Monday, 16 May 2022

गिद्ध पक्षी पर निबंध - Essay on Vulture Bird in Hindi

गिद्ध पक्षी पर निबंध - Essay on Vulture Bird in Hindi

Essay on Vulture Bird in Hindi : इस लेख में गिद्ध पक्षी पर निबंध अलग-अलग शब्द सीमा जैसे 100 , 200, 300 और 500 शब्द में लिखा गया है। जिसे पढ़कर आप गिद्ध पक्षी पर निबंध लिखना सीख जायेंगे। 
गिद्ध पक्षी पर निबंध - Essay on Vulture Bird in Hindi

गिद्ध पक्षी पर निबंध (100 शब्द) for Class 1 and 2

गिद्ध शिकारी पक्षियों के अंतर्गत आने वाले मुर्दाखोर पक्षी हैं। ये कत्थई और काले रंग के भारी कद के पक्षी हैं। गिद्ध की दृष्टि बहुत तेज होती है। अन्य शिकारी पक्षियों की तरह गिद्ध की चोंच भी टेढ़ी और मजबूत होती है, लेकिन इनके पंजे और नाखून उनके जैसे तेज और मजबूत नहीं होते। गिद्ध की उम्र 50 से 60 वर्ष तक होती है। गिद्ध पैनी नजर का पक्षी है। गिद्ध ऊंचे पेड़ों पर घोंसला बनाते हैं और अंडे देते हैं। भारत में गिद्धों की कुल नौ प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से चार प्रजाति अब विलुप्ति की कगार पर हैं।

गिद्ध पक्षी पर निबंध (200 शब्द) for Class 3 and 4

गिद्ध एक मुर्दाखोर पक्षी है, वे शिकार नहीं करते। गिद्ध प्रकृति में विकसित एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राणी है। गिद्ध की प्रमुख विशेषता उसकी पर्यावरण को स्वच्छ रखने की कुदरती कला है। गिद्ध एक मुर्दाखोर पक्षी है जो जंगलों में मृत जानवरों के अवशेषों और सड़े गले मांस को जल्दी से खा जाता है जिस कारण मृत अवशेषों की दुर्गन्ध जंगल में नहीं फैलने पाती और इस प्रकार पूरा वातावरण एवं इकोसिस्टम स्वच्छ बना रहता है। इसीलिए गिद्धों को 'प्राकृतिक सफाईकर्मी' की संज्ञा दी गई है 

भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं। गिद्ध अलग-अलग प्रजातियों के होते हैं। इनका औसतन वजन 3.5 - 7.5 किलोग्राम के बीच होता है। गिद्ध की लंबाई 75 से 93 सेमी और पंखों का फैलाव 6.3 से 8.5 फीट तक होता है।  गिद्ध 7,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और एक बार में 100 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी बहुत आसानी से कवर कर सकते हैं। 

गिद्ध हमारे पर्यावरण के संतुलन के लिए एक आवश्यक पक्षी है। आज से कुछ साल पहले गिद्ध भारत में प्रचुर मात्रा में पायी जाती थी। गिद्धों की संख्या सन 1980 तक भारत में चार करोड़ से भी ऊपर थी, परन्तु आज गिद्ध विलुप्तप्राय की सूची में हैं।

गिद्ध पक्षी पर निबंध (300 शब्द) for Class 5 and 6

गिद्ध मुर्दाखोर पक्षी होते हैं। जिसे अंग्रेजी में वल्चर कहा जाता है। गिद्ध पर्यावरण को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये बड़े पशुओं के शवों को फटाफट चट कर जाते हैं। इस प्रकार गिद्ध सड़न से पैदा होने वाले विषाणुओं को फैलने से रोकते हैं। यह ऊँची उड़ान भरकर इंसानी आबादी के नज़दीक या जंगलों में मुर्दा पशु को ढूंढ लेते हैं और उनका आहार करते हैं। गिद्ध की आंखें बहुत तेज होती हैं। और काफ़ी ऊँचाई से यह अपना आहार ढूंढ लेते हैं।

दुनिया भर में गिद्ध की कुल 22 प्रजातियां पाई जाती हैं। अलग-अलग प्रजाति के गिद्ध अलग-अलग तरह तापमान और जलवायु में पैदा होते हैं। गिद्ध की उम्र 50 से 60 वर्ष तक होती है। ये झुंडों में रहने वाले पक्षी हैं। गिद्ध का औसतन वजन 3.5 - 7.5 किलोग्राम के बीच होता है जबकि इनकी लंबाई 75 से 93 सेमी और पंखों का फैलाव 6.3 से 8.5 फीट तक होता है। गिद्ध 7,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और एक बार में 100 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी बहुत आसानी से तय कर सकते हैं। 

गिद्ध पक्षी की प्रजाति को दो भागों में बाँटे जा सकते हैं। पहले भाग में अमरीका के कॉण्डर (Condor), किंग वल्चर, कैलिफोर्नियन गिद्ध (Californian Vulture), टर्की बज़र्ड और अमरीकी काले गिद्ध होते हैं और दूसरे भाग में अफ्रीका और एशिया के राजगिद्ध (King Vulture), काला गिद्ध, सफ़ेद पीठ वाला गिद्ध (White backed Vulture), बड़ा गिद्ध (Griffon Vulture) और मेहतर गिद्ध (Scavenger Vulture) मुख्य हैं।

गिद्ध का वर्णन भारत के पौराणिक महाकाव्य रामायण में भी किया गया है जहां रावण की चंगुल से सीता को बचाने के दौरान गिद्धों के राजा जटायु ने अपनी जान गंवा दी थी। भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं। 1980 तक भारत में द्धों की संख्या चार करोड़ से भी ऊपर थी, परन्तु आज गिद्ध विलुप्तप्राय की सूची में हैं।

गिद्ध पक्षी पर निबंध (500 शब्द) for Class 7 and 8

गिद्ध विशाल शिकारी पक्षी हैं। अन्य शिकारी पक्षियों के विपरीत, गिद्ध आमतौर पर जीवित जानवरों का शिकार नहीं करते हैं। वे ज्यादातर मरे हुए जानवरों का मांस खाते हैं। जब एक गिद्ध को मरा हुआ या मरता हुआ जानवर मिलता है, तो दूसरे गिद्ध मीलों दूर से उड़कर भोजन करने आते हैं।

गिद्ध सभी उड़ने वाले पक्षियों में सबसे बड़े पक्षियों में से एक हैं। गिद्ध घंटों तक उड़ सकते हैं, अपने लंबे, चौड़े पंखों के साथ इनायत से उड़ सकते हैं। उनके पंख आमतौर पर भूरे, काले या सफेद होते हैं। हालांकि, अधिकांश गिद्धों के सिर और गर्दन पर पंख नहीं होते हैं। गिद्धों की दृष्टि उत्कृष्ट होती है। वह रोज गश्त पर निकलते हैं। वह आसमान में उड़ते हुए देखते हैं कि धरती पर कहां कोई शव पड़ा हुआ है, कोई मांस जो सड़ रहा है, जिसमें वायरस पैदा होने वाले हैं। दिखाई देते ही वह तुरंत धरती पर उतरते हैं और फटाफट चट कर जाते हैं।

दुनिया भर में गिद्ध की कुल 22 प्रजातियां पाई जाती हैं। अलग-अलग प्रजाति के गिद्ध अलग-अलग तरह तापमान और जलवायु में पैदा होते हैं और अपने इलाके को महामारी से बचाए रखते हैं। गिद्ध पक्षी दो भागों में बाँटे जा सकते हैं। पहले भाग में अमरीका के कॉण्डर, किंग वल्चर, कैलिफोर्नियन गिद्ध, टर्की बज़र्ड और अमरीकी काले गिद्ध होते हैं और दूसरे भाग में अफ्रीका और एशिया के राजगिद्ध, काला गिद्ध, चमर गिद्ध, ग्रिफिन गिद्ध और मेहतर गिद्ध मुख्य हैं। 

प्राणी विज्ञान के विशेषज्ञ बताते हैं कि पृथ्वी पर पारिस्थितिकीय संतुलन में गिद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका है। पूरी पृथ्वी पर केवल गिद्ध ही हैं जो बदबूदार मांस और गंदगी को फटाफट चट कर जाते हैं। यदि बदबूदार माँस को तत्काल नष्ट नहीं किया गया तो उसमें कई तरह के खतरनाक वायरस जन्म ले सकते हैं। इन वायरस के कारण दुनिया में महामारी फैल सकती है। सरल शब्दों में कहें तो गिद्ध वो जीव है जो डॉक्टरों से ज्यादा अच्छा काम करता है। डॉक्टर तो महामारी से पीड़ित लोगों का इलाज मात्र करते हैं परंतु गिद्ध महामारी को पनपने से पहले ही रोक देता है।

ये किसी ऊँचे पेड़ पर अपना भद्दा सा घोंसला बनाते हैं, जिसमें मादा एक या दो सफेद अंडे देती है। यह जाति आज से कुछ साल पहले अपने पूरे क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पायी जाती थी। १९९० के दशक में इस जाति का ९७% से ९९% पतन हो गया है। इसका मूलतः कारण पशु दवाई डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) है जो कि पशुओं के जोड़ों के दर्द को मिटाने में मदद करती है। जब यह दवाई खाया हुआ पशु मर जाता है और उसको मरने से थोड़ा पहले यह दवाई दी गई होती है और उसको भारतीय गिद्ध खाता है तो उसके गुर्दे बंद हो जाते हैं और वह मर जाता है। अब नई दवाई मॅलॉक्सिकॅम आ गई है और यह हमारे गिद्धों के लिये हानिकारक भी नहीं हैं। गिद्धों की संख्या सन 1980 तक भारत में चार करोड़ से भी ऊपर थी लेकिन 2017 तक आते-आते इनकी संख्या मात्र 19 हज़ार रह गई। जब इस दवाई का उत्पादन बढ़ जायेगा तो सारे पशु-पालक इसका इस्तेमाल करेंगे और शायद हमारे गिद्ध  विलुप्त होने से बच सकें। 

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