Hindi Essay on "Olympic Games", "ओलंपिक खेल पर निबंध" for Students

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इस लेख में पढ़ें "ओलंपिक खेल पर निबंध", "Essay on Olympic Games in Hindi Language", "ओलंपिक और भारत पर निबंध" हिंदी भाषा में। 

Hindi Essay on "Olympic Games", "ओलंपिक खेल पर निबंध" for Students

ओलंपिक खेल पर निबंध 

ओलंपिक खेल प्रतियोगिताओं में अग्रणी खेल प्रतियोगिता है। जिसमे सभी देशों के हज़ारों एथेलीट विभिन्न खेलों में भाग लेते हैं। ओलंपिक खेल प्रत्येक चार वर्ष बाद आयोजित की जाती है। प्राचीन काल में यह ग्रीस यानी यूनान की राजधानी एथेंस में 1896 में आयोजित किया गया था। ओलंपिया पर्वत पर खेले जाने के कारण इसका नाम ओलंपिक पड़ा। ओलंपिक की शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन प्रतियोगिताओं में 200 से ज्यादा देशों के खिलाडी शामिल होते हैं।

ओलंपिक का इतिहास 

ओलंपिक खेलों का इतिहास बहुत ही पुराना है। प्राचीन काल में ग्रीस में होने वाले ओलंपिक के समय के लिए चल रहे युद्ध भी टाल दिए जाते थे और दुश्मन फौजें भी बड़ी प्रसन्नता, सद्भावना और बिना किसी 'भय से भाग लेती थीं। जब फ्रांस के बेरोन पियरे दी कोबर्टिन ने सन् 1896 में एथेन्स (ग्रीस) में आधुनिक युग के ओलंपिक की नींव डाली तो प्राचीन खेल सम्बन्धी सदभावना का एक बार फिर से जन्म हुआ।पियरे दी कोबर्टिन ने विश्व को तभी यह नारा दिया था-जीवन जीतने के लिए नहीं, अच्छी तरह लड़ने के लिए है।

ओलंपिक का दुनिया पर प्रभाव 

ओलंपिक का जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रभाव दुनिया पर पड़ा वह था प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ी की व्यक्तिगत हार व जीत को राष्ट्र की हार या जीत माना गया। यानी लोगों की विचारधारा व्यक्ति से उठकर राष्ट्र-व्यापी हुई। जब अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता तो उसे अभिनव बिंद्रा का व्यक्तिगत गौरव कम लेकिन इण्डिया का राष्ट्रीय गौरव अधिक माना गया। अब तो ओलंपिक का मैदान ही विश्व में वह एकमात्र स्थल है जहाँ भाग लेने वाले सभी राष्ट्रों के राष्ट्रीय गीत वहाँ एक समय में गाये जाते हैं।

Hindi Essay on "Olympic Games", "ओलंपिक खेल पर निबंध" for Students

1960 में रोम में हुआ ओलंपिक बहुत महत्वपूर्ण माना गया । इस ओलम्पिक में लगभग सभी राष्ट्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर ओलंपिक की तैयारी में भाग लिया। इसका श्रेय फेडरेशन, इण्टरनेशनल फुटबाल एसोसिएशन के अध्यक्ष पर स्टेनली रोजे को है।

ओलंपिक खेल और भारत 

भारत ने सर्वप्रथम 1920 के अलोंपिक खेलों में अधिकारिक रूप से भाग लिया था। इसमें भारत की ओर से चार एथलीट, दो पहलवान और दो प्रबंधक सोहराब भूत और ए एच ए फयज़ी भेजे गए थे। 1920 और 1980 तक ओलंपिक में भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम का दबदबा बना रहा। इस बीच हुए हुए बारह खेलों में से भारत ने ग्यारह पदक जीते जिनमें 8 स्वर्ण पदक थे। भारत के कप्तान मेजर ध्यान चाँद को हॉकी का जादूगर कहा गया। इसके अतिरिक्त 2004 ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक, एथेंस में डबल ट्रैप स्पर्धा में राज्यवर्द्धन सिंह राठौर ने रजत पदक जीता। 2008 के बीजिंग ओलंपिक में सुशील कुमार ने कुश्ती में कांस्य पदक तथा अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। परन्तु वास्तविकता यह ही है कि भारत अधिकांश खिलाडियों के ओलंपिक प्रदर्शन को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।  

ओलंपिक खेल और अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना 

सरकारी स्तर पर ओलम्पिक की तैयारी में मदद देना और ओलंपिक में भाग लेना 'राष्ट्रीय' और 'राजनीतिक' स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण है। इससे दूसरे राष्ट्रों से सद्भावना बढ़ती है और साथ ही राष्ट्रीय गौरव की भावना भी दृढ़ होती है। लेकिन कभी-कभी इस भावना की हत्या करने वाली घटनाएँ भी घटती रहती हैं और बड़ा ही शर्मनाक दृश्य उपस्थित हो जाता है। जैसे सन् १९३६ में बर्लिन ओलंपिक में अपने को उच्चतम आर्य कहने वाले हिटलर ने नीग्रो खिलाड़ी ओवेन से हाथ मिलाने में इन्कार कर दिया था। १९७२ में हुए म्यूनिख ओलंपिक में पाकिस्तान के हाकी के खिलाड़ियों ने अभद्र व्यवहार का प्रदर्शन किया। दूसरे देशों के राष्ट्रीय ध्वजों का उन्होंने अपमान किया, ओलंपिक 'ध्वजों और पदकों' का अपमान किया। यह सब उन्होंने फाइनल खेल में पश्चिमी जर्मनी से हार जाने पर प्रतिक्रिया रूप में किया । फलस्वरूप पाकिस्तान को विश्वव्यापी निन्दा का शिकार होना पड़ा । यह सच है कि ऐसी घटनाएं ओलंपिक भावना के विरुद्ध हैं लेकिन यह घटनाएँ कभी-कभी स्वाभाविक रूप से घट ही जाती हैं जिन्हें जल्दी भूल जाना ही उचित व श्रेयस्कर है।

ओलंपिक खेलों का संचालन 

इन ओलंपिक खेलों में विश्व के हर राष्ट्र के खिलाड़ी आमंत्रित किये जाते हैं और लगभग सभी भाग भी लेते हैं। इनके प्रबन्ध व संचालन के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति संयोजित व संगठित की जाती है। इस समिति में प्रत्येक राष्ट्र के एक से तीन तक प्रतिनिधि व सदस्य रहते हैं। यही समिति खेलों के लिए स्थान का चुनाव देख-रेख, व्यवस्था और हिसाब की देख-रेख भी रखती है। दो सप्ताह से अधिक चलने वाले इस खेल-पर्व का खर्च, अपने देश के खिलाड़ियों का व्यय-भार अपनी सरकारें उठाती हैं।

ओलंपिक खेलों का आयोजन 

खेल के प्रारम्भिक प्रथम दिवस को एक परेड आयोजित की जाती है जिसमें सभी प्रतियोगी देशों के खिलाड़ी अपनी विशेष वेषभूषा में अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज लेकर चलते हैं। इसके बाद खेल का उद्घाटन होता है। ओलंपिक ध्वज का ध्वजारोहण होता है । ओलंपिक ध्वज सफेद कपड़े का होता है जिस पर पाँच रंगीन गोले आपस में गुथे हुए दिखाई देते हैं। उद्घाटन समारोह तोपों की सलामी के साथ होता है । हजारों कबूतर उड़ाये जाते हैं। सामूहिक राष्ट्र गीत गये जाते हैं। तत्पश्चात् सभी प्रतियोगी यह शपथ ग्रहण करते हैं-"हम शपथ लेते हैं कि इस स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की भावना से ओलम्पिक खेलों के नियमों का आदर करते हए अपने देश के सम्मान और खेलों की प्रतिष्ठा के लिए सच्चे अर्थों में खेल की भावना से ओलंपिक खेलों में भाग लेंगे।" इसके बाद खेल प्रारम्भ होते हैं ।

प्रत्येक ओलंपिक प्रतियोगिता में, प्रथम स्थान पर स्वर्ण पदक दिए जाते हैं, दूसरे स्थान पर रजत पदक से सम्मानित किया जाता है, और तीसरे के लिए कांस्य पदक प्रदान किए जाते हैं; यह परंपरा 1904 में शुरू हुई। ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की सफलता के कारण शीतकालीन ओलंपिक खेलों का निर्माण किया गया था।

ओलंपिक का अंतिम दिन 

जब तक खेल चलता है-ओलम्पिक मशाल जलती रहती है और ध्वज फहराता रहता है । खेल के अन्तिम दिन आगामी खेल का स्थान घोषित होता है। ओलम्पिक खेलों से स्वस्थ-प्रतियोगिता की भावना पैदा होती है और इससे भी बढ़कर विश्व-बन्धुत्व' की भावना बढ़ती है । इस खेल के द्वारा विश्वभर के खिड़ाड़ियों का आपसी सम्पर्क बढ़ता है और खेल एक परिवार बन जाता है ।

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