सामाजिक वर्ग से क्या आशय है ? वर्ग की परिभाषा एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

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सामाजिक वर्ग से क्या आशय है ? वर्ग की परिभाषा एवं विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

  • सामाजिक वर्ग के अर्थ एवं परिभाषाओं को स्पष्ट कीजिए।
  • सामाजिक वर्ग की दो प्रमुख विशेषताएं बताइए
  • वर्ग का अर्थ एवं महत्व बताइए।

    सामाजिक वर्ग का अर्थ

    सामाजिक वर्ग व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिसके सदस्यों की आर्थिक स्थिति एक जैसी होती है। उदाहरण के लिए-पूँजीपति वर्ग के सदस्यों की आर्थिक स्थिति तथा उन्हें मिलने वाले जीवन अवसर लगभग एक जैसे होते हैं। मार्क्स के अनुसार, मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक सामाजिक प्राणी है परन्तु आधारभूत रूप में वह 'वर्ग प्राणी है' अर्थात् सब व्यक्ति समाज में ऊँचे नीचे होते हैं। इसको निश्चित करने के लिए विभिन्न समाजों में इनकी विभिन्न स्थिति होती है। वर्गीय अन्तर प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में सदैव विद्यमान रहे हैं और आज भी हैं।

    सामाजिक वर्ग की परिभाषाएं

    सामाजिक वर्ग व्यक्तियों को विद्वानों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है

    1. मैकाइवर तथा पेज (Maclver and Page) के अनुसार-"सामाजिक वर्ग एक समुदाय का कोई एक अंग है, जो सामाजिक स्थिति के आधार पर शेष भाग से पृथक दिखता है।"
    2. जिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार- "समुदाय के भागों अथवा व्यक्तियों के संग्रहों को, जिनमें व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्ध समानता पर आधारित हैं और दूसरे समूहों से श्रेष्ठता और हीनता के स्वीकृत अथवा मान्य प्रतिमानों द्वारा पृथक समझे जाते हैं, वर्ग कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त, जिन्सबर्ग के अनुसार, सामाजिक वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिसमें सामान्य वंशक्रम, समान पेशों, सम्पदा और शिक्षा द्वारा एक समान जीवन का ढंग विकसित होता है। इनके विचार, भावनाएँ, मनोवृत्तियाँ व व्यवहार के रूप आदि सभी समान होते हैं तथा इनमें से किसी आधार पर जो एक समूह की भाँति परस्पर सम्मान से मिलते हैं यद्यपि उनका व्यवहार विभिन्न प्रकार का हो सकता ह
    3. लेपियर (Lapiere) के अनुसार-"एक सामाजिक वर्ग संस्कृति की दृष्टि से एक पृथक् समूह है जिसे सम्पूर्ण जनसंख्या में एक निश्चित स्थिति प्रदान की जाती है।"\(4) ऑगबर्न तथा निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-"एक निश्चित समाज में सामान्य रूप से एक ही सामाजिक परिस्थिति वाले व्यक्तियों का समूह एक सामाजिक वर्ग है।"

    उपर्युक्त पभिाषाएँ देने वाले सामाजशास्त्रियों ने वर्ग को ही सामाजिक वर्ग माना है। परन्तु कुछ विद्वानों ने आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर सामाजिक वर्ग की परिभाषा की है। मैक्स वेबर इस विचारधारा के समर्थक हैं। उनके अनुसार, वर्ग में विशेष रूप से आर्थिक दशाओं द्वारा निर्धारित समान सामाजिक अवसर होते हैं। ये समानता की स्थिति के समूह वर्ग के समानान्तर तो हो सकते हैं परन्तु आमतौर पर समान नहीं होते।

    मार्क्स तथा एंजिल्स के अनुसार, उत्पादन के साधनों से सम्बन्धित स्तर वर्ग हैं। उनके अनसार वर्ग आर्थिक विभेदीकरण का एक रूप है। मार्क्सवाद के अनुसार, सामाजिक वर्ग एक समूह है। इस समूह का उत्पादन के साधनों से सम्बन्ध होता है। यह राज्य के राजनीतिक मंचों पर कार्य करता है। यह संगठन आत्म-चेतनात्मक होता है, परिणामस्वरूप दूसरे वर्गों के प्रति इसके कुछ स्पष्ट रूप विकसित हो जाते हैं। इन सब बातों पर विचार करने वाला वर्ग-संगठन समाज में प्रतिष्ठा तथा स्थिति का क्रमात्मक स्तरीकरण ऐसे समूहों में विभाजित हो सके जिनकी कुछ सामाजिक, आर्थिक, मनोवृत्ति सम्बन्धी तथा सांस्कृतिक विशेषताएँ हों तथा जिन्हें प्रत्येक को समुदाय के निर्णयों में शक्ति के भिन्न अंशों के भोग का अवसर प्राप्त हो। परन्तु इस विचारधारा का समाजशास्त्रीय महत्व बहुत कम है।

    सामाजिक वर्ग की विशेषताएं बताइये।

    सामाजिक वर्ग की प्रमुख विशेषतायें : सामाजिक वर्ग की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं

    (1) सामाजिक स्थिति में ऊँचे-नीच - प्रत्येक समाज में वर्गों की ऊँच-नीच के आधार पर श्रेणी होती हैं। इसमें सर्वोच्च सामाजिक स्थिति का वर्ग के ऊपर और अन्यों का क्रमानुसार नीचे स्थान की ओर चला जाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वर्गों में एक प्रकार की सामाजिक स्थिति सम्बन्धी ऊँच-नीच की भावना पाई जाती है। भिन्न वर्गों में परस्पर श्रेष्ठता या हीनता की भावना होती है। यह भावना धनी वर्ग में स्पष्ट रूप से पाई जाती है, क्योंकि वे निर्धन वर्ग से श्रेष्ठ होते हैं तथा व्यवहार में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार निर्धन वर्ग में हीनता की भावना पायी जाती है।

    (2) वर्ग चेतना - एक वर्ग के सदस्यों में एक विशेष भावना या चेतना होती है जो उनके वर्ग के अन्य सदस्यों और बाह्य वर्गों के प्रति दृष्टिकोण को व्यक्त करती है। दो वर्गों के मध्य पाया जाने वाला भेद वर्ग अन्तर कहा जाता है। सामाजिक दूरी का निर्णय वर्ग के दृष्टिकोणों में ही होता है। वर्गों के दृष्टिकोण के अर्थ में सामाजिक दूरी से तात्पर्य वैयक्तिक पसन्द अथवा घृणा नहीं है। सामाजिक दूरी से तात्पर्य व्यक्तियों के मध्य स्वतन्त्र व्यापार पर लगे प्रतिबन्धों से है, जिनकी स्थिति उच्च व निम्न वर्गों के सदस्यों को देखती है। एक वर्ग के सदस्य वर्ग चेतना की भावना द्वारा एकता के सूत्र में बँधे रहते हैं। परन्तु साथ ही दूसरे वर्गों से अलग होने की भावना भी उनमें होती है। यह भावना श्रेष्ठता की भावना से उदित होती है। इस प्रकार, उच्च वर्ग निम्न वर्ग पर विभाजन थोप देता है। अतः क्रमगत श्रेणी विभाजन व्यवस्था में विभिन्न समूहों के प्रति बिल्कुल भिन्न मनोवृत्तियों वर्ग चेतना को विकसित करती हैं।

    (3) सदस्यता का मुक्त आधार - वर्ग व्यवस्था द्वारा कभी भी कोई भी किसी भी वर्ग का सदस्य अपनी प्रतिभा के आधार पर दूसरे वर्ग का सदस्य बन सकता है। इस आधार पर कहा जाता है कि सदस्यता के लिए सभी वर्गों के द्वार समान रूप से खुले रहते हैं तथा वर्ग व्यवस्था में सामाजिक स्तरीकरण का लचीला स्वरूप मिलता है।

    (4) सामाजिक दूरी - सामाजिक वर्गों में परस्पर सम्बन्ध एक प्रकार का नहीं होता। इसी कारण उनमें सामाजिक दूरी होता है। एक वर्ग के व्यक्ति अपने वर्ग के सदस्यों के साथ विशेष घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं और अन्य वर्गों के लिए घृणा व्यक्त करते हैं। यही समाजशास्त्रीय भाषा में सामाजिक दूरी है तथा वह उच्च-निम्न सब वर्गों में समान रूप से पाई जाती है।

    (5) कर्म की महत्ता - वर्ग स्तरीकरण की सदस्यता जन्म द्वारा निश्चित नहीं होती है। किसी भी वर्ग में जन्म लेने पर व्यक्ति अपने प्रयासों द्वारा दूसरे वर्ग की सदस्यता प्राप्त कर सकता है।

    (6) सामाजिक स्थिरता की न्यूनता - सामाजिक स्थायित्व वर्ग व्यवस्था में कम होता है क्योंकि इसमें स्थिरता कम होती है। सदस्यता के द्वार खुले होने के कारण विभिन्न वर्गों के सदस्यों में परस्पर आदान-प्रदान चलता रहता है।

    मैक्स वेबर के अनुसार वर्ग की विशेषताएं-

    मैक्स वेबर ने वर्ग की तीन प्रमुख विशेषताएँ बताई हैं

    1. प्रत्येक वर्ग के अन्तर्गत अन्य उपवर्गों का पाया जाना।
    2. प्रत्येक वर्ग के सदस्य को विशेष सामाजिक अवसरों के अनुसार एक वर्ग के सदस्यों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।
    3. जीवन अवसर से जुड़ी एक विशेषता यह है कि वर्ग के अधिकार में सम्पत्ति का होना या न होना एक विशेष परिस्थिति को व्यक्त करता है जिसमें उस वर्ग का अपना स्थान होता है। यही मैक्स वेबर की विचारधारा है।

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