राजनीति तथा राजनीति शास्त्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।

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राजनीति तथा राजनीति शास्त्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।

राजनीति तथा राजनीति शास्त्र में अंतर

  1. राजनीति' से अभिप्राय व्यावहारिक अर्थात उन राजनीतिक गतिविधियों से है जो कि वास्तव में समाज में हो रही होती हैं। इसके विपरीत राजनीति-शास्त्र राज्य तथा सरकार के संगठन तथा कार्यों का अध्ययन करने वाला एक सामाजिक विज्ञान है।
  2. राजनीति' में केवल राज्य के व्यावहारिक कार्यों का जोकि वह प्रतिदिन करता है. उसका ज्ञान होता है। राजनीति-शास्त्र राज्य तथा सरकार के आधारभूत सिद्धान्तों, जाती हैं। आज राज्य और सरकार के सम्मुख जो भी समस्याएँ विद्यमान हैं, उन्हें राजनीति का नाम दे दिया जाता रहा है। इन समस्याओं में, मजदूर और मालिकों के झगड़े, आयात और निर्यात का प्रश्न, श्रम समस्या, राजनीतिक दलबन्दी, व्यवस्थापिका और कार्यकारिणी के पारस्परिक सम्बन्ध आदि आते हैं।
  3. उनकी उत्पत्ति, विकास, प्रकृति एवं कार्यों का सैद्धांतिक वर्णन करता है। (3) 'राजनीति' व्यावहारिक क्रिया है जब कि राजनीति-शास्त्र सैद्धांतिक अध्ययन।
  4. प्रत्येक राज्य में राजनीति अलग-अलग होती है। यद्यपि राजनीतिक सिद्धान्त समान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, भारत एवं इंग्लैण्ड की राजनीति तो अलग-अलग है परन्तु राजनीतिक सिद्धान्त लगभग समान हैं।
  5. हम में से प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में देश की राजनीति में भाग अवश्य लेता है, परन्तु राजनीति-शास्त्र एक अध्ययन का विषय भी है जिसे विद्यार्थी पढ़ते हैं तथा राज्य तथा सरकार के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं। राजनीति में लगे हुए व्यक्तियों को राजनीतिज्ञ (Politicians) कहा जाता है जब कि राजनीति-शास्त्र के ज्ञाताओं को राजनीतिक विचारक या . राजनीतिक वैज्ञानिक (Political Thinkers or Political Scientists) कहा जाता है।
  6. राजनीति-शास्त्र में भेद का पता इस बात से लगता है जब हम देखते हैं कि एक राजनीतिज्ञ बिना राजनीतिक सिद्धान्तों का ज्ञान रखे, सफल रह सकता है जबकि एक राजनीतिक-विचारक अपने राजनीतिक ज्ञान के होते हुए भी राजनीति में असफल रह सकता है।

प्रमुख राजनीतिक विचारक ब्लूशली (Bluntschli), राजनीति तथा राजनीति-शास्त्र में भेद को प्रकट करते हुए लिखते हैं, "राजनीति एक कला है जिसका सम्बन्ध राज्य तथा सरकार, की व्यावहारिक समस्याओं से है, जबकि राजनीति-शास्त्र राज्य का विज्ञान है।" राजनीति-शास्त्र में राज्य के आधारभूत सिद्धान्तों, उसकी प्रकृति, कार्यों तथा विकास का अध्ययन आता है। राजनीति से हमारा अभिप्राय व्यावहारिक समस्याओं से है।

अतः राज्य तथा सरकार के संगठन, प्रकृति तथा कार्यों के अध्ययन करने वाले विषय को परम्परागत रूप में राजनीति-शास्त्र ही कहा जाता है। यद्यपि वर्तमान समय में इसका क्षेत्र. अत्यन्त विस्तृत हो चुका है तथा इसमें राजनीति का अध्ययन भी शामिल हो चुका है।

इसके साथ हम एक बात और स्पष्ट करना चाहेंगे कि राजनीति-शास्त्र में हुई व्यवहारवादी क्रांति (Behavioural Revolution) के पश्चात् इस विषय में व्यावहारिक राजनीति के अध्ययन को प्रमुख स्थान प्राप्त हो चुका है। एक बार फिर इस बात पर बल दिया जा रहा है कि विषय का नाम 'राजनीति' ही रखा जाना चाहिए। परन्तु परम्परावादी यह कहते हैं कि जब तक 'राजनीति' शब्द के साथ जुड़ी नकारात्मक भावना को दूर नहीं किया जाता तब तक 'राजनीति-शास्त्र' नाम ही उचित है। अगर 'राजनीति' शब्द का प्रयोग अपने मूल रूप (यूनानी रूप) में किया जाए तो कोई आपत्ति वाली बात नहीं होगी। 

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