Saturday, 25 December 2021

कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य भारतीयों की स्वतंत्रता न होकर ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था विवेचना कीजिए।

कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य भारतीयों की स्वतंत्रता न होकर ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था विवेचना कीजिए।

उत्तर - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना एक अवकाश प्राप्त ब्रिटिश अधिकारी 'ए.ओ. हम' द्वार 1885 ई. में की गयी थी। ह्यूम ने तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करते हुये इस संगठन की स्थापना की। ह्यूम का मानना था कि इस प्रकार के राष्ट्रवादी संगठन द्वारा जनता की समस्याओं एवं सरकारी नीतियों में व्याप्त दोषों को सरकार के समक्ष प्रभावी रूप से पहुँचाया जा सकता है।

प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं था। इसके नेता सरकार के प्रति किसी प्रकार के विद्रोह की भावना नहीं रखते थे। इनका संवैधानिक उपायों पर गहरा विश्वास था। कांग्रेस के प्रारंभिक नेता उच्च, माध्यम वर्ग के लोग थे और ये अंग्रेजी शासन, सभ्यता तथा संस्कृति के प्रशंसक थे। अतः इनकी सोच का प्रभाव कांग्रेस की प्रारंभिक नीतियों पर भी पड़ा।

कांग्रेस की स्थापना का ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध

कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज के नेतृत्व में की गई जिस पर ब्रिटिश सरकार यकीन कर सकती थी। कांग्रेस शुरू से ही ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठावान थी। यद्यपि धीरे-धीरे यह राष्ट्रवादी भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम अवश्य बन गई, किन्तु तब भी यह समय-समय पर ब्रिटिश शासन को जन-असंतोष से बचाती रही। जैसे - असहयोग आंदोलन को इसके चरम स्थिति में स्थगित करना और सविनय अवज्ञा आंदोलन की मांगों को ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वीकार न किये जाने पर भी गाँधी-इरविन समझौता करना आदि-आदि। कांग्रेस ने अपने पूरे जीवन में 'दोहरे-चरित्र को दर्शाया। एक तरफ तो यह साम्राज्यवाद के खिलाफ जनांदोलनों की वाहक बनी. किन्त दूसरी तरफ जनता ने जब भी क्रान्ति के रास्ते पर बढ़ना चाहा तो उसका प्रतिरोध भी किया। यह अधिक तेजी से संघर्ष के रास्ते पर इसलिए नहीं बढ़ती थी कि इससे जहाँ साम्राज्यवाद खत्म होगा वहीं बर्जआ वर्ग को मिलने वाली सुविधायें भी समाप्त हो जाएंगी।

इस प्रकार कांग्रेस वास्तविक क्रान्ति (हिंसक विरोध) के विरुद्ध ब्रिटिश शासन के एक हथियार के रूप में काम करती रही और इसकी चरम परिणति माउंटबेटन समझौते में दिखाई देती है। जब उसने देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया।

सेफ्टी वाल्व की अवधारणा को लोकप्रिय बनाने में राम के जीवनी लेखक वेडरबर्न तथा डब्ल्य सी. बनर्जी का विशेष योगदान वेडरबर्न ने लिखा है कि राम को विश्वसनीय स्रोतों से यह ज्ञात हुआ था कि निचले तबके के लोगों में व्यापक असंतोष है। वे भूख से मर रहे हैं और इसलिए वे ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्ति के इच्छुक है। प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेसी नेताओं को अंग्रेजी उदारता न्यायप्रियता और ईमानदारी पर पूर्ण विश्वास था। उनकी यह धारणा थी कि अंग्रेज स्वभाव से ही सच्चे व न्यायप्रिय होते हैं। उनके विचार से अंग्रेज स्वतंत्रता प्रेमी थे और जब अंग्रेजों को यह विश्वास हो जाएगा कि भारतीय स्वशासन के योग्य बन गये हैं। तब वे हमें निश्चित ही इससे वंचित नहीं रखेंगे। वस्तुतः इस अटूट विश्वास ने ही इन नेताओं के मन में अटूट राजभक्ति की भावना को जन्म दिया था। इसी प्रकार इन नेताओं के पास जॉन ब्राइट, हेनरी फासेट और चार्ल्स ब्रेडला जैसे अंग्रेजों के उदाहरण थे जोकि ब्रिटिश संसद में सदैव भारतीय जनता के हितों के पास में बोलते थे।

कांग्रेस की स्थापना वस्तुतः ऐसे ही प्रयासों का परिणाम थी। ह्यूम के नेतृत्व में संस्था की स्थापना के पीछे राष्ट्रवादी भारतीयों की एक निश्चित योजना थी। विचार यह था कि संस्था का संस्थापक एक अवकाश प्राप्त अंग्रेज अधिकारी के होने से संस्था को ब्रिटिश कोप को बचाया जा सकेगा। अर्थात ह्यूम की उपस्थिति कांग्रेस के लिए एक तड़ित-चालक का काम करेगी।

इस अवधारणा की स्थापना के पीछे ह्यूम के जीवनी लेखक वेडर बर्न, कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष डब्ल्यू.सी.बनर्जी, लाला लाजपात राय, रजनी वामदल एम एस गोलवलकर जैसे लोगों का योगदान है। अवधारणा यह है कि लार्ड रिटन के काल का भारत क्रांतिकारी विस्फोटक की स्थिति के करीब पहुंच चुका था। लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियाँ और पुलिस दमनात्मक स्वरूप इस विस्फोटक स्थिति के लिए उत्तरदायी थे। भारतीय असंतोष इस समय ऐसी स्थिति में पहुंच चुका था कि इस बात की प्रबल संभावना थी कि अमेरिका एवं इटली की भाँति स्वतंत्रता के लिए यहाँ भी सशस्त्र संघर्ष शुरू हो सकता था। 1857 के संघर्ष की यादें अभी ताजा थीं। ऐसे में भारतीय असंतोष को एक-दूसरे ही रूप में अभिव्यक्ति देने के लए एक राजनीतिक संगठन की कल्पना की गई। ऐसा महसूस किया गया कि भारत का शिक्षित राजनीतिक वर्ग ऐसे किसी संगठन की कल्पना की गई। ऐसा महसूस किया गया कि भारत का शिक्षित राजनीतिक वर्ग ऐसे किसी संगठन से आसानी से जकड़ जाएगा और किसी प्रकार की जन-क्रान्ति के लिए इस वर्ग के असंतोष की वाष्प को निकालने के लिए यह संगठन 'सुरक्षावाल्व' का काम करेगा और ब्रिटिश शासन को संकट से बचाएगा अतः लार्ड डफरिन की सलाह पर एवं उनके निर्देश पर इस संगठन की स्थापना की गई थी।

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