Saturday, 28 August 2021

पारसी धर्म का इतिहास, संस्थापक तथा विशेषताएं - Parsi Religion in Hindi

पारसी धर्म का इतिहास, संस्थापक तथा विशेषताएं - Parsi Religion in Hindi

इस लेख में जानिए पारसी धर्म का इतिहास, संस्थापक तथा पारसी धर्म के त्यौहार तथा विशेषताएं। History of Parsi religion and Its Founder in Hindi Language.

    पारसी धर्म का इतिहास 

    पारसी धर्म यानी जोरोएस्ट्रिनिइजम दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है. पारसी धर्म की स्थापना पैगंबर ज़रथुष्ट्र ने प्राचीन ईरान में 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व की थी. पारसी धर्म में एकेश्वरवादी और द्वैतवादी दोनों विशेषताएं हैं। इसने संभवतः अन्य प्रमुख पश्चिमी धर्मों- यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम को प्रभावित किया।एक हजार सालों तक जोरोएस्ट्रिनिइजम (पारसी धर्म) दुनिया के एक ताकतवर धर्म के रूप में रहा। 600 BCE से 650 CE तक इस ईरान का यह आधिकारिक धर्म रहा परन्तु आज पारसी धर्म दुनिया का सबसे छोटा धर्म है। 

    धर्म  पारसी , जोरास्ट्रियन
    संस्थापक  पैगंबर ज़रथुष्ट्र
    स्थापना का समय  6वीं शताब्दी ईसा पूर्व
    ईश्वर का नाम  अहुरा मज़्दा
    ईश्वर का शत्रु आहरीमान

    पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ

    पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' है। जेंद अवेस्ता की रचना 'अवेस्ता' या 'अवस्ताई भाषा' के कि गयी है। अवेस्ता साहित्य की रचना एक लम्बे काल तक हुई। प्रारम्भ में यह साहित्य मौखिक रूप में (अलिपिबद्ध) था किन्तु बाद में लिपिबद्ध किया गया था। अवेस्ता ग्रंथों में मौखिक शब्दों, छंदों, स्वरों, भाष्यों एवं प्रश्नों और उत्तरों का उल्लेख हुआ है। एक ग्रंथ (यस्न, 29.8) में अहुरमज्द अपने संदेशवाहक ज़रथुस्त्र को वाणी की संपत्ति प्रदान करते हैं क्योंकि "मानव जाति में केवल उन्होंने ही दैवी सन्देश प्राप्त किया था जिन्हें मानवों के बीच ले जाना था।" 

    पारसी धर्म किसकी पूजा करते हैं ?

    वैदिक धर्म की भांति पारसी धर्म में भी अग्नि को पवित्र माना जाता है तथा अग्नि की पूजा की जाती है। इनके मंदिर को आतिश बेहराम (फायर टेंपल) या दर-ए मेहर कहा जाता है। फारसी में आतिश का अर्थ अग्नि होता है।पारसी धर्म में अग्नि को ईश्वरपुत्र के समान माना जाता है। उसी के माध्यम से वे अहुरा मज़्दा (पारसी धर्म का ईश्वर) की पूजा होती है। ये लोग प्राचीन पैगंबर जरथुश्ट्र की शिक्षाओं को मानते हैं। पारसी मान्यता के अनुसार अहुरा मज़्दा का सबसे बड़ा शत्रु अंगिरा मैन्यु उर्फ आहरीमान है।

    पारसी धर्म का पतन 

    पारसी धर्म के पतन का प्रारंभ 330 ईसा पूर्व हुआ जब सिकंदर ने इरान (प्राचीन फारस) पर  पर हमला किया।सातवीं सदी ईस्वी तक आते-आते फारसी साम्राज्य अपना पुरातन वैभव तथा शक्ति गँवा चुका था। अरबों के ईरान में प्रवेश के बाद पारसियों पर खूब अत्याचार का दौर शुरू हो गया। ईरान में बड़े स्तर पर पारसी धर्म के लोगों का धर्म परिवर्तित करके उन्हें मुस्लिम बना दिया गया। इस प्रकार पारसी अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनकर रह गए। कुछ पारसी धर्मावलम्बी समुद्र के रास्ते भाग निकले और उन्होंने पश्चिमी भारत (मुख्यतः गुजरात, मुंबई ) में शरण ली। 1979 में जब ईरान में इस्लामिक क्रान्ति हुई तो शिया मुस्लिमों ने राजधानी तेहरान में पारसियों के अग्नि मंदिर पर हमला कर दिया और ज़रथुष्ट्र की मूर्तियों को तोड़ उसकी जगह पर अयातुल्लाह अली खुमैनी की तस्वीरें लगा दी गईं. 

    पारसी धर्म के त्योहार

    पारसी धर्म में सात पर्व मुख्य माने गए हैं। इन सात पर्वों के नाम है क्रमशः नौरोज़, खोरदादसाल, जरथुस्त्रनो, गहम्बर्स, फ्रावार देगन, पपेटी तथा जमशोद नौरोज़। इनमें से कुछ पर्वों की जानकारी इस प्रकार है। 

    • नौरोज़ - नौरोज़ या नवरोज़ ईरानी नववर्ष को कहते है, यह फारसियों का नया साल भी कहा जाता है। 
    • खोरदादसाल - ये भी पारसी धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्योहार है। इस दिन पारसी धर्म के संस्थापक ज़राथुस्ट्र का जन्म हुआ था। 
    • फ्रावार देगन - फ्रावार देगन 10 दिवसीय पर्व है, जिसके दौरान मृतकों की आत्माओं (यानी फ्रावाशी) का स्मरण किया जाता है।
    • जमशेद-ए-नवरोज़ - यह पर्व पारसी वर्ष के पहले महीने के पहले दिन मनाया जाता है। यह आम तौर पर 21 मार्च के आसपास होता है। इस दिन वसंत का जश्न मनाकर स्वागत किया जाता है। जमशेद-ए-नवरोज़ का उल्लेख फ़ारसी बुक ऑफ़ किंग्स या शाह नेमेह में किया गया है।

    पारसी धर्म की विशेषताएं

    • हिंदू धर्म की तरह ही पारसियों में भी अग्नि को पवित्र माना जाता है तथा अग्नि की पूजा की जाती है। इनके मंदिर को आताशगाह या अग्नि मंदिर (फायर टेंपल) कहा जाता है।
    • पारसी समुदाय के लोग एक ईश्वर में विश्वास करते हैं जिसे वे 'आहुरा माज्दा' कहते हैं। ये लोग पैगंबर जरथुश्ट्र की शिक्षाओं को मानते हैं। 
    • ईसा मसीह की ही भांति पारसी धर्म के संस्थापक ज़रथुष्ट्र का जन्म भी तीन हजार वर्ष पूर्व एक कुंआरी माता “दुघदोवा” से हुआ था। 
    • पारसी समुदाय एक बंद समुदाय है अर्थात यह किसी दुसरे समुदाय के व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता। यदि किसी पारसी लड़की ने किसी दुसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह किया तो उसके पति तथा बच्चों को पारसी नहीं माना जायेगा।  इसी प्रकार यदि लड़के ने बाहर के धर्म में विवाह किया है तो उसकी पत्नी भी पारसी नहीं मानी जायेगी।
    • “जेंद अवेस्ता” पारसियों का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसको ऋग्वेद के समकक्ष माना जाता है।
    • पारसी के अनुसार एक वर्ष में 360 दिन होते हैं। बाकी पांच दिन में वे अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं।

    पारसी धर्म का अंतिम संस्कार

    जिस स्थान पर पारसी अपना अंतिम संस्कार करते हैं उसे दखमा यानि 'टॉवर ऑफ साइलेंस' कहा जाता है। यह एक गोलाकार खोखला टॉवर (इमारत) होता है जिसमें शव को चीलों, गिद्ध, कौओं आदि के खाने के लिए फेक दिया जाता है। पारसी अंतिम संस्कार की इस प्रक्रिया को दोखमेनाशिनी कहा जाता है। पारसी समुदाय में मृत शवों को दफ़नाने या जलाने की बजाय शवों को चील, कौओं और गिद्ध आदि के लिए आहार स्वरूप छोड़ दिया जाता है।पारसी धर्म में पृथ्वी, जल और अग्नि को पवित्र माना जाता हैं, इसलिए ये शव को दफनाते, जलाते या जल में बहाते नहीं है। इसके बजाय मृत देह को आकाश के हवाले किया जाता है जहां पक्षी उसे अपना आहार बना लेते हैं। 

    भारत में मुंबई के मालाबार हिल में भी पारसी समुदाय का एक दखमा (Tower of silence) स्थित है। यह चारों ओर से घने जंगल से घिरा हुआ है। इस टावर का निर्माण 19 वीं सदी में किया गया था। टावर ऑफ़ साइलेंस में केवल एक ही लोहे का दरवाज़ा है। टावर का ऊपरी हिस्सा हमेशा खुला रहता हैं, जहां शवों को छोड़ जाता है।

    पारसी धर्म और हिन्दू धर्म में समानता

    पारसी धर्म के अनेक रीति रिवाज हिंदू धर्म से मिलते जुलते हैं। ऋग्वेद तथा पारसियों के धर्म ग्रंथ अवेस्ता में शब्दों की समानता पायी जाती हैं। यही कारण हैं कि पारसी ईश्वर तथा ऋगवैदिक हिंदू देवता मित्र वरुण से काफ़ी मिलते जुलते हैं। ऋग्वेदिक काल में ईरान को पारस्य देश कहा जाता था। पारसी धर्म में भी अग्नि को अत्यन्त पवित्र माना जाता है। पारसी धर्म की हुमत, हुख्त तथा हुवर्श्त नामक तीन शिक्षाएं हैं जिन्हें संस्कृत में सुमत, सूक्त तथा सुवर्तन कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ हैं सुबुद्धि, सुभाष तथा सुव्यवहार। 

    क्या पारसी मुस्लिम होते हैं ?

    पारसी धर्म के अनुयायी मुस्लिम नहीं होते हैं। पारसी धर्म धर्म का उदय 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व हुआ था जबकि मुस्लिम धर्म की स्थापना 600 ईस्वी में हुई। अतः स्पष्ट है कि पारसी धर्म, मुस्लिम धर्म से अधिक प्राचीन है। 


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