प्रायश्चित्त की घड़ी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

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प्रायश्चित्त की घड़ी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

आज का समय चेतना एवं जागृति का है। अत: दलितों एवं पिछड़े हुये लोगों की आवाज भी ऊँचे स्वर में स्वरित होने लगी है। भारतमाता का सजीव चित्र उपस्थित करते हुये लेखक ने व्यक्त किया है कि जिस काल्पनिक भारतमाता की हम जयघोष करते हैं, उसकी सीमाओं का भी अवलोकन करना आवश्यक है। वस्तुत: भारतमाता के समृद्ध और उच्चवर्गीय ही पुत्र नहीं है; अपितु करोड़ों दलित निरन्तर एवं निर्वस्त्र लाल भी उसके बालक हैं। जागरणकाल में उच्च वर्ग के संचित संस्कारों को बड़ी ठेस लगेगी, उस महाआघात के लिए हमें पूर्व सतर्क हो जाना चाहिए।

विभिन्न जातियों के ऐतिहासिक विभाजन पर बल देते हुये लेखक ने कहा है कि इस देश में हिन्दू, मुसलमान, इसाई आदि अनेक जातियाँ रहती हैं जिसमें प्रमुखता हिन्दुओं की ही है। छूआछूत के आधार पर इन जातियों को चार भागों में बाँटा जा सकता है। (१) वे जातियाँ जिनके देखने मात्र से ब्राह्मण आदि ऊँची जातियों के वस्त्र अपवित्र हो जाते हैं। (२) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से शरीर और अन्न अपवित्र हो जाते हैं। (३) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से शरीर तो नहीं, पानी, घृत, पक्व भोजन आदि अपवित्र हो जाते हैं। (४) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से कच्ची रसोई अपवित्र हो जाती है। सचमुच देखा जाय तो इन सबकी मिली-जुली प्रतीकात्मक संघमूर्ति का नाम भारतमाता है और भारतमाता का जय निनाद इन स्तर भेदों को विलीन करने के लिए ही है। इन युगों-युगों से संस्कारित वहमों को नष्ट करने के लिए बड़े संबल की आवश्यकता है।

भारत में कुछ पण्डितजन सभी परम्पराओं का मूल वेदों से खोजने में अभ्यस्त हैं। यही बात जातियों के विषय में भी है पर निश्चित् रुप से वर्तमान जटिलताओं का मूल, वैदिक वर्ण व्यवस्था नहीं है। अत: जाति निर्माण का कोई दृढ़ आधार नहीं है फिर भी सांकेतिक रुप में निम्न आधारों को प्रमुखता दी जा सकती है। (१) जन्म से बनी हुई जातियाँ (२) कर्म-परम्परा से बनी हुई जातियाँ (३) धन वितरण की असमानता से बनी हुई जातियाँ (४) राजनैतिक कारणों पर अवलम्बित जातियाँ । वैदिक आधार को लेकर (१) ब्राह्मण (२) क्षत्रिय (३) वैश्य (४) शूद्र जातियों का निर्माण हुआ । आम्भीर जाति देश की सीमा में घूमने वाली एवं लुटेरी जाति समझी जाती थी। परन्तु इनकी मर्यादा क्षत्रियों के समान मान ली गयी है। 

दूसरे प्रकार की जातियाँ कार्य के आधार पर निर्मित हुई हैं। जैसेचमार, सुनार, लुहार आदि। पेशे के कारण जाति का निर्माण बड़ा आश्चर्य उत्पन्न करता है। रिजली तथा धुर्य जैसे नृतत्वशास्त्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि उत्तर भारत के चमारों में बंगाल के ब्राह्मणों की अपेक्षा अधिक आर्य सादृश्य है। स्तव में जाति का सम्बन्ध जन्म, छूआछूत और विवाह तीन माने गये हैं। 

तीसरे इस देश में रूढ़ियों को रोकने के लिए अनेक क्रान्तिकारी आन्दोलन हुये, फिर भी जाति प्रथा में किसी प्रकार का उन्मूलन नहीं हो सका एवं उसकी सफलता तो संदेहास्पद रही, आन्दोलनकारियों ने धार्मिक सम्प्रदाय को एक जाति ही बना डाला। 

चौथे कुछ जातियाँ राष्ट्रीयता के आधार पर निर्मित हुई हैं जैसे नेपाल की नैवार जाति राष्ट्रीय जाति कही जाती है। 

पाँचवें आर्थिक विषमता से बनी जातियों के लिए भी इतिहास का साक्ष्य प्राप्त है। धनवान व्यक्ति या धनी समाज उच्च जाति का माना गया है और निर्धनों की निम्न जाति स्वीकृत की गयी। 

छठें राजनैतिक कारणों से भी जातियों का विकास और पतन हुआ है। वेदों के आधार पर पण्डितों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन जातियाँ ही स्वीकार की है। राजपूती सेना का वह अंग जो कलेवा की रक्षा करता था ‘‘तलवार’’ जाति में परिवर्तित हो गया। 

इसी प्रकार यह जाति उपजाति में विभक्त हिन्दू समाज शता छिद्री है। इसको मनुष्यता के दरबार में ले जाने के लिए युग-युग से चली आती हुई संस्कार की शृंखला को शिथिल करना होगा। उस समय भारतीय सभ्यता, हिन्दू संस्कृति सचमुच नया रुप धारण करेगी।
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