मेरी जन्मभूमि निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

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मेरी जन्मभूमि निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रत्येक प्राणी में अपनी जन्मभूमि के प्रति स्नेह और श्रद्धा होती है। आचार्य द्विवेदी जी भी अपने जन्मस्थली के प्रति अत्यन्त स्नेह, श्रद्धा एवं गौरव का अनुभव करते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी जन्मभूमि के इतिहास को जितनी पैनी दृष्टि एवं भावुक हृदय से देखा है उतना अन्य साधारणजन नहीं देख पाता। उनके उस छोटे से गाँव में, अनेक जातियाँ, भारत की संस्कृति का इतिहास, भग्नावशेष की ईटों एवं कला आदि सभी का समावेश हैं। आचार्य द्विवेदी जी ने साहित्य के इतिहास को केवल कुछ बड़े व्यक्तियों के उदय एवं अस्त होने के लिखित रूप को ही नहीं माना वरन् वह कहते हैं कि ‘‘साहित्य का इतिहास मनुष्य के धारावाहिक जीवन के सारभूत रस का प्रवाह है।’’

उनके जन्मे ग्राम का नाम उनके बाबा आरत दूबे के नाम पर पड़ा जो ओझवलिया ग्राम का ही एक भाग है। इनके गांव के पास गंगा, यमुना दोनों नदिया वास करती हैं। गाँव में छप्परों के मकान अधिकांशत: हैं।

द्विवेदी जी का कहना है कि बुद्धदेव जहाँ-जहाँ गये, यदि उन-उन स्थानों का मानचित्र बनायें तो यह ग्राम उसमें अवश्य आ जायेगा, क्योंकि वे अवश्य ही इस ग्राम से निकले होंगे, स्कन्दगुप्त की विशालवाहिनी भी इस ग्राम में रुकती हुई गयी होगी और स्कन्दगुप्त ने अवश्य यहाँ कोई घोषणा की होगी।


जातियों की पूर्व परम्परा से उनकी जन्मभूमि के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विकास को जाना जा सकता है। इनके गांव में कांटु (भड़भूजा) और कलवार, तुरहा जाति भी रहती है। ग्राम में मग ब्राह्मण भी निवसित हैं। वहाँ एक जाति ‘दुसाध’ भी रहती है, जो अति वीर और विनम्र होते हैं।

गांव में काली, भगवती, हनुमान जी, प्लेग मैया आदि देवी देवताओं के मंदिर भी हैं। प्लेग मैया का स्वरुप आश्चर्य का विषय है। इस देवी का स्वरुप पाश्चात्य सभ्यता का प्रतीक है।

प्रयत्नशील मानव की पिछली झाँकी को दिखाने का कार्य ऐतिहासिक अवशेष ही करते हैं। इन्हीं अवशेषों को देखकर मानव निरन्तर प्रगति करता है। लोगों में मनुष्यता भरनी है, तभी यथार्थ में  नव का विकास और कल्याण हो सकता है।
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