घर जोड़ने की माया निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

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घर जोड़ने की माया निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रतिभायें हमेशा से अपने युग के बाह्याचारों, प्राचीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं निरर्थक विधानों की विरोधिनी रही है, किन्तु विचित्र तथ्य यह है कि परवर्ती काल में वे ही बाह्य जंजाल जिनका विरोध करते-करते उन्होंने अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये थे, उन्हीं की परम्परा पर हावी हो जाते हैं। जैसे धर्मवीर, कबीर के पीर, पैगम्बर, औलिया आदि के भजन पूजन की तीव्र भर्त्सना की गयी थी, किन्तु वह उन्हीं के गले पड़ी। संस्कृत को कूप जल कह कर हिन्दी को बहता नीर माना था, किन्तु आगे चलकर उन्हीं की प्रशस्ति में अनेक स्तोत्र लिखे गये।

जिस बुद्धदेव ने ईश्वर के अस्तित्व के विषय में सन्देह प्रकट किया उसी को बाद में मान लिया। अहिंसा के महान पुजारी विश्वबंधु बापू की हत्या भीिं हसा के हाथों हुई। अन्तत: ऐसा विरोधाभास क्यों होता है? हमें इसे इतिहास के द्वारा सन्तुलित मस्तिष्क से सोचना चाहिए। 

प्रत्येक बड़े यथार्थ का सम्प्रदाय के साथ मेल बैठाना ही मुख्य लक्ष्य हो जाता है। फलस्वरूप साधना की शुद्धता भी शनै: शनै: समाप्त हो जाती है, किन्तु यह भी गौण है। मुख्य है ‘घर जोड़ने की माया’।

माया के चक्कर में पड़कर धन, मान, यश, कीर्ति के प्रलोभन में वे अनुयायी प्रवर्तक द्वारा प्रचारित ‘‘सत्य’’ से बहुत दूर जाते हैं। घर फूंकने वाली प्रकृति का लोप हो जाता है। 

यह घर जोड़ने की माया निश्चित ही बड़ी प्रबल है। संसार में कोई एकाध ही ऐसा माँ का लाल होगा जो इस मायाविनी का शिकार होने से बच जाय। घर जोड़ने की माया का मूल आधार पैसा है। इसी मूलक राम के इर्द- गिर्द सारी साधना समाप्त हो गयी है। यदि पैसे का राज्य समाप्त हो जाता तो वह समूचा बेहूदा साहित्य लिखा ही न जाता जो केवल पन्थों और उनके प्रवर्तकों की महिमा बढ़ाने के उत्साह में बराबर उन बातों को ढंकने का प्रयास करता है, जिन्हें पंथ के प्रवर्तक ने बड़ी कठिन साधना से प्राप्त किया था। मेरा मन कहता है कि यह सम्भव है।
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