उत्तर आधुनिकतावाद के सिद्धांत, अवधारणा का वर्णन कीजिये।

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उत्तर आधुनिकतावाद के सिद्धांत, अवधारणा का वर्णन कीजिये।

    उत्तर-आधुनिकतावाद एक जटिल प्रत्यय है, जो पाश्चात्य विश्वविद्यालयों में बड़ी तीव्रता से फैला है। पश्चिम में अमेरिकी विचारकों ने एक सीमा तक इसे विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इसके सम्बन्ध में विचार करते समय अनेक प्रश्न उठते हैं। यह आधुनिकता से एकदम भित्र है या उसी का अगला चरण है ? इसके अपने लक्षण क्या हैं ? इसका प्रभाव भारत में तथा तीसरी दुनिया के देशों अथवा विकासशील देशों पर क्या पड़ रहा है?

    उत्तर आधुनिकतावाद का उद्भव

    उत्तर-आधुनिकतावाद का प्रचलन 20वीं शदी के सातवें और आठवें दशक में हुआ है। इसके दर्शन सबसे पहले वास्तुकला के क्षेत्र में होते हैं। इस सिद्धांत को लोकप्रिय बनाने का श्रेय रॉबर्ट बेंतुरी और जेम्स स्टर्लिंग को जाता है। उन्होंने इसका प्रयोग वास्तुकला की अन्तरराष्ट्रीय शैली के विरोध में किया और इसी क्षेत्र में आधुनिकता के अवसान की घोषणा की गई। इसे फ्रांसीसी उत्तर-संरचनावादियों--देल्यूज़, दरिदा, माइकेल फुको से अधिक बल मिला। ये सब आठवें दशक में क्रियाशील थे और अनेक अर्थों में एक-दूसरे से मिलते-जुलतेथे तथा समान थे। ये सभी यथार्थ के खण्डित, परस्पर-विरोधी और विजातीय तथा बहुवाची या अनेकान्तवादी चरित्र के समर्थक थे। बाद में उत्तरआधुनिकतावादी कला, उत्तर-दर्शन, उत्तर-आधुनिकतावादी सिद्धांतों को एक-दूसरे से सम्बद्ध कर दिया गया।

    उत्तर आधुनिकतावाद की अवधारणा

    उत्तर-आधुनिकतावाद उत्तर और आधुनिकता के योग से बना है। उत्तर का अर्थ है--बाद का अर्थात् दो-तीन दशकों में व्याप्त साहित्यिक चेतना अथवा प्रयोगवादी या नयी काव्यधारा से पृथक् प्रकार की साहित्यिक चेतना । इसी तरह आधुनिकतावाद आधुनिक' और 'वाद' शब्दों से जुड़कर बना है। इसका अर्थ है आधुनिकता से सम्बन्धित सामग्री। आधुनिकता, आधुनिक की भाववाचक संज्ञा है।

    अंग्रेजी में आधुनिक के लिए 'मॉडर्न' (Modern) शब्द हैं। इसका अभिप्राय है आज के युग से सम्बन्धित विचारधारा ।

    अतः उत्तर-आधुनिकतावाद का अर्थ हुआ--वह विचारधारा, जो आधुनिक युग के भी बाद की है। उत्तर-आधुनिकतावाद शब्द में पहले लगा 'उत्तर' शब्द इसी मन्तव्य को स्पष्ट करता है।

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि उत्तर-आधुनिकतावाद अपने समय (युग) के अन्तर्विरोधों, द्वन्द्वों की उत्पत्ति है। इसमें, जो हो रहा है, उसका सीधा खुलासा है। उत्तर-आधुनिकतावादी साहित्य से वर्तमान काल का बोध होता है, क्योंकि उसमें जीते संघर्ष करते, लड़ते, बौखलाते, तड़पते और ठोकर खाते हुए वास्तविक आदमी का वर्णन है।

    यह साहित्य गत्यात्मक है, स्थिर नहीं। इसका रूप इतनी शीघ्रता से बदलता है कि इससे दिशाहीनता का बोध होने लगता है। इस प्रकार गति ही इसके आकर्षण का मुख्य कारण है।

    आधुनिकतावाद में हमारी सोच निरन्तर बदलती रहती है। हम एक क्षण के लिए किसी चिन्तनधारा में रुककर सोच नहीं सकते, क्योंकि अगले ही क्षण हमारे सामने नयी सोच उपस्थित हो जाती है। पाश्चात्य समीक्षक टेरी इगलटन ने उत्तरआधुनिकतावाद के अनेक स्रोत स्वीकार किए है; यथा -

    उत्तरआधुनिकतावाद के स्रोत 

    1. यथोचित आधुनिकतावाद 
    2. कथित उत्तर-आधुनिकतावाद 
    3. सजीव नयी ताकतों का उद्भव 
    4. सांस्कृतिक अग्रगामिता का पुनः प्रकोप 
    5. कला के लिए एक स्वायत्त भूमि का क्षीण होते जाना 
    6. कुछ निश्चित शास्त्रीय बुर्जुआ विचारधाराओं का निःशेषण

    लियोतार्द आधुनिकतावाद का सम्बन्ध 'ग्रैण्ड नरेटिव' से जोड़ते हैं, जिसमें एक सिलसिला होता है, समग्रता होती है, आध्यात्मिकता का द्वन्द्व होता है। उत्तरआधुनिकतावाद, आधुनिकतावाद से भिन्न है या उसका अगला चरण है। दोनों ही मत एक-दूसरे का विरोध करते हैं।

    कुछ आलोचकों का यह भी मत है कि हम उत्तर-आधुनिकतावाद के युग में रहते हैं। इस युग की अपनी विशेषताएँ हैं, अपनी जीवन-शैलियाँ हैं, अपना सौन्दर्यशास्त्र है और उसका स्वतन्त्र विवेचन है।

    लियोतार्द के मतानुसार उत्तर-आधुनिकतावाद आधुनिकतो के भीतर की ही एक प्रवृत्ति है, जो किसी वस्तु पर विलाप नहीं करती है। वह यथार्थता, क्रमबद्धता और समग्रता की अन्विति को स्वीकार नहीं करती है। इस सिद्धांत के विचारकों को प्रगति और परिवर्तन में अगाध विश्वास था। वे अपने सिद्धांतों के अनुसार यथार्थ को प्रस्तुत करते थे।

    हेमर मास उत्तर-आधुनिकतावाद में भी आधुनिकता की कुछ विशिष्टताओं को बनाए रखना चाहते हैं।

    उत्तर-आधुनिकतावादी यह नहीं सोचते कि दुनिया कैसी है और इसकी व्याख्या कैसे की जाए, वरन् ये लोग दुनिया को वैसी ही स्वीकार करते हैं जैसी वह है, क्योंकि इसमें एकता की जगह बहुलता, एकरूपता की जगह बहुरूपता और समत्व की जगह अन्यत्व है।

    उत्तर आधुनिकतावाद की विडम्बना

    उत्तर-आधुनिकतावाद की चिन्ता विडम्बना के प्रति बहुत गहरी है, किन्तु एक विडम्बना उससे बची हुई है। उत्तरआधुनिकतावाद पूँजीवाद की सफलता का पक्षधर रहा है। आज भी अधिकाश सरकारें पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के गीत गा रही हैं। सत्ता-प्राप्त नेता बार-बार घोषणा कर रहे हैं कि उदारीकरण के कारण आज बहुलतावाद है, परिणामशीलता है और खुलापन है। परिणामस्वरूप, आज साम्यवादी विचारधारा का समर्थन करने वाले लोग दब गए है और पूँजीवाद सफलता की ओर अग्रसर हो रहा है।

    इस प्रकार उत्तर-आधुनिकतावाद और आधुनिक पूँजीवादी सफलता में गहरा सम्बन्ध है। इसी पूँजीवाद के कारण आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग गरीबी स्तर से नीचे रह रहा है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के कारण धनी अधिक धनी होता जा रहा है, निर्धन आवश्यक सुविधाओं से वंचित हो रहा है।

    पूँजीवाद और उत्तर आधुनिकतावाद

    आधुनिक युग में पूँजीवाद पूरे समाज को लामबन्द करने का प्रयास कर रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व ने पूरे समाज को लामबन्द करने का प्रयास किया, क्योंकि वह लम्बे समय से आर्थिक विकास की ऊँची दर को अर्जित करता आ रहा था। अमेरिका अन्य देशों को भी साम्यवाद के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित करना चाहता था। पूँजीवाद समाज को दिशा दिखाकर अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना चाहता था। संसार के विकासशील देशों में भी पूँजीवाद का लगभग भूमण्डलीकरण हो चुका है। यही उत्तर-आधुनिकतावाद को सर्वाधिक प्रभावित करता रहा है।

    धीरे-धीरे पूँजीवाद का भूमण्डलीकरण जहाँ उत्तर-आधुनिकतावाद को जन्म दे रहा है, वहीं वह उसके स्वरूप और परिणाम को भी बदल रहा है।

    उत्तर आधुनिकतावादी मानसिकता

    उत्तर-आधुनिक परिस्थिति एक विशेष प्रकार की मानसिकता है। इसे उत्तर-आधुनिक मानसिकता भी कह सकते हैं। यह मानसिकता ऐतिहासिक और सामाजिक यथार्थ के कारण पैदा हुई है, किन्तु उत्तरआधुनिकतावादी मानसिकता इस ओर ध्यान नहीं देती। यही कारण है कि उत्तरआधुनिकता जहाँ एक ओर हमारे बौद्धिक जीवन के विचारों तथा मान्यताओं के रूप में प्रतिष्ठित हुई है, वहाँ दूसरी ओर 21वीं सदी की पूँजीवाद की जन-संस्कृति में भी लक्षित हो रही है। आज विचार-विमर्श, पुस्तकीय चिन्तन, सेमिनार आदि के द्वारा लोगों के जीवन के बारे में चिन्तन किया जा रहा है, किन्तु उस चिन्तन को क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है। पूँजीवाद की जो विशेषताएँ 21वीं सदी की जन-संस्कृति का निर्माण कर रही हैं, वही उत्तर-आधुनिकतावाद की छवि का निर्माण भी कर रही हैं।

    सामन्ती ठहराव के कारण ग्रामीण जीवन में बिखराव आ गया है। लोग अधिकाधिक नियतिवादी बन रहे हैं। इस स्थिति के पीछे धर्म का बहुत बड़ा हाथ है। दूसरी ओर शहरी जीवन में भाग-दौड़ है। पूँजीवाद व्यक्ति-केन्द्रित मानसिकता को पुष्ट कर रहा है। वस्तुतः उत्तर-आधुनिकतावादी मानसिकता के पीछे आज के पूँजीवाद के क्रिया-कलाप ही उत्तरदायी हैं। ये ही इसके उद्भव और विकास की भूमिका तैयार कर रहे हैं।

    उत्तर आधुनिकतावादी का मूल्यांकन

    उत्तर आधुनिकतावाद में कम्प्यूटर-युग, दूरसंचार-माध्यम, प्रौद्योगिकी के कारण जो नयी स्थितियाँ पैदा हुई हैं, उन्हीं से उत्तर-आधुनिकतावादी चेतना का विकास हुआ है। इसमें तर्क, इतिहास, यथार्थ, रूप, सभी का नकार है। यह एक अराजकतावादी प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति से उद्भूत उपभोक्तावाद ने हमारी संस्कृति और मूल्यों पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया है। इसे एक प्रकार के नकारात्मक सौन्दर्य-बोध का आह्लाद कहा जा सकता है। इसके आलोचनात्मक सिद्धांत उत्तर-संरचनावादियों में मिलते हैं।

    उत्तर-आधुनिकतावाद की नकारात्मकता के कारण दरिदा ने इसे 'अनुपस्थिति की खोज' कहा है। 

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