Friday, 20 September 2019

अस्मिताओं का संघर्ष पाठ का सारांश - डॉ. श्यामचरण दुबे

अस्मिताओं का संघर्ष पाठ का सारांश : अस्मिताओं का संघर्ष डॉ. श्यामचरण दुबे (Shyama Charan Dubey)द्वारा लिखा गया एक निबंध है।

    मित्रों इस लेख के माध्यम से अस्मिताओं का संघर्ष निबंध का सारांश तथा पाठ के प्रश्न उत्तर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। आशा है यह लेख हमारे सभी पाठकों के लिए को पसंद आएगा।

    अस्मिताओं का संघर्ष पाठ का सारांश - डॉ. श्यामचरण दुबे 

    जातीय भावना समाज में सदियों से चली आ रही है। पिछले कुछ दशकों में हमें इसका एक नया उभार देखने को मिलता है। अस्तित्व की आवश्यकताओं ने यायावर परिवारों को दल बनाकर रहने की प्रेरणा दी। लेकिन कुछ समय के उपरांत ये दल भी जीवन की चुनौतियों का सामना करने में अक्षम हो गए। इससे अधिक शक्तिशाली संघटना के रूप में जन अथवा गण उभरकर आए। जातीय गर्व की भावना के कारण इन जन गणों में आपस में संघर्ष होना आम बात हो गई तो एक बड़े सामाजिक गठन की जरूरत महसूस हुई। यह बड़ी सामाजिक इकाई राष्ट्र कहलाई। इसकी विशेषता यह थी कि इसका अंग रहते हुए भी कोई छोटी अस्मिता अपनी पहचान बनाए रख सकती थी। राष्ट्रीयता की भावना धीरे-धीरे प्रबल रूप लेती गई। राष्ट्रीय अस्मिताएँ आपस में अकसर टकराने लगीं। आज राष्ट्र के भीतर भी अनेक सूक्ष्म, लघु, या उप-राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति के रूप में जातीय भावनाओं का विस्फोट होने लगा।
    समान प्रजातीय उद्गम, लंबी अवधि के समान ऐतिहासिक अनुभव, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं जो दो या अधिक मिलकर जातीय भावना के आधार को दृढ़ता देते हैं। दल और जन गण की मानसिकता को किसी न किसी रूप में हम आज भी देख सकते हैं। अपनी स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता जातीयता के प्रमुख आग्रह हैं।
    अस्मिता की लड़ाई कई स्तरों पर लड़ी जा सकती है। संवैधानिक या न्यायिक स्तर पर भी वह लड़ी जा सकती है और वह आतंकवाद और अघोषित युद्ध का रूप भी ले सकती है। उदाहरणार्थ कनाडा के क्यूवेक क्षेत्र को लिया जा सकता है। वहाँ पर पिछले काफी सालों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। क्यूवेकवासियों की माँगों को पूरा करने के लिए संविधान में संशोधन की व्यवस्था की जा रही है। स्विट्जरलैंड में 23 कैंटन हैं। उनकी अपनी समस्याएँ हैं। क्षेत्रीय विशेषज्ञता के आधार पर वहाँ लगभग सब समस्याएँ हल कर ली गई हैं। इसी तरह बेल्जियम में भी भाषाई और सांस्कृतिक समस्याएँ थीं। यहाँ की सरकार इस बात का ध्यान रखती है कि सभी सांस्कृतिक अस्मिताओं का सम्मान हो। स्पेन में चार प्रमुख समुदाय-स्पेनिश, वास्क, केटेलन और गलेशियन हैं। इनमें भी आपस में लगातार संघर्ष होता रहता था। स्वायत्तता दिए जाने के बाद से इन सभी क्षेत्रों में शान्ति है। ये कुछ उदाहरण संवैधानिक समाधान के हैं। जातीयता से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए धीरज, विवेक और दूरदृष्टि की आवश्यकता होती है।
    न्यायिक स्तर पर भी अपने अधिकारों के लिए विश्व में अनेक लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं। अमरीका की खोज का श्रेय कोलम्बस को दिया जाता है। लेकिन यह श्रेय अर्थहीन था क्योंकि वहाँ पर पहले ही से अमरीकी इंडियनों की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्थाएँ विद्यमान थीं। अप्रवासियों ने तो मात्र उनका दोहन किया। वहाँ के मूल निवासियों का जानवरों की तरह शिकार किया गया। अमरीका की सरकार सन् साठ के दशक तक इनकी अस्मिता को स्वीकार करने से कतराती थी। लेकिन उसके बाद सांस्कृतिक अस्मिता की नयी चेतना जागी और आज इनमें से अनेक समूह अपनी भू-संपदा को पाने के लिए न्यायिक युद्ध लड़ रहे हैं। अमरीकी इंडियनों के आत्मनिर्णय के अधिकार को कुछ हद तक महत्व दिया जाने लगा है। आस्ट्रेलिया में भी ऐसी ही न्यायिक लड़ाई चल रही है। आस्ट्रेलिया की खोज करने का दावा डच और ब्रिटिश दोनों करते हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने वहाँ की भूमि को स्वायत्तहीन माना। जबकि वहाँ पर पहले से आदिवासी रहते थे। उन आदिवासियों के साथ उन्होंने बड़ा बुरा बर्ताव किया। आज शुद्ध रक्त आस्ट्रेलियाई आदिवासियों की संख्या बहुत कम बची है लेकिन उनमें अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता आई है और सारे आस्ट्रेलिया महाद्वीप में इन 2 प्रतिशत आदिवासियों के अधिकारों पर बहस हो रही है।
    जातीयता की कोई निश्चित पहचान न होने के कारण विधायिकाओं और न्यायपालिकाओं के बाहर लड़ी जाने वाली अस्मिता की लड़ाई का आकलन करना बहुत कठिन है। पहचान के कोई स्थिर आधार नहीं हैं। प्रजाति, धर्म, भया और संस्कृति की इसमें विशेष भूमिका रहती है। आज संसार भर में लगभग चार सौ ऐसे आंदोलन चल रहे हैं जिनमें से वाली हिंसा कभी शांत हो जाती है तो कभी उग्र हो जाती है।
    मानव वैज्ञानिकों के अनुसार आनुवांशिकता, संस्थाओं, विश्वासों, भाषा और स्थानीयता के आधार पर राष्ट्रीयता का दावा करने वाले समाजों की संख्या हज़ारों में है। सांस्कृतिक प्रश्नों पर विकेंद्रीकरण और अन्य स्तरों प केंद्रीकरण होना आवश्यक है। छोटी अस्मिताओं को भी निर्णयों में शामिल करना चाहिए। उनकी माँग के आधार पर बड़े राज्यों का बँटवारा नहीं किया जा सकता। अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर मानवीय संवेदना के आधार पर विचार किया जाना आवश्यक है।
    श्यामाचरण दुवे द्वारा लिखित निबंध ‘अस्मिताओं का संघर्ष' वर्तमान विश्व में विभिन्न छोटी अस्मिताओं के सामने उपस्थित पहचान के संकट और उनमें आई चेतना को व्याख्यायित करता है। लेखक का मानना है कि प्रजाति, धर्म, भाषा और संस्कृति आदि अलग-अलग या मिलकर किसी व्यक्ति की पहचान बनाते हैं। इसी से जातीयता का भाव पैदा होता है। राष्ट्रों का निर्माण एक लम्बी प्रक्रिया के तहत हुआ है लेकिन विभिन्न राष्ट्रों के भीतर अपने हक के लिए छोटी-छोटी सांस्कृतिक अस्मिताओं की लड़ाई लड़ी जा रही हैं। यह संघर्ष मुख्य रूप से न्यायिक और संवैधानिक तरीके के अलावा कभी-कभी हिंसक रूप भी धारण कर लेता है। लेखक का मानना है कि अगर राष्ट्रों को ऐसे संकटों से बचाना है तो हमें समय रहते उन अस्मिताओं की समस्याओं को पहचान कर उन्हें महत्त्व देना होगा। संक्षेप में कहें तो इस निबंध में श्यामाचरण दुबे ने समकालीन विश्व की अनेक समस्याओं को विभिन्न उदाहरणों से पुष्ट करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है और निबंध के अन्त में इन समस्याओं का समाधान भी प्रस्तावित किया है। Read also : श्यामाचरण दुबे का जीवन परिचय

    अस्मिताओं का संघर्ष पाठ के प्रश्नोत्तर

    अनुच्छेद - 1
    जातीयता की पृष्ठभूमि में अनेक तथ्य हो सकते हैं-समान प्रजातीय उद्गम, लंबी अवधि के समान ऐतिहासिक अनुभव, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि। इन सभी की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है, पर दो या अधिक तथ्य जातीय भावना के आधार को दृढ़ता देते हैं। दल और जन गण की प्रच्छन्न मानसिकता आधुनिक राष्ट्रों में भी लक्षित होती है और यदि हम समसामयिक जातीयता की भावना का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो उसमें इसी मानसिकता की स्पष्ट प्रेरणा दिखाई पड़ेगी। जातीयता के के प्रमुख आग्रह हैं-अपनी स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता। इन तत्त्वों की संतोषजनक व्याख्या संभव नहीं हैं, क्यों वह विभिन्न कालों और संदर्भो में बदलती रहती है। यह निश्चित है कि जातीय सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न उससे अविभाज्य रूप सेजुड़े रहते हैं और उनसे प्रेरित आंदोलन अधिकाधिक स्वायत्तता की माँग करते हैं।
    प्रश्न : जातीयता की पृष्ठभूमि में कौन-कौन से तथ्य हो सकते हैं?
    उत्तर : समान प्रजातीय उद्गम, लंबी अवधि के समान ऐतिहासिक अनुभव, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनमें से दो या उससे अधिक तथ्य मिलने पर जातीय भावना में उभार आ सकता है।
    प्रश्न : जातीयता के प्रमुख आग्रह कौन-से हैं?
    उत्तर : अपनी स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता जातीयता के दो प्रमुख आग्रह हैं।
    प्रश्न : स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता की संतोषजनक व्याख्या संभव क्यों नहीं है?
    उत्तर : स्वतंत्र पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता की संतोषजनक व्याख्या इसलिए संभव नहीं है क्योंकि बदलते समय और संदर्भ के साथ-साथ इनमें भी बदलाव आता है। हर काल के अपने दवाव और समस्याएँ होती हैं। परिवर्तित समाज में पुरानी पहचानों को पुनर्परिभाषित करना पड़ता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि हर नया समाज अपने लिए नए मानक गढ़ता है। इन नए मानकों के अनुरूप सांस्कृतिक स्वायत्तता को बनाए रखना काफी मुश्किल भरा कार्य है।
    अनुच्छेद - 2
    विधायिकाओं और नगरपालिकाओं के क्षेत्र के बाहर जो सांस्कृतिक अस्मिताओं की लड़ाइयाँ लड़ी जा रहीं हैं, उनके आयामों और परिणामों का आकलन कठिन है। जातीयता की कोई निश्चित व्याख्या नहीं हैं। ‘पहचान' के कोई स्थिर आधार नहीं हैं। जातीय समूहों के सीमांत समय-समय पर बदलते रहते हैं। वे कभी एक तत्त्व को वरीयता देते हैं, कभी दूसरे को। प्रजाति, धर्म, भाषा और संस्कृति की भूमिका कभी मुख्य रही है कभी गौण। आज प्रश्न सामाजिक समता और सांस्कृतिक स्वायत्तता का है। अपने ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में कुछ समूह शेष समाज से पूरी तरह समाकलित नहीं हो पाए। युद्ध में जय-पराजय ने पहचान समूहों का विभाजन किया। उपनिवेशवाद जातीयता और संस्कृति के तर्क पर आधारित नहीं था। साम्राज्यवाद की समाप्ति के बाद नवनिर्मित राष्ट्रों ने भी इन तथ्यों की उपेक्षा की। स्वाधीनता के उत्सवीकरण के अति उत्साही अध्याय के बाद बहुमत के उच्च भाव और अल्पमत के आर्थिक शोषण और सामाजिक विभेद के प्रश्न उभरे। जहाँ उनकी उपेक्षा या अवज्ञा की गई छोटी अस्मिताओं में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। आंदोलनों ने हिंसक रूप ग्रहण किया। आज संसार में लगभग चार सौ ऐसे आंदोलन चल रहे हैं जो कभी शांत रहते हैं और कभी विस्फोटक हो जाते हैं। इन आंदोलनों के कारण वर्तमान विश्वव्यवस्था अस्थिर हो गई है। सोवियत संघ और युगोस्लाविया के विघटन के बाद जातीयता का अत्यंत उग्र रूप सामने आया है।
    प्रश्न : उपर्युक्त अनुच्छेद का केन्द्रीय विचार बताइए।
    उत्तर : छोटी-छोटी सांस्कृतिक अस्मिताओं द्वारा विश्व भर में की जा रही लड़ाई इस अनुच्छेद का केन्द्रीय विचार है।
    प्रश्न : केन्द्रीय विचार के अतिरिक्त अन्य विचार बिन्दु कौन-से हैं?
    उत्तर : पहचान के आधार, साम्राज्यवाद से उत्पन्न विषमताएँ, स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अल्पमत वाले समूह के साथ होने वाले सामाजिक विभेद और इसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व में चलने वाले हिंसक आंदोलन इस अनुच्छेद के अन्य विचार बिन्दु हैं।
    प्रश्न : 'आज प्रश्न सामाजिक समता और सांस्कृतिक स्वायत्तता का है' - इस पंक्ति का आरंभिक वाक्य के रूप में प्रयोग हुए लगभग 100 शब्दों का अनुच्छेद लिखिए।
    उत्तर : आज प्रश्न सामाजिक समता और सांस्कृतिक स्वायत्तता का है। सांस्कृतिक स्वायत्तता का सम्मान करते हुए सामाजिक दृष्टि से समतामूलक समाज का निर्माण करना विश्व के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है। भारत जैसे लोकतांत्रिक समाज में इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है क्योंकि हमारा देश धर्म, भाषा, संस्कृति, प्रजातिगत उद्गम आदि के आधार पर अनेक विभिन्नताओं को अपने में समेटे हुए है। जो सांस्कृतिक पहचान वाले समूह अल्पमत में हैं उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता को अक्षुण्ण बनाए रखना हमारा कर्त्तव्य बनता है। उनमें जो अभी भी पिछड़े हुए हैं उनको कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ देकर सामाजिक समता का लक्ष्य पाया जा सकता है।

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