लोक संस्कृति और लोक साहित्य में अंतर - Lok Sanskriti aur Lok Sahitya mein Antar

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लोक संस्कृति और लोक साहित्य में अंतर

लोक संस्कृति की परिधि का परिचय सोफिया बर्न के अनुसार इस प्रकार है-

1. लोक के रीति-रिवाजों के अंतर्गत संस्कार, अनुष्ठान, पर्व, व्रत, उत्सव, प्रथाएं, परंपराएं त्योहार, मेले, आचार-विचार आदि आते हैं।

2. अंधविश्वास एवं मूढ़ाग्रहों के अंतर्गत तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका, दुआ - ताबीज, झाड़-फूंक, भूत-प्रेत, देवी-देवता, दाने-परियां, शकुनापशकुन दिशाशूल, स्वप्न, भविष्यवाणी से संबंधित लोक- विश्वास आते हैं।

इस सबके अतिरिक्त लोक साहित्य को भी लोक संस्कृति के अंतर्गत समाविष्ट किया जाता है।

इसके ठीक विपरीत भारत के अनेक विद्वानों ने उक्त मत का खंडन किया है और वे लोक संस्कृति के अंग के रूप में लोक साहित्य को मानने को तैयार नहीं हैं। इसी प्रकार डॉ. सत्येन्द्र, डॉ. श्याम परमार प्रभूति विद्वानों ने भी लोक साहित्य को अधिक व्यापक एवं विस्तृत बताया है और इसके बहुत से अंश को लोक संस्कृति शब्द की परिधि में अंतर्भुक्त करने में असमर्थता व्यक्त की है। डॉ. श्याम परमार का मत उद्धृत है-

जहां तक लोक संस्कृति और लोक साहित्य का संबंध है, लोक साहित्य का कुछ अंश ही उसके क्षेत्र में आता है। ऐसा साहित्य भी है जो उसके बाहर है। लोक संस्कृति में केवल वहीं लोक साहित्य समाविष्ट होता है जो लोक की आदिम परंपरा को किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखता है। अतः इस लोक संस्कृति का मूल्य केवल साहित्य की दृष्टि से उतना नहीं, जितना कि इनमें सुरक्षित उन परंपराओं का है, जो भू-विज्ञान के किसी पहलू पर प्रकाश डालती हैं।

इसी प्रकार का एक अन्य मत है, प्रो. बलराज का, जिन्होंने लोक साहित्य को लोक संस्कृति का एक अंग मात्र मानने पर आपत्ति की है और इसी विचार के परिणामस्वरूप लोक संस्कृति को लोक साहित्य की अपेक्षा अधिक विशाल एवं व्यापक मानने के संबंध में विरोधी मत प्रकट किया है। उनका विचार है - यूरोप में फोक लिटरेचर को फोकलोर का एक अंग माना गया है। इस साम्य के आधार पर ही हिंदी में लोक साहित्य को लोक संस्कृति का अंग कहने की प्रथा का सूत्रपात हुआ। लोक संस्कृति के तत्वों का विश्लेषण करने के पश्चात् यह पर्याप्त मात्रा में अवगत हो जाता है कि लोक साहित्य से बहुत मात्रा में साम्य होने पर भी व्यापकत्व तथा उद्देश्य की भिन्नता की दृष्टियों से इनमें भेद भी न्यून नहीं है। अतएव लोक साहित्य को लोक संस्कृति का अंग कहना समीचीन प्रतीत नहीं होता, क्योंकि लोक साहित्य का स्वतंत्र अस्तित्व है, अभिव्यक्ति के अध्ययन का लक्ष्य स्वतंत्र है और कसौटी भिन्न है। उनके पारस्परिक संबंध से प्रतीत हो जाता है कि एक-दूसरे का अंग नहीं वरन् इतिहास, पुरातत्व, समाज-शास्त्र आदि भी लोक संस्कृति के अंग माने जाने चाहिए।

इस संबंध में हमने संकेत भी किया है कि लोक साहित्य का सैद्धांतिक विवेचन करने वाली पुस्तकों में लोक संस्कृति पर विस्तार से चर्चा की गई है। वह भी सब अंग्रेजी पुस्तकों के आधार पर छाया मात्र रूप में वास्तव में लोक संस्कृति और लोक साहित्य को पृथक्-पृथक् शास्त्र मानना चाहिए। लोक संस्कृति के अंतर्गत आने वाली विशेष बातों की अभिव्यक्ति लोक साहित्य में हो जाती है, यह बात अलग है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम लोक साहित्य को लोक संस्कृति का अंग न मानें और इसे स्वतंत्र शास्त्र मानकर इसका स्वतंत्र अध्ययन भी करें। तब इस रूप में चिंतन करने का प्रश्न ही नहीं उठता कि लोक साहित्य की परिधि की तुलना में लोक संस्कृति का विषय क्षेत्र अधिक व्यापक एवं विशाल होता है।

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