का खर्च भी कम हो।

    (11) सरकार की शक्तियों को सीमित करना (Limited powers of governance) : अमेरिका के संविधान निर्माता 'जॉन लॉक' तथा 'माण्टेस्क्यू' के सिद्धान्तों से प्रभावित होकर सरकार की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया। इस हेतु उन्होंने प्रथमतः जनता को प्रभुसत्ता सौंपी।

    दूसरे, उन्होंने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त और संतुलन तथा नियंत्रण की व्यवस्था को। अपनाया।

    तीसरे, उन्होंने संविधान में एक अधिकार पत्र अपनाया, ताकि सरकार लोगों के मौलिक अधिकारों का मान-सम्मान करे और उनकी स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप न करे।

    चौथे, उन्होंने यह व्यवस्था की कि सरकार की सब शक्तियों का प्रयोग केवल जनता के प्रतिनिधि ही कर सकेंगे।

    पांचवें, उन्होंने सेना पर नागरिक नियंत्रण रखा, ताकि सेना की तानाशाही न स्थापित हो।

    छठे, उन्होंने संविधान में संशोधन की विधि बहुत कठिन रखी ताकि, संविधान कुछ स्वार्थी नेताओं के हाथ की कठपूतली न बन जाए और संविधान में केवल उसी समय संशोधन हो जब जनता का विशेष बहुमत उसे चाहें।

    (12) अधिकार पत्र (Bill of Rights) : भारतीय संविधान के तहत अमेरिका का संविधान भी जनता के अनेक अधिकारों का प्रावधान करता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह पहला संविधान है, जिसने इस प्रकार एक 'अधिकार पत्र' (Bill of Rights) को संविधान का अंग बनाया। यह अधिकार पत्र 4 मार्च, 1789 में, कांग्रेस द्वारा (दस संशोधनों को) स्वीकार किए गए। इन दस संशोधनों का राज्यों द्वारा अनुसमर्थन मिलने के पश्चात यह 'अधिकार पत्र' 15 दिसम्बर 1791 में संविधान का अंग बना।

    ये दस प्रमुख संशोधन क्रमशः हैं :

    1. इसके अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता, भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठे होने की और सरकार से प्रार्थना करने की स्वतंत्रता दी गई। 
    2. शस्त्र रखने और धारण करने का अधिकार दिया गया। 
    3. शांतिकाल में किसी भी मकान में उसके स्वामी के आज्ञा के बिना सैनिक नहीं रह सकते। 
    4. इसके द्वारा सरकार के अनावश्यक तथा अनुचित हस्तक्षेप के विरुद्ध लोगों को सुरक्षा प्रदान की गई। अर्थात् यह गारन्टी दी गई है कि लोगों के शरीर, मकान और माल की सुरक्षा रहेगी और अकारण ही तलाशी नहीं ली जायेगी। 
    5. लोगों को जीवन, सम्पत्ति और संरचना के अधिकार दिये गये। 
    6. अपराधियों को शीघ्र न्याय तथा जूरी द्वारा अपने अभिभोग का निर्णय कराने का अधिकार दिया गया। 
    7. नागरिकों को जूरी से अपने मुकदमों का निर्णय कराने का अधिकार मिला। 
    8. नागरिकों से न तो आवश्यकता से अधिक जमानत मांगी जाएगी न ही भारी जुर्माने किये जायेंगे, न असधारण दण्ड दिए जाएंगे। 
    9. नौवें संशोधन द्वारा यह तय किया गया कि, संविधान में कुछ अधिकारों के वर्णन करने का आशय कदापि नहीं लिया जाएगा कि, नागरिकों को वर्तमान अधिकारों से वंचित कर दिया जायेगा। 
    10. दसवें संशोधन के द्वारा, संविधान ने जो शक्ति संयुक्त राज्यों को नहीं दी है और राज्यों को मना नहीं की गई है, वे राज्यों या जनता के लिए सुरक्षित की गई हैं। 

    इस प्रकार स्पष्ट है कि अमेरिका के शासन का प्रत्येक अंग सीमित शक्ति रखता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, संविधान द्वारा राष्ट्रीय सरकारों पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंध में जो प्रतिबन्ध लगाये गये हैं उनसे स्पष्ट है कि इन देशों में सीमित सरकार की स्थापना की गई है। साथ ही इससे मालूम होता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिकों को भी वे सभी मौलिक अधिकार दिए गए हैं जो कि सभ्य देशों में प्रायः दिए जाते हैं।

    (13) दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) : संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है। संविधान के 14वें संशोधन (1868) के अनुसार, प्रत्येक अमेरिकन को अपने राज्य की भी नागरिकता प्राप्त है और संघ की भी। अर्थात् दोनों को पृथक-पृथक परन्तु एक साथ नागरिक माना जाता है। संघीय नागरिकता संबंधी प्रारूप सभी के लिए एक समान है, परन्तु विभिन्न राज्यों की नागरिकता संबंधी प्रावधानों में विविधता पाई जाती है।

    (14) समझौते के परिणाम (Result of an agreement) : अमेरिकी संविधान के संक्षिप्त होने का मुख्य कारण कदाचित यह भी है कि फिलाडेलफिया सम्मेलन में विभिन्न दृष्टिकोणों तथा परस्पर विरोधी मतों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। छोटे और बड़े राज्यों में मतभेद थे। केन्द्रापसारी तथा केन्द्राभिमुखी प्रवृत्तियों में संघर्ष था। [जिहीन तथा पूँजिपति और कृषि तथा उद्योग यह दोनों विरोधी थे। अतः आरम्भ से ही यह विदित था कि सम्मेलन के कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए यह अनिवार्य है कि विभिन्न मत और विरोधी हित आपस में समझौते के लिए तैयार रहें। वास्तव में सम्मेलन में लगभग हर प्रश्न पर समझौता करना पड़ा और आज भी इन समझौतों की छाप अमेरिकी संविधान पर पूर्ण रूप से स्पष्ट दिखाई पड़ती

    (15) एक अनुदार संविधान (A conservative constitution)-लास्की तथा ब्रोगन का मत है कि अमेरिकी संविधान एक प्रतिक्रान्तिवादी प्रलेख है। इस कथन में बहुत कुछ सत्य का अंश है क्योंकि जिन क्रांतिकारियों ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था, वे स्वयं पूँजीपति थे और इस नये संविधान द्वारा वह अपनी विजय तथा पूँजी को सुरक्षित करना चाहते थे। अतः व्यक्तिगत सम्पत्ति की सुरक्षा संविधान का आधारभूत सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त समय-समय पर अमेरिकी सामाजिक प्रगति का बाधक रहा है। अतः कुछ आलोचकों ने संविधान को एक अनुदार प्रलेख्य बताया है।

    (17) कुछ महत्वपूर्ण न्यूनताएँ या संविधान में कुछ महत्वपूर्ण बातों का लोप है (Limitations of the constitution)-अमेरिकी संविधान में जिन बातों का वर्णन मिलता है, वह उतनी ही उल्लेखनीय है जितनी वे बातें जिनका इसमें अभाव है। कहीं-कहीं संविधान में आवश्यक बातों पर भी व्यापक व्यवस्था की गई है जैसे जूरी की व्यवस्था अथवा देशद्रोह की परिभाषा आदि, और कहीं मौलिक बातें भी छोड़ दी गई हैं। उदाहरणार्थ-प्रतिनिधि सभा के स्पीकर के अधिकारों का वर्णन इसमें नहीं मिलता, दोनों सदनों के मतभेद को सुलझाने की व्यवस्था नहीं की गई है, संघीय नियुक्तियों की व्यवस्था हुई है, परन्तु महाभियोग के अलावा उनके हटाये जाने के लिए कोई प्रबंध नहीं हुआ। यही बातें राजनीतिक दलों, बजट तथा कुछ अन्य बातों के संबंध में कही जा सकती हैं। परन्तु जो अधिकार कांग्रेस को दिये गये हैं उनका क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उनके अन्तर्गत सब छूटे हुए प्रश्नों पर नियम बनाये जा सकते हैं और इस प्रकार इन न्यूनताओं को पूरा किया जा सकता है। 

    समीक्षा (Evaluation)

    जब हम संविधानवाद के आलोक में अमेरिकन संविधान के विशेषताओं का अवलोकन करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका में संविधानवाद के आधारभूत तत्वों का समावेश है। संविधानवाद के मान्यताओं के अनुकूल अमेरिकन संविधान, शासन की आधारभूत संस्थाओं-व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका तथा राजनीतिक दलों, समूहों एवं प्रशासकीय सेवाओं की समुचित व्यवस्था एवं स्थापना करता है। सबसे बड़ा बुनियादी सिद्धान्त, जिसने अमेरिकी संविधान को अनुप्रमाणित किया है, वह है राज्य की व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का साधन मात्र मानने वाला विचार। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए व्यवस्थापिका, कार्यकारिणी एवं न्यायपालिका को पृथक कर दिया गया है। जिससे कोई एक विभाग दूसरे विभाग से मिलकर वैयक्तिक स्वतंत्रता को आघात न पहुँचा सके। साथ ही, यद्यपि शासन के तीनों विभागों को अलग कर दिया गया है तथापि सरकार के किसी एक अंग को भी, अपने क्षेत्र में मनमानी करने की शक्तियाँ नहीं दी गई हैं। इसके लिए व्यवस्था है कि सरकार के तीनों अंग परस्पर एक-दूसरे को नियंत्रित करें एवं परस्पर सन्तुलन की स्थापना करें। इस तरह सरकार की शक्तियों का सीमांकन कर दिया गया है ताकि शासकों के स्वेच्छाचारी कार्यों से जनता की रक्षा हो सके। इतना ही नहीं, कानून का शासन, मौलिक तथा नागरिक स्वतंत्रताओं का अस्तित्व, न्यायपालिका और प्रशासनिक सेवा के कार्य में विधायिका के हस्तक्षेप से बचाव किया गया है। कुछ अधिकारों को संविधान द्वारा सुरक्षित कर दिया गया है, जिसके उल्लंघन किये जाने पर व्यक्ति न्यायालय की शरण ले सकता है। केन्द्रीय स्तर से लेकर संद्यारित राज्यों के मध्य अधिकारों एवं शक्तियों का विवेचन, अमेरिकन संविधान की विलक्षण विशेषता है। सरकार की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया गया है। इस हेतु जनता को प्रभुसत्ता सौंपी गई है। शक्ति पृथक्करण, संतुलन और नियंत्रण की व्यवस्था है। एक अधिकार पत्र को अपनाया गया है, ताकि सरकार लोगों के मौलिक अधिकारों का मान सम्मान करे और उसकी स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप न करे। जन प्रतिनिधियों को ही केवल सरकार की शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है। सेना पर नागरिकों का नियंत्रण रखा गया है।

    अमेरिकन संविधान विकास का भी प्रतिफल है। इसे विभिन्न सम्मेलनों में किये गये वाद-विवादों के बाद लिए गए निष्कर्षों के आधार पर राज्यों के अनुसमर्थन द्वारा अपनाया गया है। राजनीतिक संगठन के रूप में वैध सरकार की स्थापना की गई है। ये सरकार जनता द्वारा निर्वाचित होती हैं।

    वस्तुतः संविधानवाद की आधारभूत विशेषता विधि और विनियमों द्वारा संचालित व्यवस्था से है उसका स्पष्ट दृष्टान्त अमेरिकन संविधान में परिलक्षित होते हैं। अमेरिकन व्यवस्था (संविधान) प्रजातांत्रिक भावना और व्यवस्था पर आधारित व्यवस्था है जिसमें मानवीय मूल्यों, आस्थाओं एवं आकांक्षाओं-इच्छाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

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