ईसाई विवाह का अर्थ तथा विशेषताएं बताइए।

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ईसाई विवाह का अर्थ तथा विशेषताएं बताइए। 

    ईसाई विवाह का अर्थ

    ईसाई धर्म में विवाह का अर्थ है कि 'एक पुरुष और एक स्त्री के बीच सामाजिक समझौता जो सामान्य रूप से सारा जीवन चलता रहता है और ईसाई विवाह का उद्देश्य यौन सम्बन्ध, पारस्परिक संसर्ग और परिवार की स्थापना है।

    ईसाई विवाह की विशेषताएं 

    ईसाई विवाह को कानूनन सही होने के लिए कुछ शर्तें हैं। ये हैं:-

    (1) वर की उम्र कम से कम 21 साल और कन्या की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए।
    (2) विवाह के समय वर या कन्या दोनों के कोई जीवित पत्नी या पति नहीं होने चाहिए। 
    (3) तलाक शुदा व्यक्ति या जिसके जोड़े की मृत्यु हो चुकी हो दोबारा विवाह कर सकते हैं।
    (4) लड़का यदि 21 साल का न हो तो उसके पिता की सहमति आवश्यक होगी।
    (5) वर और कन्या दोनों मानसिक रूप से स्वस्थ्य होने चाहियें। किसी पागल व्यक्ति की शादी के लिये कानून में मनाही है। इसलिए कि ऐसे व्यक्ति विवाहित जीवन नहीं निभा सकते।
    (6) पति के नामर्द होने के कारण शादी परिपूर्ण न हो तो पत्नी अदालत से विवाह को रद्द या शून्य घोषित करने की मांग कर सकती है।
    (7) पति और पत्नी नजदीकी रिश्तेदार नहीं होने चाहिये, जैसे कि भाई-बहिन, मा¡-बेटा। नजदीकी रिश्तेदारों के बीच विवाह करना कानून के खिलाफ है।
    (8) शादी धोखे या दबाव से हुई हो, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
    (9) अगर किसी स्त्री पर कोई दबाव डालकर या जबरदस्ती से शादी करता है तो अदालत उस शादी को रद्द कर सकती है।

    ईसाई विवाह में जीवन साथी का चुनाव 

    ईसाई धर्म में जीवन-साथी के चुनाव दो तरीके है- (1) माता-पिता द्वारा (2) स्वयं युवक व युवतियों द्वारा। दूसरे ढंग के विवाह का अधिक प्रचलन है। माता-पिता कोर्टशिप को प्रोत्साहित करते हैं। वे युवक व युवतियों को प्रेम करने का अवसर देते हैं।

    ईसाई विवाह पद्धति 

    विवाह तय हो जाने के बाद मंगनी या सगाई की रस्म होती है। इसके लिए एक तारीख तय कर ली जाती है। कन्या व वर दोनों के माता-पिता अपनी सहमति पादरी के पास ले जाते हैं, पादरी इसे पंचों तक पहुंचा देता है। सभी की मिली-जुली राय से मंगनी की रस्म होती है। यह सदैव कन्या के घर होती है। इस दिन दोनों ही पक्ष के लोग एकत्र होते हैं। वर पक्ष मिठाई, अंगूठी, रुपया, नारियल और रूमाल लेकर लड़की के घर आते हैं। कभी-कभी लड़की के लिए कपड़े भी दिये जाते हैं जो मंगनी के अवसर पर लड़की पहनती है। वर-वधू के सामने पादरी बाइबिल के कुछ अंश पढ़ता है, खुशी के गीत गाये जाते हैं। पादरी युवक या युवती से यह पूछता है कि क्या वे विवाह बन्धन को स्वीकार करते हैं। यदि उत्तर 'हाँ' में होता है तो स्वीकृति की निशानी लड़के की ओर से अंगूठी, रुपया व रूमाल व बाइबिल की पुस्तक दी जाती है और लड़की की ओर से अंगूठी, रुपया व रूमाल दिये जाते हैं। पादरी इन अंगूठियों को युवक-युवती को पहना देता है। फिर यह घोषणा करता है कि जब युवक व युवती ने गठबन्धन स्वीकार किया है तो उन्हें ऐसा करने दिया जाये। इसके बाद मिठाई बांटी जाती है। दावत दी जाती है और यह रस्म पूरी हो जाती है। मंगनी के बाद लड़की व लड़के को मिलने-जुलने व घूमने-फिरने की स्वतंत्रता होती है।

    विवाह संपन्न होने से पहले युवक व युवती को निम्न बातें पूरी करनी होती हैं : .

    1. चर्च की सदस्यता का प्रमाण-पत्र । 

    2. चरित्र प्रमाण पत्र 

    3. विवाह के लिए प्रार्थना पत्र जो विवाह के तीन सप्ताह पहले आना चाहिए।

    जब उपरोक्त शर्ते पूरी हो जाती हैं तो युवक व युवती दोनों के चर्चों में तीन रविवार इश्तिहार लगाये जाते हैं. जिनमें लिखा होता है कि अमुक युवक का विवाह अमुक युवती से होना मंजूर हआ है। यदि किसी को किसी प्रकार का एतराज हो जिससे इन दोनों में विवाह न हो सके, तो अपना एतराज लिखकर दे और शाही हर्जाना भी जमा करें। यदि कोई विरोध नहीं होता तो पादरी प्रमाण पत्र देता है। तब विवाह संपन्न हो सकता है।रीक होते हैं।

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