Friday, 11 January 2019

दीपदान एकांकी की कथावस्तु Deepdan Ekanki ki Kathavastu

दीपदान एकांकी की कथावस्तु Deepdan Ekanki ki Kathavastu

Deepdan Ekanki ki Kathavastu
दीपदान नामक एकांकी डॉ. रामकुमार वर्मा का एक प्रसिद्ध एकांकी है। ‘दीपदान’ की कथा भी कुँवर उदयसिंह का संरक्षण करनेवाली धाय पन्ना के द्वारा कुँवर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करने और उसके लिए अपने पुत्र चंदन के बलिदान करने के प्रसंग से संबंधित है।

‘दीपदान’ की कथावस्तु सन् 1536 ईसवीं में राजस्थान के चित्तौड़ दुर्ग में घटित होती है। चित्तौड़ के महाराणा साँगा का देहांत हो चुका है और उनके राज्य का उत्तराधिकारी उनका सबसे छोटा पुत्र कुँवर उदयसिंह है, जिसकी उम्र अभी चौदह वर्ष है। कुँवर उदयसिंह की देखरेख और लालन-पालन का कार्य पन्ना नाम की एक स्वामीभक्त स्त्री कर रही है, जिसे पन्ना धाय के नाम से जाना जाता है। उसका तेरह वर्ष का चंदन नाम का एक पुत्र भी है, जो कुँवर उदयसिंह के साथ खेलता रहता है। महाराणा साँगा की मृत्यु के पश्चात् उनके भाई पृथ्वीराज का एक दासी पुत्र बनवीर, जिसकी आयु बत्तीस वर्ष है, राज्य पर अपना अधिकार करने के लिए प्रयत्नशील है। ‘दीपदान’ की सारी कथा पन्ना धाय और बनवीर पर आकर चरम सीमा की स्थिति में आकर ठहर जाती है। 

‘दीपदान’ की सम्पूर्ण कथा कुँवर उदयसिंह के कक्ष में घटित होती है। रात्रि का दूसरा प्रहर है। नेपथ्य में नारियों की सम्मिलित नृत्य-ध्वनि एवं गायन का स्वर सुनाई देता है, जो धीरे-धीरे हल्का हो रहा है। उदयसिंह आकर पन्ना धाय को बतलाता है कि बाहर सुंदर-सुंदर लड़कियाँ तुलजा भवानी के सामने नाच रही हैं और दीपदान कर रही हैं। वह पन्ना को भी अपने साथ नृत्य देखने के लिए ले जाने की ज़िद करता है, किन्तु पन्ना इस बात के लिए तैयार नहीं होती। वह कुँवर उदयसिंह को समझाती है कि तुम तो चित्तौड़ के सूरज हो और इस राजवंश के दीपक तथा महाराणा साँगा के कुलदीपक हो। तुम्हें इस तरह नाच-गाने को देखने के लिए नहीं जाना चाहिए। कुँवर उदयसिंह रूठ जाता है और बिना कुछ खाये-पिये वहाँ से जा कर कहीं और सो जाता है। 

उदयसिंह के जाने के पश्चात् पन्ना के पास रावल सरूप सिंह की लड़की सोना, जिसकी उम्र सोलह वर्ष है और जो अत्यंत रूपवती तथा कुँवर उदयसिंह की सहेली है, आती है। वह पन्ना से कुँवर उदयसिंह को अपने साथ ले जाने के लिए आग्रह करती है, किन्तु पन्ना धाय मना कर देती है। पन्ना को संदेह हो जाता है कि बनवीर के मन में कुँवर उदयसिंह को लेकर कोई षड़यंत्र का भाव है और उसी के लिए उसने यह ‘दीपदान’ का उत्सव असमय आयोजित करवाया है, ताकि लोगों का ध्यान उत्सव में लगा रहे और वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाए। पन्ना को इस बात में भी संदेह है कि सोना कहीं-न-कहीं बनवीर के षड़यंत्र में सम्मिलित है। वह सोना की बात को अस्वीकार कर देती है और नाराज होकर पन्ना को भला-बुरा कहते हुए वहाँ से सोना चली जाती है।

पन्ना धाय का अनुमान सही निकला। अंतःपुर की परिचारिका सामली आकर पन्ना को बतलाती है कि बनवीर ने सोते हुए महाराणा विक्रमादित्य की छाती में तलवार भोंककर हत्या कर दी है। उसे आशंका है कि कहीं अब वह यहाँ आकर कुँवर उदयसिंह को भी इस राज्य का उत्तराधिकारी समझ कर उसकी हत्या न कर दे ?

इस विकट समय में आनेवाली घटनाओं से थोड़ा भी विचलित न होते हुए पन्ना ने तत्काल निर्णय लिया कि अब राज्य के उत्तराधिकारी और कुलदीपक कुँवर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा करने के लिए उसे अपने पुत्र चंदन की बलि देनी होगी। दुर्ग में जूठी पत्तल उठानेवाले कर्मचारी कीरत की मदद लेकर पन्ना ने कुँवर उदयसिंह को उसकी टोकरी में रखवाकर तथा जूठी पत्तलों से ढँक कर दुर्ग से बाहर बेरिस नदी के किनारे शमशान तक पहुँचवा दिया, ताकि उसे बाद में सुरक्षित अवस्था में कुंभलगढ़ ले जा सके। इसके पश्चात् पन्ना ने कुँवर उदयसिंह के शयन कक्ष में अपने पुत्र चंदन को सुलाकर उसे चादर से ढँक दिया।

पन्ना की आशंका के अनुरूप राणा विक्रमादित्य की हत्या के पश्चात् मदांध बनवीर कुँवर उदयसिंह के कक्ष में आता है और पन्ना के बहुत रोकने के पश्चात् भी चंदन को कुँवर उदयसिंह समझ कर अपनी तलवार के प्रहार से उसकी हत्या कर देता है। पन्ना जोर से चीखकर मूर्छित हो जाती है। कमरे में मंद लौ से दीपक जलता रहता है और यहीं पर दृश्य समाप्त हो जाता है।

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