लोक कथाओं की विशेषताएं लिखिए

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लोक कथाओं की विशेषताएं लिखिए

यहाँ लोक कथाओं की ऐसी विशेषताओं का उल्लेख किया जा रहा है जिनके आधार पर एक कहानी लोककथा है या साहित्यिक कहानी, को पहचाना जा सके। इस संबंध में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के द्वारा वर्णित लोककथाओं की अग्रांकित आठ विशेषताएं इस प्रकार हैं-

लोक कथाओं की विशेषताएं

  1. प्रेम का अभिन्न पुट
  2. अश्लीलता का अभाव
  3. मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से निरंतर साहचर्य
  4. मंगल कामना की भावना
  5. सुख और संयोग में कथाओं का अंत
  6. रहस्य, रोमांच एवं अलौकिकता की प्रधानता
  7. उत्सुकता की भावना
  8. वर्णन की स्वाभाविकता

1. प्रेम का अभिन्न पुट - अधिकांश लोककथाओं में प्रेम का अभिन्न पुट है। लोककथाओं का जीवन से संबंध होने के कारण यह प्रेम का वर्णन स्वाभाविक है। कहीं पर यह प्रेम भाई का बहिन के प्रति है तो कहीं पति का पत्नी के प्रति । कुछ लोककथाएं मां का अपने बेटे के प्रति उत्कृष्ट वात्सल्य पर प्रकाश डालती हैं। बहिन अपने भाई की रक्षा के लिए अन्न-जल का त्याग कर विक्षिप्तों के समान घूमती हुई यश - पात्र बनती है। मां गरीबी में अपने पेट को काटकर बेटे का पालन-पोषण करती हुई वात्सल्य का आदर्श उपस्थित करती है। पति और पत्नी का प्रेम-वर्णन जो इन कथाओं में मिलता है, वह एक दिव्य और आदर्श प्रेम है, जिसमें कहीं भी अश्लीलता की गंध नहीं है। सूफी कवियों के काव्य ऐसे ही आदर्श प्रेम को आधार बनाकर लिखे गए हैं।

2. अश्लीलता का अभाव - लोक कथाओं के विकास में अशिक्षित लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है, लेकिन उनमें कहीं भी अश्लील प्रेम का वर्णन नहीं है। प्रेम का जैसा भद्दा प्रदर्शन आधुनिक कहानियों में मिलता है वैसा वर्णन इन कहानियों में नहीं पाया जाता। आधुनिक कहानियों का प्रेम काम-वासना अथवा सौंदर्य लोभ जनित है। लोककथाओं में वर्णित प्रेम दिव्य, अलौकिक और आदर्श है।

3. मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से निरंतर साहचर्य - जिस प्रकार आधुनिक कहानियां क्षणिक घटना अथवा किसी विशेष पात्र को आधार बनाकर लिखी जाती हैं, उस प्रकार लोककथाएं क्षणिक घटना पर आधारित नहीं होतीं। लोककथाओं में वर्णित घटनाओं का साहचर्य हमारी शाश्वत मूल प्रवृत्तियों से होता है। सुख-दुःख, आशा-निराशा, काम-क्रोध मद लोभ आदि ऐसी ही मूल प्रवृत्तियां हैं, जो लोककथाओं में अभिन्न रूप में अनुस्यूत हैं।

4. मंगल कामना की भावना - मंगल कामना की भावना इन कहानियों की मुख्य विशेषता है। लोककथाएं कहते समय प्रत्येक कथा के अंत में सभी के मंगल की कामना की जाती है। जिस समय का सुख अमुक पात्र को मिला, वैसा सुख प्रत्येक श्रोता को मिले। इस प्रकार का पद प्रत्येक कथा के अंत में कहा जाता है। प्रायः सभी कहानियां लोकमंगल की कामना से ही कही जाती हैं। इनमें व्याप्त व्यष्टिमंगल ही लोकमंगल है। लोक कथाकार अपनी कहानियों में आदर्श घटनाओं को कहकर संसार में मंगल की कामना करता है।

5. सुख और संयोग में कथाओं का अंत - लोककथाओं में दुःख, वियोग, विपत्ति, हानि, निराशा आदि अनेक प्रसंगों का वर्णन हुआ है। कथा का पात्र अपने धर्म की रक्षा के लिए अथवा अन्य किसी कारण से अनेक कष्टों को भोगता है, लेकिन अंत में उसे सुख और सफलता प्राप्त होती है। लोककथाओं की यह मुख्य विशेषता है कि उनका अंत दुःख में नहीं, सुख में होता है, वियोग में नहीं संयोग में होता है। नायक और नायिका में किसी कारण से वियोग हो जाता है, लेकिन नायक चेष्टा करता हुआ और दुःखों को सहन करता हुआ सुख और संयोग प्राप्त करता है। कहानियों के अंत में कथाकार श्रोताओं के सुख की कामना करता है। कहानियों का यह गुण भारतीय मनीषा पर आधारित है।

6. रहस्य, रोमांच एवं अलौकिकता की प्रधानता - लोककथाओं में रहस्य, रोमांच और अलौकिकता का अंश होता है। कुछ पात्र तो ऐसे वीर हैं, जो अलौकिक कार्यों को क्षण मात्र में कर देते हैं, जैसे- अमृत से प्राण लौटा लाना अथवा घाव ठीक कर देना, असंभव कार्य को करके दिखाना । इनके सुनने से श्रोताओं में अद्भुत रस की जागृति होती है। राजा नल के जीवन की घटनाएं इसका सुंदर उदाहरण हैं। 

7. उत्सुकता की भावना - लोककथाओं का यह मुख्य गुण है। इनमें अद्भुत रस की प्रधानता के कारण श्रोताओं की जिज्ञासा आगे की कथा को निरंतर सुनने के लिए बनी रहती है। जिस समय कथाकार कथा को कहता है, उस समय श्रोताओं की भीड़, उनका बार-बार आगे की घटना को पूछना - फिर क्या हुआ, 'अच्छा' और 'हां' शब्द कथा सुनने में उत्सुकता को प्रकट करते हैं। आगे की घटनाओं को जानने की जिज्ञासा कहानियों की मुख्य विशेषता है, लेकिन लोक-कहानियों में यह विशेषता मुख्य रूप से पाई जाती है और आधुनिक कहानियों से अधिक होती है। 

8. वर्णन की स्वाभाविकता – लोककथाओं के वर्णन में स्वाभाविकता होती है। कथानक की घटनाएं, पात्र और कथन शैली एक साथ इस प्रकार पिरोए रहते हैं कि उनमें कृत्रिमता का अनुभव नहीं होता। कथक्कड़ कथानक का बहुत सही और स्वाभाविक वर्णन करता है। इन कहानियों में आधुनिक कहानियों के समान अतिरंजना की प्रवृति नहीं होती। 

लोक कथाओं की अन्य विशेषताएं

  1. आशावादी दृष्टिकोण,
  2. भाग्यवाद एवं कर्मवाद का समन्वय,
  3. प्रकृति-चित्रण का बाहुल्य
  4. समानता की व्यापकता ।

1. आशावादी दृष्टिकोण - लोककथाओं में आधुनिक कहानियों के समान न तो निराशावाद के स्वर हैं और न पलायनवाद की प्रवृति कहानियों के पात्र परिश्रम और उत्साह के साथ कठिन से कठिन कार्यों को करते हैं। कोई भी शक्ति इन्हें उनके उद्देश्य से विलग नहीं कर सकती। वे परिश्रम से शेरनी का दूध प्राप्त करते हैं, भूत, प्रेत और राक्षसों से युद्ध करके उन्हें जीतते हैं, भयावह जंगल इन्हें हतोत्साहित नहीं कर पाते, वे कल्पवृक्ष को उखाड़ लाते हैं और कुद्ध हाथी को अपने वश में कर लेते हैं। मैक्सिम गोर्की के कथनानुसार, लोककथाओं में इस बात को समझ लेना जरूरी है कि उनमें निराशावाद का नाम तक नहीं है । यद्यपि लोककथाओं के रचयिता बहुत ही कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करते थे, उनके कठिन और कमर तोड़ देने वाले परिश्रम को शोषण विफल बना देता था और उनका व्यक्तिगत जीवन भी सुरक्षित नहीं था, क्योंकि उन पर कोई भी अत्याचार किया जा सकता था, फिर भी पूरे समुदाय को अपने अमरत्व और अपने शत्रुओं पर भावी विजय का विश्वास था ।

2. भाग्यवाद एवं कर्मवाद का समन्वय - लोककथाएं किसी भी संस्कृति की जीती-जागती तस्वीर होती हैं। उनमें भाग्यवाद तथा कर्मवाद का समन्वय है। भाग्य के समर्थन के साथ कर्म की उपेक्षा नहीं की गई है। भाग्य की पूर्णता के लिए कर्म को स्पृहणीय माना गया है। भाग्यवाद के साथ कर्मवाद की भी प्रशंसा की गई है।

3. प्रकृति-चित्रण का बाहुल्य - लोककथाओं का उद्भव प्रकृति के सुरम्य प्रांगण में हुआ है और वे वहीं पर सुनी-सुनायी जाती हैं। इन कहानियों में तोता बोलता है, मोर नाचता है, सिंह न्याय करता है और वृक्ष साक्ष्य देता है। मैना, कोयल, कबूतरी और पिंडकुलिया हूंका भरती हैं। कहानियों के श्रोता हैं मुस्कराता हुआ चंद्रमा, हंसती हुई तारावलियां, हरे-भरे खेत, लता-वितान, वृक्ष- शावक, कोयल की कुहु कुहु पपीहे की पी-पी, गोधूलि की बेला में चरागाहों से लौटती हुई गाएं और उनसे मिलने के लिए आतुर बछड़े, रहट चलाता हुआ किसान, घास की गठरी लाती हुई मजदूरिन, सिर पर पानी की गगरी ले जाती हुई ग्रामीण नारी कहानी के वातावरण को प्राकृतिक और सुरम्य बनाती हैं। लोक कथाओं में प्रकृति और मानव एकाकार हो गए हैं। वे आपस में हंसते-बोलते हैं और एक-दूसरे के दुःख-सुख में हाथ बंटाते हैं।

4. समानता की व्यापकता - विश्व भर की लोककथाओं में अद्भुत समानता है। जो कहानियां भारतवर्ष में सुनी-सुनायी जाती हैं, वही कहानियां पात्रों के नामों के अंतर से दूसरे देशों में कही जाती हैं। लोककथाओं की इस समानता के कई कारण हैं। भ्रमणशील मानव जब किसी देश में जाता है तो वह अपने यहां की कहानी वहां के कथा-प्रेमियों को सुनाता है और उसकी कहानियों को स्वयं सुनता है। इस व्यापक क्रिया के कारण कथाएं एक-दूसरे देश में फैली हैं। मानव के मानसिक धरातल की समानता के कारण और उसमें कल्पना तत्व की व्यापकता के कारण भी समान लोककथाओं का विभिन्न देशों में जन्म हुआ है। बुंदेलखंड में प्रचलित सोने की चिड़िया ग्रिम्स की फेयरी टेल्स में गोल्डन वर्ड के रूप में प्रस्तुत की गई है। बेरियर ऐलविन के कथासंग्रह में 'ब्रेव चिल्ड्रन' के नाम से दी गई कथा बुंदेली लोककथा 'काग बिड़ारिन से साम्य रखती है। इसी प्रकार बुंदेलखंड की विशेष लोकप्रिय कहानी 'तीसमार खां' पंजाब में 'फतेखां' के नाम से और ग्रिम बंधुओं के संग्रह में 'ब्रेव लिटिल टेलर' के रूप में प्रचलित है। 

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