मोरारजी देसाई पर निबंध / Essay on Morarji Desai in Hindi Language

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मोरारजी देसाई पर निबंध लिखिए। Write Essay on Morarji Desai in Hindi Language.

मोरारजी देसाई पर निबंध / Essay on Morarji Desai in Hindi Language

भूमिकाकर्मठ गांधीवादी नेता श्री मोरार जी देसाई भारत देश के चौथे प्रधानमंत्री थे। उनका राजनीतिक जीवन अनुशासन, अपराजेय निष्ठा एवं अदम्य साहस की रोमांचक कथा है। देसाई जी के व्यक्तित्व में इन सद्गुणों का जैसा समन्वय प्राप्त होता है वह देश के सभी नेताओं के मध्य उन्हें विशेष स्थान प्रदान करने में सक्षम है। भारत के प्रधानमंत्री के सर्वोच्च पद पर मोरार जी का पहुँचना उनके दीर्घ राजनीतिक जीवन की चरम परिणति है, यद्यपि सत्ता उनका जीवन-लक्ष्य नहीं है बल्कि अपनी नीति एवं कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करने एवं जनता की सेवा करने का एक माध्यम है ।

मोरारजी देसाई पर निबंध / Essay on Morarji Desai in Hindi Language

जीवन परिचय 

श्री मोरारजी भाई का जन्म 29 फरवरी, 1896 ई० को गुजरात से वुल्सर नामक स्थान के निकट भदेली में हुआ। उनके पिता रणछोड़जी देसाई एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य करते थे। श्री मोरारजी भाई अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके विवाह के 3 दिन पूर्व उनके पिता ने आत्म-हत्या कर ली परन्तु उसके बाद भी उन्हें विवाह में सम्मिलित होना पड़ा। 15 वर्ष की अवस्था में उनके कन्धों पर नववधू, वृद्ध दादी, 3 भाइयों एवं 4 बहनों का भार आ पड़ा। जिस समय मोरारजी का विवाह हुआ उस समय उनकी पत्नी की आयु केवल मात्र 11 वर्ष की थी।

हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मोरार जी भाई ने विल्सन कालेज में प्रवेश लिया जहाँ उन्हें भावनगर के महाराजा द्वारा दी गई छात्र-वृत्ति मिलती थी। मोरारजी निःशुल्क छात्रावास में रहते थे। स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के एक वर्ष बाद श्री मोरार जी देसाई पी० सी० एस० हो गये और 1918 ई० में डिप्टी कलेक्टर बनाये गये । कालान्तर में गांधी जी के प्रभाव में आकर उन्होंने 1930 ई० में सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया तथा राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। सर्वप्रथम वह गुजरात प्रदेश के कांग्रेस सदस्य की हैसियत से 'कर न दो', आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार किये गये । स्वतन्त्रता संग्राम में मोरारजी ने खुलकर भाग लिया और अपना पूरा जीवन मातृभूमि की सेवा में लगा दिया।

गांधी-इरविन समझौते के पश्चात् मोरारजी गुजरात प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री बनाये गये । कालान्तर में श्री खेर मन्त्रिमंडल में सम्मिलित हुए । इस स्थिति में उन्होंने भूमि-सुधार के कार्य में महान योगदान दिया एवं न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग कराया। 1952 ई० में श्री खेर के अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् मोरार जी भाई बम्बई प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने । 3 वर्ष पश्चात् मुख्य मन्त्री के पद से त्याग-पत्र देने के बाद वह केन्द्रीय सरकार में सम्मिलित हुए। श्री देसाई को तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आरम्भ में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री बनाया। टी० टी० कृष्णमचारी के त्याग-पत्र के पश्चात् श्री देसाई वित्त मंत्री बनाये गये। 1963 ई० में कामराज योजना के अन्तर्गत मोरारजी भाई ने भी मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात् वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने परन्तु उन्हें सफलता न मिली। 

1965 ई० के लाल बहादुरशास्त्री के मन्त्रि-मंडल में वह 'प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष बनाये गये। श्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद श्री देसाई ने पुनः प्रधान मंत्री बनने का असफल प्रयास किया परन्तु 1967 ई० में उन्हें उप-प्रधानमन्त्री बनाया गया। 1969 ई० में कांग्रेस में विघटन के समय वह संगठन कांग्रेस के साथ रहे और तब से निरन्तर संगठन कांग्रेस में ही कार्य करते रहे। 1975 ई० में श्री मोरार जी देसाई ने गुजरात में विधान सभा को भंग करने एवं पुनः चुनाव कराने के हेतु अनशन किया जिसमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई। देश में आपातकालीन स्थिति की घोषणा के बाद मोरार जी भाई को तुरन्त गिरफ्तार कर लिया गया ।

मोरार जी का व्यक्तित्व एवं चरित्र

मोरार जी भाई एक अनूठे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति हैं। उनका जीवन 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली कहावत चरितार्थ करता है। वह गांधी जी के विचारों के दृढ़ अनुयायी हैं । गांधी जी का प्रादुर्भाव इस देश की राजनीति को शुद्ध करने एवं धर्म-परायण बनाने हेतु हुआ था। गांधी जी सिद्धान्त की पवित्रता पर बल देते थे। मोरार जी भाई ने अपने जीवन में गांधी जी के उन सिद्धान्तों को पूरी तरह से उतारा है। अपने सम्पूर्ण जीवन में जब वे सरकारी नौकर थे, जब स्वतन्त्रता संग्राम में रत थे, बम्बई प्रदेश के मंत्री अथवा मुख्य मंत्री थे, केन्द्रीय सरकार में मंत्री थे, तो उन्होंने गाँधी जी के इन सिद्धान्तों को पूरी तरह से अमल में लाने का प्रयास किया। श्री मोरार जो भाई के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये। कभी वह अत्यन्त शक्तिशाली बने तो कभी सत्ता उनसे पूरी तरह से बिछुड़ गई, परन्तु श्री मोरार जी भाई ने उसकी कभी भी चिन्ता नहीं की। वह कभी भी उत्तरदायित्व से भागे नहीं परन्तु सत्ता के पीछे कभी दौड़े नहीं । मोरार जी भाई अपने विरोधियों और अपने से मतभेद रखने वालों के प्रति सदैव आदर का भाव रखते हैं। उनका समस्त जीवन गीता के अनासक्ति योग पर एक भाष्य परिलक्षित होता है। वह सदैव अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाले व्यक्ति हैं । जो बात उन्हें पसन्द नहीं है, उसे स्पष्ट रूप से कह देने के आदी हैं । जब नए बम्बई प्रदेश का गठन हुआ तो मोरार जी भाई ने उसका मुख्य मंत्री पद ग्रहण करना केवल इसलिये स्वीकार किया कि वहाँ उनका एक भी विरोधी न हों। उस समय मोरार जी भाई के एक मात्र प्रतिद्वन्दी श्री हीरे थे जो मोरारजी भाई के पक्ष में बैठ जाने को तैयार थे, यदि मोरार जी भाई उन्हें अपने मंत्रि-मंडल में सम्मिलित करने का पूर्व संकेत देने को तैयार होते, परन्तु मोरारजी भाई ने इसे प्रलोभन' समझा और मैदान से हट गये तथा मुख्य मंत्री पद के हेतु श्री यशवन्त राव बलवन्त राव चह्वाण का समर्थन किया। 

श्री मोरार जी भाई भाषा के आधार पर प्रथक गुजरात और महाराष्ट्र राज्य बनाने के विरोधी थे। अपने इस विरोध को कभी उन्होंने छिपाया नहीं । परिणाम यह हुआ कि वृहद् महाराष्ट्र समिति तथा वृहद् गुजरात समिति दोनों का ही कोप-भाजन श्री मोरार जी भाई को बनना पड़ा । परन्तु मोरार जी भाई अपने विचारों पर दृढ़ रहे और उन्होंने अपनी लोकप्रियता को खतरे में डालकर किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया।

मोरार जी भाई को छल-कपट और असत्य की राजनीति से घृणा थी और बड़े से बड़े पद को भी असत्य के मार्ग से प्राप्त करना वह अनुचित मानते थे। अपने विरुद्ध फैसला होने पर भी न तो उनके मन में कभी क्षोभ हुआ और न कभी आक्रोश । गाँधी जी के प्रति उनके मन में सदैव असीम श्रद्धा रही परन्तु गाँधी जी के विचारों से भी मतभेद प्रकट करने में उन्होंने संकोच नहीं किया। 1942 ई० के स्वतंत्रता आन्दोलन के समय में उनका गाँधी जी के विचारों से मतभेद था। उन्होंने अपने विचार अत्यन्त स्पष्ट रूप में गांधी जी के सम्मुख रखे । परन्तु इस सम्बन्ध में जब गाँधी जी का निर्णय हो गया तो उन्होंने पूरी शक्ति एवं तन्मयता से उसका पालन किया।

मोरार जी भाई एक ऐसे व्यक्ति है जिनमें विषम परिस्थितियों में और सम स्थिति में कभी कोई अन्तर नहीं था। 1963 ई० में जब कामराज योजना के अन्तर्गत वह मन्त्रीपरिषद से हट गए तो न तो उनके मन में कोई क्षोभ था और न कोई विवाद । नेहरू मंत्रि-मंडल के विरुद्ध जब डॉ० लोहिया ने अविश्वास का प्रस्ताव रखा तो मोरार जी भाई ने ही सरकारी पक्ष को प्रस्तुत करने का भार अपने ऊपर लिया एवं अत्यन्त दृढ़ता एवं योग्यता के साथ उन्होंने सरकारी पक्ष प्रस्तुत किया। यह उनके चारित्रिक महत्ता को प्रकट करता है।

मोरार जी भाई की लोकतांत्रिक पद्धति में गहन आस्थाथी और वह अत्यन्त उच्च-कोटि के संसदीय मामलों के ज्ञाता थे। नेहरू मंत्रि-मंडल में कामराज योजना के अन्तर्गत जब वे अपने पद से हटे थे तो इंगलैंड के पत्रों में यह टिप्पणी छपी थी कि कैसी विडम्बना है कि भारतीय संसद का सबसे योग्यतम व्यक्ति जो मन्त्रि-मंडल में नहीं था, सरकारी नीतियों का सबसे बड़ा समर्थक है।

मोरार जी भाई ने अपने सिद्धान्तों से समझौता करना सीखा ही नहीं। सिद्धान्त के नाम पर वह बड़ी कुरबानी देने के लिये सदैव तैयार रहे हैं। श्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद जब प्रधानमंत्री के पद के लिये श्रीमती इन्दिरा गाँधी और श्री मोरार जी भाई में चुनाव हुआ तो पराजित होने के बाद भी मोरार जी भाई के चेहरे पर स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, समता और तुष्टि को भावना दिखलाई पड़ी। वह राष्ट्र-हित में उप प्रधानमन्त्री बनने को भी तैयार हो गये। 1969 ई० में जब राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर काँग्रेस का विभाजन हुआ तो मोरार जी भाई अपने सिद्धान्त पर दृढ़ रहे । सत्ता के बाहर रह कर भी उन्होंने अपनी सिद्धान्तवादिता को नहीं छोड़ा और गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित संगठन काँग्रेस की नीतियों एवं कार्यक्रम का समर्थन करते रहे।

मोरार जी भाई के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने क्षणिक लोकप्रियता के हेतु कभी भी अपने विचारों को प्रकट करने में हिचकिचाहट नहीं दिखलाई । सोने पर नियंत्रण का निश्चय पंडित नेहरू की सरकार का था परन्तु उस निर्णय के विरुद्ध सारा 'आक्रोश तथा विरोध को मोरार जी भाई ने अपने ऊपर ले लिया। मोरार जी भाई अत्यन्त मिताहारी, और अनुशासन-प्रेमी व्यक्ति हैं। यही कारण है कि 81 वर्ष की अवस्था में भी उनमें युवकों जैसी स्फूर्ति और कार्य करने की क्षमता थी। वह भारतीय संस्कृति के एक सुन्दर पुष्प हैं और उनका जीवन उनके आदर्शों का सन्देश प्रसारित करता है।

मोरार जी भाई का हिन्दी प्रेम

हिन्दी भाषा से मोरार जी भाई को असीमा प्रेम था। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कराने में मोरार जी भाई का बहुत बड़ा योगदान है। गुजरात विद्यापीठ में हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनाने कत साहसपूर्ण कार्यक्रम मोरार जी भाई द्वारा ही उठाया गया । मोरार जी भाई ने समस्म देश में अपने भाषणों में मुख्यतः हिन्दी को ही अपने विचारों के प्रसार का माध्यम बनाया । उनका यह दृढ़ वश्विास था कि देश की विभिन्न भाषाओं की प्रगति होनी चाहिये परन्तु हिन्दी ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिये । विदेशी भाषा दासता की परिचायक है और उससे मुक्ति प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है।

मोरार जी भाई और नव-भारत का निर्माण

नव-भारत के निर्माण में मोरार जी भाई का महान योगदान रहा है । गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण मोरार जी भाई का यह दृढ़ मत था कि भारत की प्रगति भारतीय ग्रामों की प्रगति पर निर्भर है। कुटीर उद्योगों के विकास में उनकी गहन आस्था है। मोरार जी भाई अत्यन्त अनुशासन प्रेमी थे और अनुशासन को देश की प्रगति में सबसे बड़ा साधक मानते हैं परन्तु उनका विश्वास आत्मानुशासन में है, बाह्य अनुशासन में नहीं । नवीन भारत के निर्माण में वह सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक मानते थे। समय-समय पर मोरार जी भाई के विरुद्ध 'पूँजीपतियों का दलाल' आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है परन्तु मोरार जी भाई इससे कभी भी विचलित नहीं हुये । उनका विचार है कि श्रम और पूंजी के समुचित उपयोग द्वारा ही देश का निर्माण सम्भव है ।

अहिंसा में उनकी गहन आस्था है और गाँधीवादी उपायों से लोकतंत्रीय शासन में प्रगति को ही उन्होंने अपने जीवन का मूल मन्त्र स्वीकार किया। उनका विचार था कि जब तक अभाव और भय रहेगा, समाज का समुचित विकास नहीं हो सकता एवं गाँधी जी का सपना पूरा नहीं होगा। मोरार जी भाई उस स्वप्न को साकार के लिये कृत-संकल्प थे।

उपसंहार

भारतवर्ष में आपातकालीन स्थिति की घोषणा के बाद जो अधिनायकवादी प्रवृत्ति पनपी थी, मोरार जी भाई के प्रधान मंत्री बनने के बाद वह समाप्त हो गई है। मोरार जी भाई के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने गुजरात की एक सभा में कहा था कि मुझे तो प्रथम दर्शन से ही उनसे प्यार हो गया है । मोरार जी भाई प्रधानमन्त्री के पद को काँटों का ताज मानते थे परन्तु उन्हें उस काँटे के ताज को पहनना आता था। प्रधानमंत्री के पद पर रहकर उन्होंने स्वाभाविक अडिग निष्ठा से देश और देशवासियों की सेवा की .

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