बसन्त आ गया है निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

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बसन्त आ गया है निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

यह निबन्ध उस समय लिखा गया है जबकि द्विवेदी जी ‘शांति निकेतन’ में निवास करते थे। द्विवेदी जी ने अपने समीपस्थ वृक्षों का अवलोकन करते हुए बताया है कि जब ‘बसन्त आ गया है’ इस आदर्श की प्रतिध्वनि कवि समाज के साथ ही साथ इतर प्राणियों पर भी गूँज उठी है, तब इस शांति निकेतन में स्थित कुछ वृक्षों पर ऋतुराज के आगमन की सूचना पूर्व से ही मिल गयी है। जिससे वे अपने को स्वागत के लिए पुष्पों और नई कोपलों के रूप में सज्जित किये हुए हैं पर कुछ कारणों से बसन्तागमन के पूर्व सूचना ही उपलब्ध नहीं हो सकी। अत: वे ज्यों के त्यों नव विकास से ही अपने पूर्व रूप में ही खड़े हुए हैं।

बसन्त जब आता है तो प्रथमत: सबको न्यस्त व्यागमूर्ति बनाकर उनका पूर्व-संचित धन उन्मुक्त भाव से (पतझड़ के द्वारा) दान करा देता  तब अपार सौन्दर्य रूप में पल्लवों, कोयलों और पुष्पों की सम्पत्ति  बाँट देता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के हाथ से से लगाई दो कृष्ण चूड़ायें हैं, जो अभी नादान हैं। अत: हरी-भरी रहकर भी फाल्गुन आषाढ़ मास की दशा को प्राप्त हैं। अमरूद के लिए तो हमेशा बसन्त ही रहता है। इसके अलावा विषमता यहाँ तक है कि कुछ समान परिस्थिति वाले वृक्ष भी समान रूप से विकसित नहीं हो पा रहे हैं।

लेखक के निवास के सामने कचनार का वृक्ष है जो स्वस्थ और सबल होते हुये भी फूलता नहीं है। पड़ोसी का कमजोर कचनार, शाखा-शाखा में पुष्प को धारण किये हुये है। ‘कमजोरों’ में भावुकता ज्यादा होती होगी। इस कथन से लेखक ने इसकी अविकसितता की पुष्टि की है।

भारत के नवयुवक उमंग और उत्साह से हीन दिखाई देते हैं। ऐसा पढ़ने में आया है किन्तु लेखक की दृष्टि में तो भारत के पेड़ पौधे भी उमंगों से हीन दिखाई देते हैं, क्योंकि जो अविकसित वृक्ष है उन्हें अभी तक यही पता नहीं चल पाया है कि ‘बसंत आ गया है’। महुआ और जामुन को देखने से लगता है कि बसन्त आता नहीं है, ले आया जाता है। संवेदन की स्थिति में कचनार की

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