Friday, 20 September 2019

श्यामाचरण दुबे का जीवन परिचय - Shyama Charan Dubey Biography in Hindi

श्यामाचरण दुबे का जीवन परिचय : Today, we are providing श्यामाचरण दुबे का जीवन परिचय और रचनाएँ for our readers. इस लेख में हम प्रोफेसर श्यामचरण दुबे (shyama charan dube ) जी के जीवन (Jeevan Parichay) के बारे में तथा उनकी रचनाओं के बारे में जानेंगे।

श्यामाचरण दुबे का जीवन परिचय - Shyama Charan Dubey Biography in Hindi

प्रसिद्ध समाजविद् श्यामाचरण दुबे का जन्म 25 जुलाई सन् 1922 को मध्यप्रदेश के सिवनी में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय में ही हुई। लगभग आठ साल की अवस्था में इनके सिर से माता का साया उठ गया। पिता के संरक्षण में इनकी बहुमुखी प्रतिभा का विकास हुआ। नागपुर विश्वविद्यालय से इन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। राजनीति शास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद इन्होंने मानवविज्ञान को आगे के अध्ययन के लिए अपना विषय बनाया और छत्तीसगढ़ की ‘कमार' जाति पर उल्लेखनीय कार्य किया।
किशोरावस्था में ही इन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य आरम्भ कर दिया था। सन् 1955 में इनकी 'इंडियन विलेज' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। हिन्दी में यह ‘भारतीय ग्राम' नाम से प्रकाशित हुई। दुबे जी को हिन्दी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार प्राप्त था। यही कारण है कि इन्होंने दोनों भाषाओं में अपने ग्रन्थों का प्रणयन किया है। अंग्रेजी में लिखी इनकी रचनाओं में इंडियाज़ चैलेंजिंग विलेज़िज, मॅडर्नाइजेशन एंड डेवलपमैंट : सर्च फॉर ऑलटरनेटिव पेरेडाइम्स और इंडियन सोसाइटी प्रमुख हैं। ‘मानव और संस्कृति', 'पम्परा, इतिहासबोध और संस्कृति', 'शिक्षा, समाज और भविष्य', 'संक्रमण की पीड़ा', 'विकास का समाजशास्त्र', आदि इनकी हिन्दी में लिखी प्रमुख पुस्तकें हैं।
‘परम्परा, इतिहासबोध और संस्कृति' के लिए इनको वर्ष 1993 में ज्ञानपीठ ने मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया। फरवरी, 1996 में इनका देहावसान हो गया।
श्यामाचरण दुबे समाज वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक भी थे। अपने जीवन काल में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहकर अपनी इस योग्यता को प्रदर्शित किया। उच्च शिक्षा संस्थान, शिमला में उन्होंने निदेशक के रूप में कार्य किया। वे जम्मू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा अनुदान आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएँ दीं। इसके अलावा वे समय-समय पर अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सलाहकार भी रहे।

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