Wednesday, 19 June 2019

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

भारतीय मनीषियों ने जीवन की अनेक समस्याओं को अनेक प्रकार की परिस्थितियों में देखा था और यथासमय उनके समाधान का मार्ग सोचा था। हमारी शिक्षा प्रणाली और ज्ञान प्रसार में भी परिवर्तन हुआ है।
भारत की उपलब्ध प्राचीन साहित्यों में ब्राह्मण और विद्या का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की सदैव से अपनी विश्ोषता है। संसार में आदि युग से ही विशेष कार्य वर्ग होते थे। विद्या पिता से ही सीखी जाती थी जिसके कारण विशेष विद्यायें विशेष कुलों में ही सीमाबद्ध रह जाती थीं। महाभारत में दो प्रकार के अध्यापकों का उल्लेख है- अपरिग्रही अध्यापक और वृत्ति पर नियुक्त अध्यापक।
ब्राह्मणों के लिए आदर्श था कि वह अत्यन्त निरीह भाव से गरीबी की जिन्दगी में रहे किन्तु ऊँचे से ऊँचा ज्ञान और चरित्रबल रखे प्रतिग्रह, याजन और अध्यापन इनसे वे अपना जीविकोपार्जन कर सकते थे। स्मृतिचन्द्रिका में यम के एकवचन के अनुसार ‘प्रतिग्रहं अध्यापनं याजनानं प्रतिग्रहं श्रेष्ठतमं बदंति’।
सिद्धार्थ को ८६ कलायें ६४ काम कलायें सिखाई गयी थीं। महाभारत और पुराणों से पता चलता है कि यज्ञों तथा तीर्थों में आयोजित शास्त्रार्थों से जनता को ज्ञान मिलता है।
हमारे इतिहास में नाना प्रकार से शिक्षण के उदाहरण हैं जिनमें देशकाल पात्र के अनुसार किसी को कम एवं किसी को अधिक प्राप्त होता रहा है। निस्पृह, उदार, प्रेमी और चरित्रवान गुरु ही श्रेष्ठ माना जाता है। हमें योजनाओं में मनुष्य को नहीं ढालना है। वरन् योजनाओं को मनुष्य के आदर्श के अनुसार बनाना है। गुरु को महत्ता दिलानी है, एवं आदर्श गुरु की स्थापना करनी है।

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