Tuesday, 28 December 2021

सविनय अवज्ञा का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।

सविनय अवज्ञा का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. सविनय अवज्ञा से आप क्या समझते हैं ?
  2. स्वतन्त्रता दिवस की घोषणा (1929 ई.) पर टिप्पणी कीजिए।
  3. सोचनीय आर्थिक स्थिति किस प्रकार सविनय अवज्ञा आन्दोलन की प्रेरक बनी ? .

सविनय अवज्ञा आंदोलन से अभिप्राय

सविनय अवज्ञा का सीधा सा अभिप्राय उस स्थिति या व्यवहार से है जिसके अन्तर्गत आज्ञापालक, आज्ञादाता की आज्ञा को विनम्रता पूर्वक मानने से मना कर दे। इसके अन्तर्गत जनता द्वारा सरकार की विभिन्न अनुचित आज्ञाओं की उपेक्षा की जाती है तथा सीधी अवज्ञा से बचते हुए अप्रत्यक्ष अवज्ञा की जाती है। अर्थात् आज्ञापालक शासन के कानूनों का तो सम्मान करता है और समग्र विद्रोह नहीं करता है परन्तु अनुचित कानूनों का प्रतिकार असहयोग का रूप में आवश्य करता है, जैसे - 'कर' न देना, इत्यादि।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारण

सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी माने जा सकते हैं -

  1. भारतीय जनता की दयनीय आर्थिक स्थिति - गाँधी जी द्वारा चलाये गये सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिये भारतीयों की दयनीय आर्थिक दशा विशेष रूप से उत्तरदायी थी। सन् 1930 ई. के आसपास देश में भारी मन्दी और व्यापक रोजगार के कारण भारतीयों, में असन्तोष व्याप्त था। मजदूर, व्यापारी, किसान और सामान्य जनता इनसे परेशान थी। सरकार ने आर्थिक सुधारों की गाँधी जी की न्यूनतम माँगों को भी अस्वीकार कर दिया था। ऐसी स्थिति में गाँधीजी ने पुनः आन्दोलन चलाने का निर्णय किया।
  2. असन्तोष और उत्तेजना का वातावरण - देश में असन्तोष और उत्तेजना का वातावरण तेजी से फैलता जा रहा था। राजनीति में नवयुवक वर्ग अधिक सक्रिय हो गया था। सरकार ने श्रमिक संगठनों के नेताओं पर मेरठ षड्यन्त्र का अभियोग लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इससे मजदूरों में भारी उत्तेजना व्याप्त हो गयी थी। तो वहीं दूसरी ओर सरदार भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त जैसे - क्रान्तिकारियों के साहसिक कार्यों और लाहौर षड्यन्त्र के कारण भारत का राजनीतिक वायुमण्डल अत्यधिक उत्तेजित हो गया। दिसम्बर, 1928 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में पारित गाँधी जी द्वारा भेजे गये अल्टीमेटम का भी सरकार ने कोई उत्तर नहीं दिया। परिणामस्वरूप लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का निर्णय लिया गया।
  3. स्वतन्त्रता दिवस की घोषणा (सन् 1929 ई. लाहौर अधिवेशन) - 1920 के दशक की ब्रिटिश सरकार की नीतियों और दृष्टिकोणों से भारतीयों को यह निश्चय हो गया था कि ब्रिटिश सरकार उस समय तक भारत को स्वराज्य नहीं देगी जब तक वह इसके लिये विवश न हो जाये। अतः भारी क्षोभ और निराशा के वातावरण में पं. नेहरू की अध्यक्षता में दिसम्बर, 1929 ई. को लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन में 31 दिसम्बर, 1929 ई. की रात्रि को 12 बजे रावी नदी के तट पर भारत का तिरंगा झडा फहराकर पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया गया। कांग्रेस के विधान की पहली धारा में 'स्वराज्य' शब्द का अर्थ पूर्ण स्वाधीनता की प्राप्ति हेतु जनता का आह्वान किया गया। यह भी निश्चय किया गया कि 26 जनवरी का दिन 'स्वाधीनता दिवस' के रूप में मनाया जायेगा। आवश्यकता पड़ने पर सविनय आवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का अधिकार भी कांग्रेस कार्यसमिति को दे दिया गया।
  4. इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी की सरकार एवं दिल्ली घोषणा पत्र - मई, 1929 ई. में इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी की सरकार स्थापित हुई। भारतीयों को लेबर पार्टी की सरकार से बहुत आशाएँ थीं, लेकिन भारत के सम्बन्ध में ब्रिटेन की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया। ब्रिटिश प्रधानमन्त्री मैकडोनेल्ड ने भारत को शीघ्र ही राष्ट्रमण्डल में समानता का दर्जा दिये जाने की घोषणा की तथा भारत से गवर्नर को बातचीत के लिये इंग्लैण्ड बुलाया गया। इसके फलस्वरूप 31 अक्टूबर, 1929 ई. को लॉर्ड इरविन ने जो 'दिल्ली घोषणा' की वह बहुत ही अस्पष्ट थी। इसमें भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान करने की कोई तिथि निश्चित नहीं थी। भारत का युवा वर्ग इससे अत्यधिक असन्तुष्ट था।

इस प्रकार उपर्युक्त परिस्थितियों व कारणों के चलते सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रारम्भ की पृष्ठभूमि तैयार हो गयी और 6 अप्रैल, 1930 ई. को दण्डी मार्च के रूप में इसका विधिवत शुभारम्भ हो गया।

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