Saturday, 28 March 2020

विज्ञान और विश्व शांति पर हिंदी निबंध Science for Peace Essay In Hindi

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विज्ञान और विश्व शांति पर हिंदी निबंध Science for Peace Essay In Hindi

प्रायः लोगों को कहते सुना जा सकता है कि जब से विज्ञान के युग का आरम्भ हुआ है, तभी से मानव-जीवन में आशान्ति का संचार भी होने लगा है। पहले का जीवन अच्छा था। सभी लोग और देश अपनी-अपनी सीमा में रहा करते थे । जीवन जीने के जो स्थानीय साधन और वस्तुएं उपलब्ध थीं, उनके सहारे ही शान्ति से जीवन कट जाता था। सुख-सुविधाएँ चाहे उतनी नहीं हुआ करती थीं, पर आज की तरह हर समय अशान्त और तनाव में भीनहीं रहना पड़ता था। जीवन शान्त था और शान्ति हर मूल्य पर अच्छी एवं उचित हुआ करती है। शान्ति हर मूल्य पर अच्छी होती है, इस बात पर न तो तब किसी के मन-मस्तिष्क में कोई प्रश्न या विरोध था; न आज ही है ! आज जिस वैज्ञानिक क्रान्ति और प्रगतियों को सब प्रकार की अशान्तियों की जननी और कारण माना जाने लगा है, सत्य तो यह है कि इसका आरम्भ भी मानव-जीवन और समाज में सुख-शान्ति बनाये रखने की इच्छा सेही हआ था। आज भी वास्तव में विज्ञान का उद्देश्य एवं प्रयोजन मानव-समाज में शान्ति बनाये रखना ही है।
विज्ञान ने मानव-सभ्यता को जो तरह-तरह के साधन, उपकरण प्रदान किये हैं, उनके बल पर आज अलग-अलग देशों, जातियों, राष्ट्रों, सभ्यता-संस्कृतियों को मानने वाले लोगएक-दूसरे के करीब आ सके हैं। करीब आकर उन्हें एक-दूसरे को देखने, सुनने, विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर मिल सका है। एक-दूसरे की समस्याएँ और आवश्यकताएँ भी समीप आकर ही सब लोग और देश जान-समझ सके हैं। परिणामस्वरूप तरह-तरह के आदान-प्रदान शुरू हो गए हैं। एक-दूसरे की ज़रूरतें पूरी करने के लिए सांझे या अकेले सहायता-कार्य शुरू हो सके हैं। ऐसा सब होने से निश्चय ही विश्व शान्ति की भावना को बल मिला है, उसके क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। जब सभी के हित साँझे या एक हो जाया करते हैं, तब स्वभावतः आक्रमण-प्रत्याक्रमण का भाव और कार्य समाप्त हो जाता है। यह समाप्ति विश्व में शान्ति की पहली शर्त कही जा सकती है, जिसे काफी हद तक विज्ञान की उपलब्धियों ने पूरा किया है।
गरीबी और अभावों को मानव-जीवन के लिए अभिशाप, सब प्रकार के लड़ाई-झगड़ों और उनके कारण अशान्ति की जड़ माना जाता है। भूतकाल में अपनी गरीबी और अभावों को दूर करने के लिए भी एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करता रहा है। ऐसा करके वे देश अपनी ग़रीबी और अभाव तो मिटा सके या नहीं, कहा नहीं जा सकता,पर खुद अशान्त होकर दूसरों को अंशान्त बना गये, यह बात एकदम सत्य और स्पष्ट है। वैज्ञानिक क्रान्ति के बाद आज ऐसे साधन प्राप्त हो गये हैं कि जिनके द्वारा मनुष्य की गरीबी और अभावों से संघर्ष करके, उन पर आसानी से या थोड़े-से परिश्रम से ही विजय पायी जा सकती है। इस प्रकार यहाँ भी कहा जा सकता है कि विज्ञान ने अपनी खोजों और आविष्कारों के द्वारा विश्व-शान्ति की रक्षा तो की ही है, हर प्रकार से उसे बढ़ावा भी दिया है।
आज विश्व के किसी भी कोने में यदि कोई अप्रिय घटना घटती है, तो कुछ ही क्षणों में सारे संसार को उसका पता चल जाता है। पता चलने पर तत्काल उसे रोकने या उसके कारणों को दूर करने की कोशिशें सारे संसार में एक साथ शुरू हो जाया करती है। फलस्वरूप उस अप्रिय घटना के जो सम्भावित दुष्परिणाम हो सकते है, उनके आने की नौबत नहीं होती। अशान्ति के जो बादल कुछ ही क्षणों में छाकर सबके डर का कारण बन गये होते हैं, विश्व-नेताओं के माध्यम से विश्व-जनमत का दबाव पड़ते ही वे छुट जाते हैं। अशान्ति और विनाश की बौछार पड़ने से पहले ही ठण्डी हवा चलकर सबको सुख-शान्तिका सन्देश दे जाती है। स्पष्ट है कि वेज्ञानिक साधनों के अभाव में संसार को इस अप्रियघटना का न तो पता चल पाता, न उसके कारणों को दर करके शान्ति की रक्षा ही संभवहो पाती। इस प्रकार वास्तव में आज विज्ञान विश्व शान्ति की रक्षा और विस्तार कर पानेमें सहायक हो रहा है!
विज्ञान का एक दूसरा पहलू भी है। वह है विनाश का मारक सन्देश देने वाला, शान्ति भंग कर अशान्ति फैलाने वाला। अर्थात् विज्ञान ने जिन परमाणु, हाइड्रोजन, कोबॉल्ट तथा जैविक बर्मो, अन्य शस्त्रास्त्रों, भयानक गैसों का निर्माण किया है. उनके रहते मानव-सभ्यताके विनाश और विश्व-शान्ति के भंग होने का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया है। इस प्रकार के विचार प्रकट करते हुए किसी भी व्यक्ति को देखा-सुना जा सकता है ! ऊपरी दृष्टि सेदेखने पर इस प्रकार का भय ठीक भी लगता है। फिर विश्व में कई स्थानों पर इस प्रकारके मारक शस्त्रास्त्रों का दुरुपयोग हो भी चुका है। ध्यान रहे इस प्रकार के दुरुपयोगइक्का-दुक्का ही हुए हैं, सामूहिक रूप और स्तर पर नहीं। प्रश्न उठता है कि इसका क्याकारण है ? गम्भीरता से विचार करके कहा जा सकता है कि इसका कारण 'डर' है। दूसरोंके नाश का उतना नहीं, जितना कि अपने नाश का डर । यह डर भी वास्तव में विश्व-शान्तिबनाये रखने का एक बड़ा प्रेरणा-स्रोत है। जिस दिन यह डर समाप्त हो गया, विश्व-शान्तिकी बात तो जाने दीजिए, उस दिन सारी धरती और उस पर रहने वाली मनुष्यता का नामतक समाप्त हो जायेगा ! परन्तु नहीं, मनुष्य समझदार और बुद्धिमान तो है ही, डरपोक भीबहुत है। सन्त कबीर ने डर को 'करनी' और 'परम गुरु' कहा है। ‘डरते रहे सो ऊबरे’माना है। सो खुद अपने विनाश का जो डर विज्ञान ने मनुष्य के मन-मस्तिष्क में बिटदिया है, वास्तव में वह भी विश्व-शान्ति के भाव-विस्तार का एक बहुत बड़ा कारण है
हमने देखा है कि हमारे सामने शीत-युद्ध के जो खेमे बने, उनमें से कुछ उखड़ गयेहैं, बाकी उखड़ रहे हैं। इसका कारण यही है कि विज्ञान की उपलब्धियों ने मानव-समाजको अधिक विचारवान, अधिक सहनशील और अधिक व्यापक बना दिया है। आज का जागरूक मनुष्य अपने हित में सबका हित, संबके हित में अपना हित देखने और समझने लगा है। इसी कारण शीत-युद्धों और दूसरे सभी प्रकार के युद्धों की दलदल में फंसे उसके कदम, अब वहाँ से बाहर निकल कर शान्ति की कठिन और लम्बी राह पर चलने लगे हैं। धर्म, जातिवाद, कट्टर राष्ट्रवाद को कभी इस राह में बहुत बड़ी बाधा माना जाता था! परन्तु अब वैज्ञानिक दृष्टि का विकास होते जाने के कारण ये सारी बाधाएँ अपने-आप ही दूर होती जा रही हैं। सहज स्वाभाविक मानवता की भावना का निरन्तर, अधिक-से-अधिक विकास और विस्तार हो रहा है। संकुचित सीमाओं के बन्धन टूटते जा रहे हैं। इस सब को विश्व-शान्ति की रक्षा के लिए सभी प्रकार गे शुभ एवं आशाप्रद लक्षण कहा और स्वीकार किया जा सकता है।

मनुष्य एक विचारवान, आशावादी और संघर्षशील प्राणी है। स्वभाव से वह हमेशा शान्तिपूर्वक रहना चाहता है। वह चाहता है कि जीने के लिए जो आवश्यक है, उसके परिश्रम और योग्यता के बदले में वह सब उचित मात्रा में उसे और सबको मिलता रहे।विज्ञान का मूल उद्देश्य भी वास्तव में यही है। वह भी सबकी उचित आवश्यकताएं पूरी करने, सबके लिए उचित सुख-सुविधाएँ जुटाने की दिशा में ही प्रयत्नशील है। यदि हम उचित प्रयोग करके अपने कार्यों से विज्ञान और उसके साधनों की सहायता करते हैं, तो कोई कारण नहीं कि विश्व-शान्ति की रक्षा न हो सके। हम मनुष्य हैं। हमारी तरह दूसरों को भी उचित सुविधाएँ पाकर जीने का अधिकार है। ऐसा सोच और करके हम भी विश्व-शान्ति बनाये रखने में विज्ञान की उचित और वास्तविक सहायता कर सकते हैं।

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