Saturday, 10 July 2021

किशोरावस्था की समस्या पर हिंदी निबंध / Kishoravastha ki Samasya par Nibandh

इस लेख में पढ़ें "किशोरावस्था की समस्या पर हिंदी निबंध", "किशोरियों की समस्याएं एवं सबला योजना पर हिंदी निबंध"

किशोरावस्था की समस्या पर हिंदी निबंध

किशोरावस्था (10-19 वर्ष) वृद्धि तथा विकास की एक महत्वपूर्ण अवस्था होती है। यह बाल्यावस्था से किशोरावस्था में परिवर्तन का समय होता है तथा इस अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन बहुत तीव्रता से होते हैं। इस अवस्था में किशोर-किशोरी यौन, मानसिक तथा व्यवहारिक रुप से परिपक्व होने लगते हैं। किशोर-किशारियों की समस्यायें विभिन्न प्रकार की होती हैं तथा उनके लिए जोखिमभरी परिस्थितियां भी अलग-अलग होती हैं। उदाहरण के लिए वे विवाहित एवं अविवाहित, स्कूल जाने वाले तथा न जाने वाले, गांव तथा शहरी क्षेत्रों में रहने वाले हो सकते हैं तथा यौन विषय पर उनकी जानकारी में भी अलग-अलग हो सकती है। प्रत्येक समूह की समस्यायें एक दूसरे से अलग हो सकती हैं तथा उनको समाज का ही एक विशेष अंग मानते हुए महत्व देना चाहिए। किशोरावस्था के दौरान हार्मोन परिवर्तन के कारण यौवनकाल की शुरुआत होती है, शारीरिक वृद्धि तेजी से होती है तथा दित्तीयक यौन लक्षण प्रकट होता है। इसके साथ ही मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन जैसे कि स्वयं की पहचान बनाना, किसी प्रकार की रोक-टोक पसंद न करना, यौन इच्छा तथा विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण की भावना उत्पन्न होती हैं। इस अवस्था में वे परिवार के अतिरिक्त बाहरी लोगों के सम्पर्क में भी आने लगते हैं।

किशोर-किशोरी प्रायः अपनी बातों, समस्याओं तथा आवश्यकताओं के सम्बन्ध में अपने से अधिक उम्र के निकटतम लोगों जैसे माता-पिता, अध्यापक तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ता से चर्चा करने में संकोच महसूस करते हैं। इसमें उनके सम्बन्ध, उम्र, लिंग तथा सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों बाधा बनती हैं। अपने जीवन के इस नाजुक मोड़ पर उनके पथ भ्रष्ट होने की संभावना अधिक होती है तथा जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उनको कुपोषण, मादक पदार्थों का सेवन, कम उम्र में गर्भधारण, यौन शोषण, प्रजनन एवं यौन अगों में संक्रमण तथा एच0आई0वी0 जैसे समस्याओं व रोगों का सामना करना पड़ता है।

किशोर-किशोरियों से वार्तालाप करने एवं उन्हें परामर्श देने की आवश्यकता अधिक होती है क्योंकि

  • अधिकांश किशोर-किशोरियां स्वाभाविक रुप से शर्मीले होते हैं तथा किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष अपने सदेह तथा भ्रान्तियों को गोपनीयता तथा अविश्वास के कारण प्रकट नहीं करते।
  • किशोर-किशोरियों के मन में बहुत सी चिन्ताएं तथा उत्सुकतायें होती हैं। उनके शोषण का भय अधिक होता है तथा उनको उम्र, लिंग, शहरी एवं ग्रामीण, शिक्षित व अशिक्षित, गर्भवती होने या न होने जैसी परिस्थितियों के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
  • किशोर-किशोरी स्वाभाविक रुप से किसी से मदद के इच्छुक नहीं होते। उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं को लेने में शर्म महसूस होती है। वे अति प्रतिक्रिया करने वाले होते हैं तथा उनका स्वभाव में परिवर्तन क्षणिक होता है।
  • उनमें शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तनों के विषय में जानने की तीव्र उत्सुकता होती है। वे नहीं जानते कि उनकी इन समस्याओं, मुद्दों और आवश्यकताओं की सही एवं पूर्ण जानकारी कहाँ पर मिलेगी।

किशोरावस्था की समस्याओं के समाधान व् सुझाव 

  • किशोर-किशोरियों के माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को स्वस्थ एवं संतुलित भोजन तथा आहार लेने के लिए प्रेरित करें।
  • माता-पिता को किशोर-किशोरियों को हमेशा शारीरिक गतिविधियां करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उदाहरण के लिए किशोर-किशोरियों का माता-पिता के साथ 1-2 किमी पैदल चलना सुनिश्चित करें। 
  • माता-पिता को युवाओं हेतु ऐसा दिनचर्या बनानी चाहिए कि वे नियत समय पर सोयें तथा रात में अधिक देर तक न जागें। 
  • पारिवारिक कलहों को जितना हो सके कम करने की कोशिश करें तथा इस बात का ध्यान रखें कि युवा शराब तथा ड्रग्स का सेवन न करें। तनाव तथा दर्द को कम करने के लिए इनका प्रयोग समस्या को और अधिक बिगाड़ता है। 
  • इस बात को स्वीकारें कि जीवन में अच्छे के साथ बुरे दिन आते हैं। यदि बच्चों में किसी बात के कारण भय हो तुरंत इस पर ध्यान दें- इसे अस्वीकार या अनसुना न करें। 
  • किशोर-किशोरियों को यह महसूस होना चाहिए कि आपको उनकी क्षमता पर पूर्ण विश्वास है तथा जरुरत पड़ने पर आप उनकी मदद के लिए हर समय उपलब्ध हैं।
  • किशोर-किशोरियों को समझायें कि इस उम्र में तनाव होना आम बात है। उनको अपनी किशोरावस्था की समस्याओं वाले अनुभव बतायें तथा उन्हें समझायें कि अन्य युवा भी तनावग्रस्त होते हैं। 
  • उन्हें छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करने को कहें जिससे वह प्राप्त भी कर सकें क्योंकि लक्ष्य प्राप्त न कर पाने की स्थिति में उनमें कुंठा की भावना जागृत होगी। उनकी मदद करें तथा उन्हें प्रोत्साहित करें। उदाहरण के लिए यदि कोई किशोर-किशोरी समूह के सामने प्रदर्शन करने के बारे में चिंतित हो तो उन्हें सुझाव दें कि वे पहले परिवार के सदस्यों के सामने अपना प्रदर्शन करें। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। 
  • बच्चों के अंदर से भय निकालने में उनकी मदद करें। उनके द्वारा किये गये सभी छोटे-बड़े प्रयासों की प्रशंसा करें। यदि किशोर-किशोरी घबराहट के कारण किसी स्थिति से बचना चाहता है तो इसे कोई मुददा न बनायें। उनको इस बात का विश्वास दिलायें आप जानते हैं कि भविष्य में वे इस प्रकार की स्थिति का सामना करने में सक्षम हो जायेंगे।

किशोर जगत में लैंगिक अंतर 

देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं तथापि सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में बेटा-बेटी के बीच भेदभाव के कारण किशोरियों के किशोरों के अपेक्षा विकास के कम अवसर मिल पाते हैं। शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल स्तर, व्यावसायिक दर्जे जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक विकास संकेतकों से इस विषमता का पता चलता है।

राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण योजना (सबला योजना)

भारत सरकार दबारा २०१० में ११ से १८ वर्ष की किशोरियों के सशक्तीकरण के लिए प्रारंभ की गई योजना है। राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण योजना जिसे सबला भी कहा जाता है २०००-०१ में भारत सरकार द्वारा किशोरियों के सशक्तिकरण के लिए किशोरी सशक्तिकरण योजना का आरंभ किया गया था। यह योजना २००९ तक चलती रही। यह देश के २०० पिछड़े हए जिलों में लाग की गई थी। यही योजना महिला और बाल विकास विकास मंत्रालय (भारत) के सौजन्य से १ अप्रैल २०११ से सबला नाम से पूरे देश में लागू कर दी गयी। 

किशोरावस्था की समस्या पर हिंदी निबंध / Kishoravastha ki Samasya par Nibandh

इसके अंतर्गत ११ से १८ साल तक की किशोरियों में पोषण, प्रशिक्षण एवं जागरुकता को बढ़ावा दिया जाता है। किशोरियों को आयरन और प्रोटीन की गोलियाँ एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्व दिये जाते हैं। योजना का क्रियान्वयन ११ से १४ साल की बच्चियों के लिए मध्याह्न भोजन योजना द्वारा वहीं १५ से १८ साल की किशोरियों के लिए ऑगनबाड़ी केंद्र से किया जाता है। योजना के अंतर्गत प्रति किशोरी प्रतिदिन पाँच रुपये के पोषण व्यय का प्रावधान है। 

सबला योजना का उद्देश्य । 

  1. आत्म-विकास और सशक्तिकरण के लिए किशोरियों को सक्षम करना ।
  2. उनके पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार।
  3. स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण, किशोर प्रजनन और यौन स्वास्थ्य और परिवार और बच्चे की देखभाल के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना।
  4. घर-आधारित कौशल, जीवन कौशल को अपग्रेड करें और व्यावसायिक कौशल के लिए राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम (एनएसडीपी) के साथ एकीकृत करें।
  5. स्कूली किशोरियों को औपचारिक / गैर-औपचारिक शिक्षा से मुख्यधारा में लाना।


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