Tuesday, 19 February 2019

भारत में उपभोक्‍ता संरक्षण पर निबंध

भारत में उपभोक्‍ता संरक्षण पर निबंध

upbhokta sanrakshan
उचित मूल्‍य देकर किसी वस्‍तु अथवा सेवा को प्राप्‍त करने वाले को उपभोक्‍ता कहा जाता है। मानवीय विकास के प्रारंभिक दौर मे भौतिक वस्‍तु अथवा सेवा को क्रय करने वालों के क्रेता कहा जाता था किन्‍तु विकास के क्रम मे इसे उपभोक्‍ता नाम दिया गया जो क्रेता से कहीं अधिक व्‍यापक अर्थ समाहित किए हुए हैं। सामाजिक विकास के साथ ही लोगों की भौतिक आवश्‍यकतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इन आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए क्रमश: बाजारों का विकास हुआ। इन बाजारों से आज हम अपनी आवश्‍यकता की सभी चीजें प्राप्‍त कर सकते हैं। ये चीजें भौतिक भी हो सकती हैं और अभौतिक भी। आज के भौतिकवादी समाज में उपभोक्‍ता बाजारों के विकास के साथ-साथ बाजारीकरण की प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है। प्रारंभिक दौर मे जहां छोटे-छोटे बाजार होते थे और क्रेता तथा विक्रता सामाजिक संबंधों से बंधे होते थे वहीं आज उपभोक्‍ता और क्रेता के मध्‍य किसी तरह का काई वैयक्‍तिक संबंध नही रह गया है। यही कारण है कि आज उपभोक्‍ता के संरक्षण के लिए विभिन्‍न प्रकार के कानूनों का निर्माण किया गया है।

उपभोक्‍ता अर्थात क्रेता के अधिकारों के संरक्षण की परम्‍परा समाज के विकस के साथ ही विकसित हुई है। कौटिल्‍य के प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्‍त्र में भी क्रेता के अधिकारों तथा विक्रेता की लोभी प्रवृत्ति का उल्‍लेख मिलता है। उपभोक्‍ता के संरक्षण से संबंधित आधुनिक आंदोलन जिसे उपभोक्‍ता आंदोलन भी कहा जाता है कि शुरूआत 15 मार्च 1962 को अमेरिका से हुई। इस दिन अमेरिका के राष्‍ट्रपति कैनेडी ने उपभोक्‍ता के अधिकारों को बिल आफ राइटस में सम्‍मिलित करने की घोषणा के साथ साथ उपभोक्‍ता सुरक्षा आयोग के गठन की घोषणा की। इसी उपलक्ष्‍य में प्रति वर्ष 15 मार्च को विश्‍व उपभोक्‍ता दिवस मनाया जाता है। अमेरिका द्वारा की गयी इस पहल से प्रेरित होकर 1973 में ब्रिटेन में भी व्‍यापार संबंधी अधिनियम लागू किया गया। अमेरिका के बिल आफ राइटस में शामिल उपभोक्‍ता अधिकार सूचना, सुरक्षा उपभोक्‍ता शिक्षा का अधिकार तथा स्‍वस्‍थ पर्यावरण का अधिकार शामिल कर इसे और सशक्‍त बनाया गया। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ द्वारा उपभोक्‍ता हितों के संरक्षण के लिए कई दिशा-निर्देश भी जारी किए गए। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के इस प्रयास के बाद अमेरिका, यूरोप तथा विश्‍व के अन्‍य विकसित एवं विकासशील देशों में उपभोक्‍ता के संरक्षण की दिशा मे व्‍यापक रूप से जागरूकता आयी।

इस जागरूकता के अच्‍छे परिणाम शीघ्र ही दिखाई देने लगे। विनिर्माताओं, विपणनकर्ताओं, तथा विक्रेताओं द्वारा उत्‍पाद की मात्रा, गुणवत्‍ता उसके प्रकार, मात्रा एवं मूल्‍य संबंधी सूचनाओं को उत्‍पाद पर अंकित करने की परंपरा का विकास इसी जागरूकता का परिणामहै। प्राय: व्‍यापारीगण मिथ्‍या एवं भ्रामक प्रचार से विरत रहने लगे। मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति पर लगाम लग गयी तथा उत्‍पाद को बेचने के लिए अनैतिक तरीकों का प्रयोग क्रमश: कम होता गया। उपभोक्‍ता संरक्षण से संबंधित इस आंदोलन को नया आयाम आर्थिक उदारीकरण तथा बाजार के वैश्‍वीकरण के बाद मिला। विनिर्माताओं तथा उपभोक्‍ताओं में इस वैश्‍वीकरण का प्रभाव परिलक्षित होने लगा। वस्‍तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में प्रतिस्‍पर्धात्‍मक कमी देखी गयी जो अप्रत्‍यक्षत: उपभोक्‍ता के हितों को संरक्षित करता है।

जहां तक भारत का संबंध है यहां उपभोक्‍ता आंदोलन अभी शैशवावस्‍था में है। 1991 से प्रारंभ आर्थिक उदारीकरण के बाद उपभोक्‍ताओं में कुछ जागरूकता भले आयी है किन्‍तु यह अभी अपर्याप्‍त है। भारत में उपभोक्‍ता आंदोलन का सम्‍यक रूप से विकास न होने के कई कारण हैं। भारत की लगभग 72 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती है। उसकी प्राय: सभी आवश्‍यकताएं स्‍थानीय स्‍तर पर पूरी हो जाती हैं। इसके साथ ही भारत की लगभग 38 प्रतिशत जनता गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करती है तथा ऐसे वर्ग की जनता की प्राथमिकता अपनी भूख शांत करना रहता है। वस्‍तु की गुणवत्ता, मात्रा में कमी इत्‍यादि विषयों के प्रति वह उदासीन ही रहता है। उपभोक्‍ता की जागरूकता के लिए उनका शिक्षित होना अति अनिवार्य है। भारत की लगभग 36 प्रतिशत जनता अभी भी निरक्षर है। अज्ञानता और जागरूकता के अभाव में ऐसी जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं रह पाती। इसका सीधा लाभ व्‍यापारी वर्ग को मिलता है।

हमारे देश में खाद्य पदा‍र्थों में मिलावट, चोरबाजारी, कम तौल, मिथ्‍या प्रचार, भ्रामक विज्ञापन, भ्रामक पैकिंग, तथ्‍यों को छुपाने तथा कीमत में हेर-फेर की प्रवृत्ति के कारण उपभोक्‍ता आंदोलन के गति मिल पा रहा है। देश में नकली वस्‍तुओं और नकली ब्रांडों की भरमार है। औषधि से लेकर आटोपार्ट्स तक शीतल पेय से लेकर साबुन तक देश में नकली ब्रांडो की कमी नहीं है। सच्‍चाई तो यह है कि हम जिस साबुन से नहाते हैं, जिस तेल को लगाते हैं और जिस देशी घी को रोटी मे चुपड़ कर खाते हैं वे सब के सब नकली हो सकते हैं। आज बाजार में उपलब्‍ध हर असली वस्‍तु के साथ-साथ उसकी नकल माजूद है। यह धंधा इतनी चालकी और सावधानी से हो रहा है कि असली वस्‍तु के साथ-साथ उसकी नकल मौजूद है। यह धंधा इतनी चालकी और सावधानी से हो रहा है असली नकली में फर्क करना आम उपभोक्‍ता के बस के बाहर है। साबुन, तेल, क्रीम जैसे उत्‍पादों को लेकर ओआरजी मार्ग के एक सर्वे के परिणाम के अनुसार अब यह बात पुरानी पड़ चुकी है कि नकली ब्रांड का कारोबार सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों मे होता है। आज देश हर हिस्‍से मे और यहां तक कि धनाढय क्षेत्रों के कुलीन बाजारों में भी नकली ब्रांडों की भरमार है। आज बाजार मे पैराशूट तेल की 128, फेयर एंड लवली क्रीम की 113, डाबर आंवला की 34 नकलें बिक रही हैं। इस फर्जीवाडे से कंपनियों और सरकार को जो घाटा हो रहा है वह अरबों में है, किंतु उपभोक्‍ताओं को जो नुकसान हो रहा है वह त्‍वचा रोग, एलर्जी, तथा अन्‍य रसायनजनित बीमारियों के रूप मे सामने आता है जिसका मौद्रिक मूल्‍यांकन संभव ही नहीं है। यह सीधे-सीधे जिंदगी और मौतका मामला बन जाता है।

व्‍यापार संबंधी अनैतिक तथा उपभोक्‍ताओं के शोषण संबंधी क्रियाकलापों पर नियंत्रण करने तथा उपभोक्‍ता अधिकारों के संरक्षण हेतु समय-समय पर नियमों तथा अधिनियमोंका निर्माण सरकार द्वारा किया गया है इस दिशा मे देश में वर्तमान में लागू कुछ महत्‍वपूर्ण अधिनियम निम्‍नलिखित हैं:

मादक द्रव्‍य अधिनियम, 1930; कृषि उपज (श्रेणीकरण और चिन्‍हांकन) अधिनियम (1937; औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940; औषधि नियंत्रण अधिनियम, 1950; बाट तथा माप मानक अधिनियम, 1952; भारतीय मानक संस्‍था (प्रमाण चिन्‍ह) अधिनियम, 1952 खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954; आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955; औषधि और चमत्‍कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञान) अधिनियम, 1954; व्‍यापार तथा व्‍यव वस्‍तु चिन्‍ह अधिनियम, 1958; आवश्‍यक सेवाएं बनाए रख्‍ने का अधिनियम, 1968; एकाधिकार तथा अवरोधक, व्‍यापारिक व्‍यवहार अधिनियम, 1969; बाट तथा मानक (पैकेज मे रखी वस्‍तुएं) अधिनियम, 1977; चोर-बाजारी निवारण तथा आवश्‍यक वस्‍तु प्रदाय बनाए रखना अधिनियम, 1980 तथा उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986।

दिसम्‍बर 1986 में भारत सरकार ने अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, न्‍यूजीलैंड, आस्‍ट्रेलिया आदि देशों में प्रभावी उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियमों एवं व्‍यवस्‍थाओं का गहराई से अध्‍ययन करने के पश्‍चात एक वृहत् उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 बनाया। इस अधिनियम में सन् 1991, 1993 एवं 2002 में संशोधन किए गए, यह अधिनियम उपभोक्‍ता के अधिकारों का संरक्षण एवं संवर्द्धन, उपभोक्‍ता परिषदों की स्‍थापना के लिए व्‍यवस्‍था, उपभोक्‍ता के विवादों एवं उनसे संबंधित मामलों के निपटारे के लिए व्‍वस्‍था, उपभोक्‍ता विवादों का सरलता एवं शीघ्रता से निपटारा कने आदि विभिन्‍न उद्देश्‍यों की पूर्ति के लिए लागू किया गया है।

उपभोक्‍ताओं की शिकायतों के समाधान अथवा उपभोक्‍ता वि‍वादों के निपटारे हेतु उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम में त्रिस्‍तरीय अर्द्ध-न्‍यायिक व्‍यवस्‍था है। इस व्‍यवस्‍था के अनुसार जिला मंचों, राज्‍य आयोगें एवं राष्‍ट्रीय आयोग (1988 में नई दिल्‍ली में स्‍थापित) की स्‍थापना की गई है। यह त्रिस्‍तरीय अर्द्ध न्‍यायिक व्‍यवस्‍था उपभोक्‍ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्‍यावहारिक साबित हो रही है क्‍योंकि इनमें सामान्‍य न्‍यायालयों की भांति वैधानिक औपचारिकताओं यथा सिविल प्रोसीजर कोड तथा क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के प्रावधनों का पालन नहीं करना पड़ता है। इस व्‍यवस्‍था से उपभोक्‍ताओं को त्‍वरित एवं सस्‍ता न्‍याय प्राप्‍त होता है और उनके समय एवं धन की बचत होती है।

उपभोक्‍ता अधिकारों के बेहतर संरक्षण के लिए नया उपभोक्‍ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2002, 15 मार्च, 2003 को, विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस के दिन से प्रभावी किया गया।इसी क्रम में उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1987 में भी संशोधन हुआ और उसे 5 मार्च, 2004 को अधिसूचित किया गया।

अधिनियम के दायरे का विस्‍तार करते हुए नकली सामान व सेवाओं की बिक्री को भी इसके तहत लाया गया है। वादी अथवा प्रतिवादी के निधन के पश्‍चात उसके उत्‍तराधिकारी अब संबंधित वाद को जारी रख सकेंगे। संशोधित अधिनियम के तहत जिला फोरम में 20 लाख रुपए तक के व राज्‍यस्‍तरीय फोरम में 1 करोड़ रुपये तक के मामलों की सुनवाई हो सकती है। राष्‍ट्रीय आयोग में अब 1 करोड़ रुपए से अधि‍क राशि के मामले दर्ज किए जा सकते हैं।

देश में खाद्य अपमिश्रण की रोकथाम के लिए खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम, 1954 त‍था फल उत्‍पाद आदेश, आदेश, 1955 एक अनवार्य कानून के रूप में मौजूद है, किन्‍तु सरकारी मशीनरी की उदासीनता के कारण दोनों कानून निष्‍क्रिय हैं। केंद्र सरकार के अधीन फूड प्रोसेसिंग मंत्रालय के रूप में एक भारी-भारकम विभाग भी है किन्‍तु सदैव सोते रहने वाला यह विभाग तभी जागता है जब कोई बड़ा मामला पकड़ा जाता है। जांच-पड़ताल और परीक्षण के लिए पर्याप्‍त प्रयोगशालाएं भी नहीं हैं। आम नगरिकों में भी जागरूकता का अभाव है। इसके लिए आम नागरिकों को भी जागरूक होना चाहिए। अपमिश्रणके अधिकांश मामले जागरूकता में कमी के कारण संबंधित अधिकारियों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। देश में उपभोक्‍ता अदालतों का गठन तो किया गया है किन्‍तु जागरूकता के अभाव में कुछ ही उपभोक्‍ता उन अदालतों तक पहुंचते हैं। उपभोक्‍ता अदालतों को ऐसे मामलों को निपटाने में गतिशीलता लानी होगी ताकि उपभोक्‍ता कानूनोंका लाभ सभी को मिल सके।

भारत में उपभोक्‍ताओं में जागरूकता की कमी के कारण उपभोक्‍ताओं के संरक्षण संबंधी सभी सरकारी प्रयास निष्‍प्रयोज्‍य साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि हमारे देश में उपभोक्‍ता आंदोलन अन्‍य देशों की अपेक्षा काफी कमजोर है। असंगठित तथा निर्बल उपभोक्‍ता बाजार की शोषणवादी प्रवृत्ति के सामने पूरी तरह लाचार दिखाई देता है। बाजार आधारित कुछ नियंत्रणों को छोड़कर आज बाजार पर उपभोक्‍ता का कोई नियंत्रण नहीं रहा गया है। बाजार के विस्‍तार तथा उपभोक्‍ताओं की संख्‍यामें दिन-प्रतिदिन होती वृद्धि के कारण वस्‍तु की गुणवत्‍ता और उसकी कीमतों पर से उपभाक्‍ताओं का नियंत्रण समाप्‍त होता जा रहा है। विकसित देशों में बाजार पर नियंत्रण बनाए रखने का काम उपभोक्‍ता स्‍वयं करता है और इसके लिए उनके संगठन भी है। इंग्‍लैंड और अमेरिका के उपभोक्‍ता उस मामले में काफी आगे हैं। अमेरिका में राल्‍फ नाडर को उपभोक्‍ता आंदोलन का जन्‍मदाता माना जाता है। अमेरिका में राल्‍फ नाडर के प्रयास से ही आज वहाँ उपभोक्‍ता के पास बेटर बिजनेस ब्‍यूरो (Better Business Bureau) और गुड मैन्‍यूफैक्‍वरिंग प्रैक्‍टिस  (Good Manufacturing Practice) जैसे अस्‍त्र हैं जिससे उसका शोषण न्‍यून सीमा तक ही हो पाता है। इंग्‍लैंड मे तो उपभोक्‍ता संरक्षण के लिए एक अलग मंत्रालय ही है। हमारे देश में स्‍थ‍िति बिल्‍कुल अलग है। यहां उपभोक्‍ता संरक्षण हेतु निम्‍न संगठन हैं, जो केवल बड़े शहरों तक ही सीमित है- ,(1) कंज्‍यूमर गाइडैंस सोसाइटी ऑफ इंडिया (CGSI) शाखायें-हैदराबार, पुणे, कोट्टायम, त्रिचूर, (2) वॉलेटरी आर्गनाइजेशन इन इंटरेस्‍ट ऑफ कंज्‍यूमर ऐजूकेशन (VOICE)- नई दिल्‍ली, (3) सिटिजंस एडवाइस ब्‍यूरो (CAB) दिल्‍ली (4) कंज्‍यूमर एडुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (CERC) अहमदाबाद। अभी इन संगठनों की पहुंच छोटे शहरों तथा अन्‍य अविकसित क्षेत्रों तक नहीं हो पाई है।

देश में बने उपभोक्‍ता संरक्षण से संबंधित सभी कानूनों में उपभोक्‍ता को संबंधित व्‍यापारी के विरुद्ध विधिक कार्यवाही का अधिकार दिया गया है। नियमों के तहत उपभोक्‍ता न केवल नापतौल में हेराफेरी, खराब एवं पुरानी पड़ चुकी वस्‍तुओं की बिक्री, वस्‍तुओं/सेवाओं के लिए अधिक मूल्‍य की वसूली इत्‍यादि के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकता है। अपितु वह असंतोषजनक सेवाओं के विरुद्ध भी अपना रोष, शिकायत के रूप में प्रकट कर सकता है। 1986 के अधिनियम की एक अन्‍य विशेषता यह है कि इसमें उपभोक्‍ता संरक्षण समितियों को भी मान्‍यता दी गयी है और इन्‍हें वाद दायर करने का अधिकार भी दिया गया है। इसके अतिरिक्‍त केंद्र सरकार द्वारा वस्‍तुओं उचित मूल्‍य पर उपभोक्‍ता को मिलती रहें। शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सुपर बाजार, उपभोक्‍ता सहकारी केंद्, उपभोक्‍ता भंडार आदि की स्‍थापना केंद्र तथा राज्‍य सरकारों द्वारा उपभोक्‍ताओं के हितों को ध्‍यान में रखते हुए की गयी है।

इन सबके बावजूद अभी भारतमें उपभोक्‍ता शक्‍ति का विकास नहीं हुआ है। इसका सबसे प्रमुख कारण जागरूकता की कमी है। विकसित देशोंकी भांति हमारे देश में उपभोक्‍ता अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हैं। इसका फायदा सीधे व्‍यापारी को मिलता है। विभिन्‍न सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों का यह दायित्‍व होता है कि वे उपभोक्‍ताओं के जागरूक करें। गैर-सरकारी संगठन यह कार्य अधिक ठीक ढंग से कर सकते हैं। उपभोक्‍ता आंदोलन को सफल बनाने के लिए आवश्‍यक है कि विनिर्माता एवं उपभोक्‍ता के मध्‍य सीधा संबंध स्‍थापित करने का प्रयास किया जाए। उपभोक्‍ता संरक्षण में सहकारिता की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है। सहकारिता के माध्‍यम से उपभोक्‍ता वर्ग संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकता है।

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