Monday, 21 February 2022

भारतीय संविधान के विकास की विवेचना कीजिए।

संविधान के विकास की विवेचना कीजिए।

  1. संविधान के विकास का चरण समझाइए।
  2. संविधान के विकास का संक्षिप्त इतिहास।

संविधान के विकास

संविधान का विकास : प्रत्येक राज्य में राजव्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन एवं नागरिकों व पदाधिकारियों के आचरण एवं व्यवहार के नियमन तथा इनका अनुपालन सुनिश्चित कराने वाले नियमों, कायदों, कानूनों के संग्रह को संविधान के नाम से जाना जाता है। 'संविधान' का व्यवहारिक रूप से अस्तित्व प्राचीन काल से विद्यमान है। जबसे 'राज्य' का गठन हुआ तब से प्रत्येक राज्य के अपने कायदे व कानन भी अस्तित्व में रहे हैं। आधुनिक युग में 'संविधानवाद' की धारणा का उदय हुआ और संविधान लोकतन्त्र, स्वतन्त्रता, समानता व अधिकारों की पुष्टि करने वाली संग्रहिका के रूप में जाना जाने लगा। आधुनिक 'संविधानवाद' की धारणा के अन्तर्गत संविधान में अनिवार्य रूप से लोकतन्त्र, स्वतन्त्रता समानता, बन्धुत्व जैसे मूल्यों का समावेश किया गया।

वस्तुतः संविधान के विकास का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि संविधान के विकास के कई चरण एवं प्रकार रहे हैं। अतः हमें 'संविधान के विकास को समझने हेतु इसके विविध रूपों एवं चरणों को समझना अपरिहार्य प्रतीत होता है, जोकि निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित है -

संविधान के विकास के विभिन्न रूप

संविधान का विकास विभिन्न रूपों में हुआ है इनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं -

(1) राजा द्वारा प्रदत्त नियमन के रूप में- आधनिक राज्यों का विकास मध्यकालीन राजतन्त्रों से हुआ है। एक के बाद दूसरे शासक ने अपनी प्रजा को कुछ अधिकार और शासन में भाग लेने का अवसर प्रदान किया। अपनी शक्तियों के प्रयोग हेतु कुछ सिद्धान्तों को सीमा के रूप में स्वीकार किया। साधारणतया शासकों ने यह कार्य जनता द्वारा क्रान्ति किये जाने के भय से किया और इस प्रकार सीमित राजतन्त्र अथवा प्रजातन्त्र का विकास हुआ। ऐसे संविधानों को 'ऑक्ट्राइड संविधान' भी कहा गया क्योंकि इनका स्वरूप एक प्रकार के अनुबन्ध या वायदे जैसा होता है।

(2) मननात्मक रचना - इस प्रकार के संविधानों का निर्माण राष्ट्रीय हितों पर चिन्तन एवं राष्ट्रीय समस्याओं के सटीक उपायों पर मनन के द्वारा किया गया। फिलाडेल्फिया सम्मेलन ने सन् 1787 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान इसी प्रकार निर्मित किया गया। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मध्य यूरोप के कई देशों और वर्तमान समय में अनेक नये स्वतन्त्र राज्यों के संविधान इसी प्रकार बने हैं।

(3) क्रान्ति के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये संविधान - फ्रान्स, रूस और स्पेन के संविधानों का निर्माण आन्तरिक क्रान्ति के बाद ही हुआ था। कभी-कभी तो क्रान्ति के बाद बनने वाली अस्थायी सरकार स्वयं संविधान बनाती है और उस पर जनता की स्वीकृति लेती है और कभी कभी यह संविधान - निर्माण के लिए किसी विशेष प्रक्रिया का प्रयोग करती है, जैसे 'संविधान निर्माणी-सभा' बुलाना।

(4) विकास द्वारा-कई विश्व - प्रसिद्ध संविधानों का उद्भव विकास के परिणामस्वरूप हुआ। ग्रेट-ब्रिटेन के संविधान को अधिकांशत: विकास का ही परिणाम कहा जा सकता है।

संविधान के विकास के चरण

संविधान के विकास की यात्रा अति व्यापक व प्राचीन है। इसके विकास के निम्नलिखित प्रमुख चरणों का उल्लेख किया जा सकता है -

(1) प्राचीन काल में संविधान - प्रचीन ग्रीक कानून - प्रदानकर्ताओं राजनेताओं और दार्शनिकों ने सोच समझकर विभिन्न प्रकार की सरकारों में प्रयोग (परीक्षण) किये और शासन व राजनीति की परिवर्तनशील विशेषताओं पर आलोचनात्मक चिन्तन किया। अरस्तू' वह प्रथम महान विचारक व लेखक हुआ, जिसने संवैधानिक अथवा 'विधि के शासन' की परिभाषा दी। इसी प्रकार ग्रीक इतिहासकार 'पोलिबियस' ने रोमन गणतन्त्र की सदढता और स्थायित्व के लिए उत्तरदायी प्रमख कारण मिश्रित संविधान को बताया। प्रचीन 'रोम' का भी संविधान के विकास में प्रमुख योगदान रहा। रोमन विचारकों की सबसे महत्वपूर्ण देन रोमन कानून और प्रशासन के सिद्धान्त हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी प्राचीनकाल से 'संविधान' के विकास के अंकर पाये जाते हैं। 'मनुस्मृति' महाभारत का शान्ति पर्व' इत्यादि विधि व विधि के शासन के श्रेष्ठ स्त्रोत प्रतीत होते हैं। इस प्रकार पाश्चात्य जगत एवं भारतीय उपमहाद्वीपों दोनों ही क्षेत्रों में संविधान का विकास प्राचीन काल से ही प्रारम्भ हो चुका था।

(2) मध्य-युग में संविधान - मध्ययुग में हुए संवैधानिक विकास के कई महत्वपूर्ण पहलू रहे, जोकि निम्नलिखित हैं

(i) सर्वव्यापी कानून - सर्वव्यापी कानून के विचार को जनरीतियों व प्रथाओं और 'टॉमस एक्वीनास' जैसे विचारक की विस्तारपूर्ण धर्मशास्त्रीय पद्धति ने भी माना। वस्तुत: एक्वीनास ने सर्वव्यापी कानून के चार भेद किये-सनातन, दैवी, प्राकृतिक और मानवीय। मध्ययुग में प्राकृतिक कानूनों व दैवीय कानूनों को सर्वव्यापी कानूनों के रूप में सभी विचारकों ने स्वीकार किया।

(ii) लोकप्रिय प्रभुता - लोकप्रिय प्रभुता के सिद्धान्त का जन्म मध्ययुग में नहीं हुआ था, परन्तु इसे मध्ययुग में पहले से बढ़कर महत्व प्राप्त हुआ। रोमन कानूनों में तो लोकप्रिय प्रभुता का विचार स्पष्टतः समाविष्ट था। लोकप्रिय प्रभता के विचार की एक विशेषता यह थी कि जन-समुदाय अथवा निर्गमित निकाय को कुछ अधिकारों व कर्तव्यों का अधिकारी समझा गया। पैडुआ के मार्सीलिओ ने तो यहाँ तक घोषित किया कि - " जनता की आवाज ईश्वर की आवाज है।"

(iii) प्रतिनिधित्यात्मक शासन - प्रतिनिधि शासन का प्रारम्भ भी मध्ययुग में हुआ समझा जाता है। प्राचीन जगत में मननात्मक सभाएँ थीं, जैसे रोमन सीनेट, परन्तु वे सभाएँ उनमें भाग लेने वालों के अतिरिक्त अन्य किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं। मासिलिया ने राजनीतिक समुदायों के अतिरिक्त मध्ययुगीन चर्च अधिकारियों के लिए भी प्रतिनिधि शासन के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस विचार का संवैधानिक शासन के विकास में कितना अधिक महत्व रहा, इसके बारे में कोई भी कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं समझा जाएगा।

(3) आधुनिक युग में संविधानवाद अर्थात् अर्वाचीन संविधान - आधुनिक काल में संविधान का विकास मुख्य रूप से यूरोपीय देशों से हुआ। इनमें सर्वप्रमुख स्थान इंग्लैण्ड का है। तत्पश्चात् अमेरिका फ्रांस की क्रान्तियों ने भी संविधान के विकास में महत्वपूर्ण दिया। इंग्लैण्ड में मैग्नाकार्टा' को संविधान के विकास का प्रथम चरण कहा जा सकता है। तत्पश्चात् 1628 ई. का 'पिटीशन ऑफ राइट्स' भी संवैधानिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। 1688 ई. की गौरवमयी क्रान्ति के फलस्वरूप इंग्लैण्ड में कैबिनेट पद्धति पर आधारित आधुनिक लोकतंत्रात्मक शासन का प्रादुर्भाव हुआ। 1928 ई. में मताधिकार को विस्तृत एवं व्यापक बनाकर वास्तविक अर्थों में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना हुई।

इसी प्रकार अमेरिका में लड़े गये स्वतन्त्रता के लिए युद्ध (1775 ई.-1783 ई.) ने अमेरिका में विश्व प्रथम आधुनिक लिखित संविधान की आधारशिला रखी। 1787 ई. में अमेरिका में लिखित संविधान लागू किया गया। इसमें 1776 ई. की 'स्वतन्त्रता की घोषणा के प्रावधानों को व्यापक रूप से सम्मिलित किया गया। वस्तुतः अमेरिकी संविधान ही 'आधुनिक आलेखीय संविधान' का सच्चा प्रारम्भ था। इसी प्रकार 1789 ई. की फ्रांसीसी क्रान्ति के पश्चात् आहूत नेशनल असेम्बली ने मनुष्य व नागरिक के अधिकारों का घोषणापत्र' की रचना की, जिसमें राज्य की अनुबन्धात्मक उत्पत्ति, लोकप्रिय प्रभुता और व्यक्ति के अधिकारों के सिद्धान्त समाविष्ट हैं। 1791 ई. में फ्रांस का संविधान निर्माण हुआ और इसमें इस घोषणापत्र को सम्माननीय स्थान दिया गया।

19वीं एवं 20वीं सदी में सभी नवस्वतन्त्र राष्ट्रों द्वारा उपर्युक्त संविधानों से प्रेरणा प्राप्त करते हुए ही संविधानों का निर्माण किया गया। इस प्रकार आधुनिक युग में आधुनिक लोकतांत्रिक संविधानों का विकास हुआ।


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