Thursday, 24 March 2022

सहरिया जनजाति का वर्णन - Sahariya Tribe in Hindi

सहरिया जनजाति का वर्णन - Sahariya Tribe in Hindi

Sahariya Tribe in Hindi : इस लेख में सहरिया जनजाति का सम्पूर्ण इतिहास, उत्पत्ति, सहरिया जाती का अर्थ तथा सहरिया जनजाति कहाँ पायी जाती है। 

सहरिया जनजाति का इतिहास

सहरिया जनजाति मध्यप्रदेश की प्रमुख जनजातियों में से एक है। "सहरिया" का अर्थ "बाघ का साथी” से है। ये वर्षों से जंगलों में रहते हुये जंगली जानवरों के सहचर हो गये हैं। सहरिया मूलतः म.प्र., राज्य के गुना, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, अशोकनगर, मुरैना, भिण्ड, श्योपुर, सागर, दमोह, विदिशा, टीकमगढ़ एवं छतरपुर में निवासरत है। सहरिया भारत की प्रमुख आदिम जनजातियों (Primitive Tribe) में आते हैं। ये वर्षों से जंगलों में रहते हुये जंगली जानवरों के सहचर हो गये हैं। ये आज भी रास्ते के लिये पक्की सड़कों का प्रयोग नहीं करते हैं, तथा झुंड में ही दिखाई देते हैं। 

सहरिया जनजाति सामाजिक दृष्टि से अत्यन्त पिछड़े हुये हैं। जीवन स्तर में प्राचीन परम्पराओं, आदिम प्रवृत्तियों का सहज दृश्यमान है। शैक्षणिक, स्वास्थ्य, आवास का लगभग पूर्णतः अभाव है। कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं होता है। सहरिया मूलतः एक ऐसी जनजाति है जो जंगलों पर निर्भर है। इसी कारण से ये लोग आज भी मूल रूप से अपनी अर्थव्यवस्था का संचालन, शिकार एवं पशुपालन द्वारा करते हैं। खेती भी प्राचीन कृषि व्यवस्था पर ही आधारित है। विकास के दौर में बढ़ते औद्योगीकरण एवं घटते जंगलों के कारण सहरिया जनजाति को अपने जीवन निर्वाह के लिये सतत् संघर्षशील होना पड़ रहा है। डी.एन. मजुमदार के अनुसार - "मध्यप्रदेश में "सहरियों को अनुसूचित जनजाति ही माना गया है। साथ ही राजस्थान में भी सहरिया अनुसूचित जनजाति ही है किन्तु उत्तरप्रदेश में इन्हें अनुसूचित जाति माना गया है।" संविधान (अनुसूचित जनजातियों) आदेश 1950 के अनुसार सम्पूर्ण मध्यभारत (अब मध्यप्रदेश के अन्तर्गत है) में सहरिया को जनजाति माना गया है। संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश 1951 (पार्ट-2) में सहरिया सोसिआ और सोर को अनुसूचित जनजातियों में रखा गया है, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति सूची आशोधन आदेश 1956 The scheduled castes and scheduled tribes lists (modification order 1956) The scheduled part VI मध्यप्रदेश में सहरिया को जनजाति माना गया है।

विभिन्न शोध अध्ययन (जनजाति) से यह पता चलता है, कि सहरिया जनजाति (मध्यप्रदेश) अत्यंत पिछड़ी हुई अवस्था में है। शहरी भौतिकवादी बदलाव से सहरिया जनजाति भी प्रभावित है। अन्य आदिवासी जनजाति की तरह भी ये जनजाति अपनी आदिम पहचान खो रही है। सहरिया जनजाति में अपनी निजि बोली, इतिहास, संस्कृति का अभाव है। ये अपने आपको प्रथम “आदिवासी' कहते हैं किन्तु इनमें अन्य आदिवासी जनजाति की तरह स्वाभिमान और गौरव दिखाई नहीं पड़ता है। ये प्रायः अपने आपको निम्न जाति का मानकर दूसरे समुदाय से अलग रहना पसंद करते हैं।

जंगलों के विनाश के कारण सहरिया जनजाति अपने मूल निवास से दूर होती जा रही है। आर्थिक विपन्नता के कारण ये मजदूरी करने को मजबूर हैं, इन्हें मजदूरी के अलावा कोई दूसरा काम भी नहीं आता है। सहरिया जनजाति के लोगों ने अपनी कोई खास पहचान भी नहीं बनाई है। इनके बनाये कोई खास उपकरण भी नहीं है जो इनको सभ्य समाज में नई पहचान दिला सकें। ये सुस्त, लाचार, बेबस लोगों का समूह नजर आता है। जिनका जीवन-स्तर सिर्फ भोजन तक सीमित है। जिससे इनकी पहचान ही नहीं बल्कि अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लग गये हैं।

उत्तरप्रदेश के सहरिया लोगों के सम्बन्ध में टर्नर ने लिखा है कि “यहाँ ये पूरी तरह से अपने जनजातीय लक्षणों को त्यागकर जाति के रूप में बदल गये हैं। इन्हें अहीर, चमार, गडेरिया, तथा भंगियों जैसे निम्न जातियों की श्रेणी में रखा जाता है। व्यापक हिन्दू जाति व्यवस्था के फैलाव में इनका पारम्परिक व्यवसाय और स्थान पूरी तरह से समाहित हो गया है।"1 सहरिया जनजाति अपने आप में सामाजिक परिवर्तन चाहती है क्योंकि जंगलों के कम होने से इनकी जंगलों पर निर्भरता लगभग समाप्त हो गई है। अब जो सहरिया शहरों या शहरों के आस पास आकर बस गये हैं वे अब वापस जंगलों में लोटना नहीं चाहते हैं। इसके बदले ये निम्न काम करने को तैयार है। सहरिया जनजाति के प्रति लोगों ने आम धारणा यह भी बना रखी है कि जब तक सहरिया को खाने को मिलते रहे ये काम नहीं करते। निश्चित तौर पर ये सहरिया लोग काम के प्रति अरूचिकर होते हैं, यदि भोजन मिल जाये तो कर्म के प्रति प्रयासरत नहीं होते हैं।

आदिवासी जनजाति के अध्ययन से जनरल कनिंघम ने यह पाया कि किसी समय प्रभावशाली शासक के रूप में प्रतिष्ठित सवर, सहरा, सौरों, सहरिया जनजाति गोंडों से युद्ध में पराजित होकर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो दी। तथा बाद में ये दर दर भटकने के लिये मजबूर हो गये। जनरल कनिंघम लिखते हैं वास्तव में विश्वास पूर्वक यह कहा जा सकता है कि पूर्व में सवर विशाल कोलारियन परिवार के एक महत्वपूर्ण सदस्य थे, और उनकी शक्ति बाद के समय में क्षीण होती गयी। जब उत्तर और पूर्व में अन्य कोलारियन जनजातियों एवं दक्षिण में गोंडों ने इनके आधिपत्य को प्रभावित किया। सहरिया कोलारियन परिवार से पृथक होने के बावजूद अपनी आदिम और जंगली पहचान को बनाई रखी है।

सहरिया जनजाति की उत्पत्ति

सहरिया जनजाति के उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई एक निश्चित विचारधारा उपलब्ध नहीं है। पुराणों और लोक कथाओं में ही इनकी जानकारी प्राप्त होती है, जिसका कोई सटीक वैज्ञानिक आधार भी नजर नहीं आता है। सहरिया जनजाति के लोगों के पास स्वयं का कोई लिखित इतिहास नहीं है। इनके बुजुर्गों को जो जानकारी है वो भी अस्पष्ट और अधूरी है।

प्रो. सी.एस. बेनकेश्वर के अनुसार - "सेहर व अन्य वन्य जातियों भारत के पश्चिमी इलाकों से होकर आयी हैं, बहुत समय पूर्व जब यूरोपीय महाद्वीप से बर्फ ऊधर की ओर छटी तो सहारा जलवायु की पेटी आगे की ओर खिसकी और सहारा बहुत सारा घास का मैदान मरू भूमि में परिणित हुआ। इससे प्रदेश के जंगली पशु शरण की खोज में आगे बढ़े। उन पशुओं के पीछे शिकारी रूप में इन जनजातियों ने भी प्रवेश किया। कुछ नील प्रदेश की ओर बढ़े और कुछ विध्य पर्वत की ओर। इस प्रकार विंध्याचल पर्वत की श्रेणियों के साथ साथ दक्षिणी भारत तक इन जनजातियों का फैलाव हुआ। यह जनजातियाँ अपने धनुष बाण की सहायता से शिकार करके एवं कंदमूल फल एकत्रित करके गुजारा करती थीं। इन जातियों को प्रोटोमेडिटेरियन में गिना जा सकता है। इन जातियों ने प्री-ड्रेविडिन जनजाति को जीता और बाद में उसी से मिल गई। जिन जातियों में नीग्रिटो तत्व पाये जाते हैं। वह मध्य भारत में पायी जाने वाली जनजातियां बेगा कोल सहरिया सोना कोर्ट तथा भील हैं।"1 किन्तु कुछ विद्वानों जिसमें प्रो. बनर्जी प्रमुख हैं ने सहरियों को जन्म स्वदेशी जनजाति के रूप में माना है।

मध्यप्रदेश की 1961 की जनगणना के समय किये गये सहरिया ग्राम गाधेर में उत्पत्ति सम्बन्ध सर्वेक्षण अध्ययन प्रतिवेदन में एक सहरिया वृद्ध से अभिलिखित एक किंदवन्ती के अनुसार - "संसार के रचयिता ब्रहमा ने संसार की रचना के समय सभी जाति के लोगों के लिए स्थान निश्चित किया। सबसे पहले उन्होनें सहरिया की रचना की और उसे इस निश्चित स्थान के बीचों बीच बैठाया। यह अत्यन्त सरल व्यक्ति था। जैसे-जैसे ब्रहमा ने अन्य जातियों के लोगों को बनाया, वे सहरिया के पास आकर बैठने की कोशिश करने लगे। इस कोशिश में वे सहरिया को परे खिसकाते गये। अपने स्वभाव के कारण वह खिसकता चला गया। जब अंतिम जातियों के निर्माण तक एक ऐसी स्थिति आई कि बेचारा सहरिया एकदम खूट अर्थात् सिरे तक पहुँच गया। ब्रह्मा ने जब निरीक्षण के समय सहरिया को एकदम सिरे पर पाया तो पूछा कि उसे जब बीच में बैठाया गया था तो वह सिरे पर कैसे पहुँच गया ? इस पर ब्रह्मा नाराज हुये और कहा कि वह लोगों के साथ रहने लायक नहीं है और श्राप दिया कि वह मनुष्यों की भीड़-भाड़ से अलग रहकर एकान्त और जंगल में ही बसेगा।''2

लोक कथाओं और पुराणों से भी सहरिया जनजाति के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। एक धारणा यह भी है कि सहरिया जनजाति के लोग बाल्मीकि को अपना प्रथम पितृ पुरूष मानते हैं। सहरिया लोग स्वयं को बाल्मीकि की संतान के रूप में देखते हैं। इनका मानना है कि वाल्मीकि भील जाति के थे अतः वे भीलों के सहोदर है। राजस्थान के कोटा जिले की शाहबाद तहसील की सीताबाड़ी में सहरिया आदिवासियों का विशाल मेला लगता है जहाँ पर स्थित वाल्मीकि मंदिर पर सैकड़ों सहरिया दर्शन करने पहुंचते हैं।

एक अन्य लोक कथा के अनुसार सहरिया तथा भील दो सगी बहनों की संतान है। बड़ी बहन (भीलनी) से उत्पन्न संतान भील तथा छोटी बहन सेरिया से उत्पन्न संतान सहरिया कहलाई। सहरिया अपना मूल स्थान मालवा तथा भीलों का मूल स्थान “भीलवाड़ा' बताते हैं।

सहरिया शबरी से भी अपनी उत्पत्ति बताते हैं। सहरिया सौरी (शबरी भीलनी) से उत्पन्न होने के कारण शबर, सबर, सौर और सहरिया कहलाये। गाधर, सर्वे के अनुसार सहरिया और भील एक ही पिता की सन्तान थे। समय पाकर दोनों अपनी जीविका के लिये अलग अलग चले और फिर कभी एक नहीं हो पाये। भीलों को सहरिया आज भी अपना बड़ा भाई मानते हैं। परन्तु एक संस्कृति में पले बढ़े सहरिया भीलों से कब अलग हो गये, इसके बारे में निश्चित कहना मुश्किल है। एक अन्य वितरण के अनुसार निषाद और लवकुश से भी सहरिया अपना सम्बन्ध बताते हैं। बनवासी राम ने शबर कोल किरातों की सेना बनाकर सहायता ली थी।'

लोक कथाओं और किदवंतियों से स्पष्ट होता है कि सहरिया जंगल में रहने वाला एक जनजाति समुदाय है। शब्द व्युत्पत्ति में सा का तात्पर्य सहचर तथा हरिया का अर्थ शेर है। अर्थात शेर का सहचर जो सहरिया के लिये उपर्युक्त शब्द है।

श्री गौंड का मानना है कि सहरिया शब्द की उत्पत्ति फारसी के सहर शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है जंगल। जंगल में रहने के कारण ही इनको सहरिया कहा गया है। शेरशाह सूरी ने शाहाबाद के दुर्गम दुर्ग का निर्माण उनके परिश्रम से ही करवाया था। शेरशाह ने सहरिया के कठोर श्रम तथा निष्ठा की प्रशंसा की है। यह जाति एकदम जंगली होने तथा गोंद, चिरौंजी व वनों से सम्बन्धित अन्य वस्तुओं को विक्रय करने वाली बताया है।

जनरल कंनिघम के अनुसार - सहरिया सौर या सबर है, और यह सजातीय सीथियन शब्द के करीब है। जिसका अर्थ कुल्हाड़ी होता है। सहरिया जाति के लोग हमेशा अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर चलते हैं जो इनकी स्थानीय पहचान बन गई है।

सहरिया उत्पत्ति सम्बन्धी कथाओं पुराण लोक तथा विचारों से यह स्पष्ट होता है कि सौर, संवर, सवरा, सहरा आदि नाम सहरिया जनजाति का प्राचीन नाम है। यह एक आदिम जनजाति है, जो जंगली जड़ी बूटी की अच्छी पहचान रखते हैं। यह जनजाति समूह में अपना जीवन यापन करते हैं। आज वर्तमान में जंगलों की विरलता के कारण इनका भौतिक जीवन प्रभावित हुआ है। अपनी विरासत को छोड़कर ये अर्थिकोपार्जन हेतु कृषि मजदूर के रूप में अवतरित हो रहे हैं। जंगल से दूर हो जाने के कारण स्वास्थ्य हेतु स्वयं की जड़ी बूटी का प्रयोग न कर पाने से स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा है। ये आज भी डाक्टरों से इलाज करवाने से डरते हैं। निरक्षता होने के कारण साहूकार, ठेकेदारों की शोषण प्रवृत्ति का शिकार बने हुये है। अशिक्षा, रोग, कुपोषण और अभाव इनकी नियति बन गई है। भारत सरकार ने सहरिया जनजाति को 'प्रीमिटिव जनजाति' माना है।

सहरिया जनजाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सहरिया जनजाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं है। कनिंघम ने सहरियाओं को सौर या सबर माना है, और सजातीय सीथियन शब्द से इसका अर्थ कुल्हाड़ी से होता है। गार्डन ने “आर्यो और द्रविड़ों से पूर्व भारतवासियों में मुंडा, कोल, हो, शबर, भुइयस, भील, कोर्कु तथा कुरम्बस इत्यादि का गौरव के साथ नामोल्लेख किया है।''

भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में आर्यों के प्रवेश से पूर्व और आर्यावर्त नामकरण के पूर्व ये जनजातियाँ जो आदिवासियों को अपने से बढ़कर मानती थीं यहां के असली भू स्वामी थे। ये जनजातियाँ आदिवासियों को सीरमोद अथवा सेहरा का तात्पर्य सायरा (Siara) था। कालान्तर में यह सम्बोधन आम हो गया। “आर्यों के सुप्रसिद्व राजा राम ने इन आदिवासियों अथवा सेहरा लोगों से बंधुत्व स्थापित किया। राजाराम के प्रभाव में वे आर्य सामाजिक राज के एक अभिन्न अंग बन गए। इस पारस्परिक सम्बन्ध के कारण सेहरा लोगों को नया नाम सेहरा प्राप्त हुआ। सेहरा से सेह तथा आर्यों के सम्पूर्ण आर्य शब्द को मिलाकर सेहरया शब्द बना, जिसका अर्थ आर्यों के सहयोगी हुआ। यही सेहरिया शब्द कालान्तर में स्थान भेदी के साथ सहरिया, सेहरिया अथवा सहरिया नाम उच्चारित होने लगा।''

डॉ. गिडुगुवेंकट सीतापति जो तेलगु भाषा के मान्य विद्वान हैं - ने जीवनव्यापी शोध और शबर जाति के निकट सम्बन्ध के आधार पर प्रमाणित किया है कि "अथर्ववेद में सम्मिलित अनेक अभिचर परक मंत्र शबर भाषा के हैं।''

एक अन्य विवरण के अनुसार राजस्थान के श्री रामस्वरूप जोशी द्वारा लिखित राजस्थान दिवस पर प्रकाशित सहरियों का नया जीवन लेख में कहा गया है, कि सहरिया जनजाति का नाम सहरिया मुगल शासन काल में पड़ा। ऐसी मान्यता है कि फारसी में जंगल को सहरा कहते हैं और यह जाति युगों से जंगल में निवास करती आई है, इसलिए जंगलों में निवास करने वाले सहरिया के नाम से पुकारे जाने लगे।"

सबर शब्द का भाषा वैज्ञानिक उद्भव खोजते हुए जनरल कनिंघम इसका उत्स आर्य भाषा के बाहर खोजते हैं। संस्कृत में सबरा का अर्थ फसल होता है। हेरोडोटस के अनुसार कुल्हाड़ी के लिए सीथियन भाषा में सगारिक शब्द प्रयुक्त हुआ है। 'ग' और 'ब' की परस्पर विस्थान प्रवृत्ति को देखते हुए "सगारिस' से सगर और उसके बाद सबर की उत्पत्ति हुई मानी जा सकती है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इस जनजाति का नाम कुल्हाड़ी लेकर चलने के कारण ही पड़ा। यह सबर लोगों की विशिष्टता भी है कि कोई भी सबर कुल्हाड़ी के बिना यदाकदा ही दिखता है और यह विशिष्टता सभी के द्वारा बहुतायत से देखी गयी है, जिन्होनें भी इन्हें देखा है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सहरिया शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार लोक कथाओं और विचारकों ने इस जनजाति के बारे में विभिन्न निष्कर्ष निकाले हैं। वास्तव में सहरिया शब्द का अर्थ शेर का साथी और कुल्हाड़ी लेकर चलने वाले के निकट अधिक पाया गया है। ये जनजाति समूहों में रखकर आज भी अपनी आदिम प्रवृत्ति का परिचय देती है।

सहरिया जनजाति की भौतिक संरचना

वर्तमान में सहरिया जनजाति के लोग ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, दतिया, मुरैना के क्षेत्र में ज्यादा निवासरत है। सहरियाओं को खंटिया पटेल, राउत या रावत के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। इन नामों के सम्बोधन से ये अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। "रसेल एवं हीरालाल ने भी सहरियों के खूटिया और रावत या राउत सम्मान सूचक शब्द का प्रयोग किया है।''

विभिन्न शोध अध्ययन और अनुसंधान से प्राप्त प्रमाण से ज्ञात होता है कि सहरिया कोलारियन मुण्डा परिवार के सदस्य रहे हैं। निरन्तर परिवर्तन से ये जनजाति अपनी मूल पहचान को बचाने में असमर्थ सिद्व हो रही है।

सामान्यतः सहरिया किसी गाँव या शहर के आस पास पृथक समूह बनाकर रहना पसन्द करते हैं। जंगलों में ऊँची पहाड़ियों की बजाय समतल मैदानी भागों में परम्परागत रूप से समूहों के मकान बनाकर रहते हैं। कभी कभी ये पहाड़ों पर भी मकान बना लेते हैं। मकानों के बसाहट तीन ओर से अंग्रेजी के उल्टे यू (n) आकार में होती है। एक

ओर से आने जाने का रास्ता होता है। बीच में चोंक होता है, जिसमें बंगला यानी अतिथि घर होता है। इनके गांव की बसाहट का कोई निश्चित आकार प्रकार नहीं होता है। बसाहट को ही सहराना कहा जाता है। सहराना के बीच एक बड़ा मकान होता है। इसे बंगला कहा जाता है। इसमें जाति पंचायत की बैठक आयोजन भी किया जाता है।

डॉ. नायक ने सहरियाओं के निवास के बारे में लिखा है कि - "सहरिया गाँव सामान्यतः समतल भूमि पर बसे होते हैं। गांव जंगल पहाड़ियों और घाटियों से घिरा होता है। कुछ सहरिया गाँव पहाड़ियों पर भी बसे होते हैं। साधारणतः घर आमने सामने पंक्तिबद्व चौकोर शैली में बसे होते हैं, जिसे सहराना के नाम से जाना जाता है। घर में साधारण सामान ही रखे जाते हैं - जैसे बाँस की टोकरी, सूपा, लकड़ी का मूसल, अनाज पीसने की चक्की, कुल्हाड़ी, हसिया, थाली, लोटा-गिलास, कटोर, एल्यूमीनियम के बर्तन आदि। सहरिया स्त्रियाँ गहनों की शौकीन होती हैं। ये सिर पर चाँदी के झोला या राखड़ी, नाक में नथ, कानों में झुमके पहनती हैं, जो चांदी या पीतल के बने होते हैं। हाथ में पीतल या लाख का चूड़ा पहनती है। महिलायें प्रायः अपने शरीर में गोदना गुदवाती हैं, जो विभिन्न आकार के होते हैं।

सहरिया जनजाति का मुख्य भोजन ज्वार, मक्का, गेहूँ, बाजरा है। जो इसकी मोटी रोटी या चपाती बनाते हैं। ये जनजाति महुआ को उबाल कर खाने के भी शौकीन होते हैं। ये माँस, मछली, मुर्गी, अण्डे या शिकार किये गये जानवरों के माँस भी खाते हैं। धुम्रपान के लिए बीड़ी का प्रयोग किया जाता है, त्यौहार, उत्सव व शादी ब्याह के समय महुये से बनी शराब पीते हैं। डॉ. टी.बी. नायक के अनुसार - "प्राकृतिक रूप से उगने वाले कंद, मूल, फल, हरी पत्तियाँ खाने का सहरियाओं का सबसे प्रिय शौक है। वनस्पतियों का विस्तृत ज्ञान प्रत्येक सहरिया को पुरखों से विरासत में मिला है।

सहरियाओं का जीवन स्तर अत्यंत साधारण है। भौतिक साधनों का अभाव है, अथवा इसके प्रयोग से अनभिज्ञ है। पोष्टिक भोजन की कमी से एवं शारीरिक स्वच्छता के अभाव के कारण विभिन्न बीमारियों व रोगों से ग्रसित रहते हैं। अंध विश्वास व जादू टोनों के कारण इलाज के अभाव में अकाल मृत्यु से भी ग्रसित है। सामान्यतः सहरियाओं को तन ढकने के लिये वर्ष में एक जोड़ी कपड़ों पर निर्भर रहना पड़ता है। डॉ. टी.बी. नायक के अनुसार- “सहरिया स्त्री-पुरूष नियमित रूप से नहीं नहाते हैं, और न ही अपने कपड़ों को धोने की कभी परवाह करते हैं, जो उनके पास बहुत थोड़े होते हैं।''


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