Monday, 31 December 2018

शिरीष के फूल हमारे जीवन का आदर्श - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

शिरीष के फूल हमारे जीवन का आदर्श - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

शिरीष के फूल
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘शिरीष के फूल’ एक ललित निबंध है, जिस में लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना एक ऐसे अवधूत (अनासक्त योगी) से की है जो ग्रीष्म की भीषण तपन सहकर भी खिला रहता है। लेखक ने इसके माध्यम से मनुष्य को यह संदेश दिया है कि उसे विपरीत स्थितियों में भी घबराना नहीं चाहिए अपितु कठिन से कठिन संकट का भी उसी प्रकार से सामना करना चाहिए अपितु कठिन से कठिन संकट का भी उसी प्रकार से सामना करना चाहिए जैसे जेठ की तपती दोपहरी में शिरीष फलूं से लदकर झूमते हुए अपनी मन्द सुगन्ध चारों ओर बिखेरता रहता है।

शिरीष की प्रशंसा करते हुए लेखक लिखता है कि शिरीष ऐसा वृक्ष है जो छायादार होने के साथ ही अपने फूलों की महक वसन्त के आगमन से लेकर भादों तक बिखेरता रहता है। जेठ की प्रचण्ड गर्मी को भी वह अपने कोमल फूलों के साथ झूम-झूम कर व्यतीत कर लेता है। गर्मी में जब अन्य वनस्पतियाँ तथा फूल आदि सूख जाते हैं। शिरीष कालजयी अवधूत के समान लहलहाता हुआ जीवन की अजेयता का सन्देश देता रहता है। शिरीष के फूलों को इतना अधिक कोमल माना गया है कि ये केवल भँवरों के पैरों का बोझ ही सहन कर सकते हैं, पक्षियों का नहीं। फिर भी ये भीषण गर्मी को आसानी से झेल जाते हैं। कबीर और कालिदास को भी लेखक शिरीष के समान मानता है जो मस्ती, फक्कड़पन और मादकता में शिरीष के फूल के समान हैं। वे इन्हें अनासक्त योगी मानता है क्योंकि अनासक्त ही कवि हो सकता है। कबीर का फक्कड़पन और कालिदास का सौंदर्यबोध एवं मनोरम कल्पनाएँ शिरीष के समान ही हैं। सुमित्रानन्द पंत और टैगोर की भी वह शिरीष जैसी अनासक्ति से युक्त मानता है।

शिरीष के फूल जहाँ बहुत कोमल होते हैं, इसके फल बहुत कठोर होते हैं। वे अगली वसन्त के आने तक भी गिरते नहीं हैं बल्कि सूख कर खड़खड़ाते रहते हैं। उन्हें नए पत्ते और नये फल ही धकेल कर उसी प्रकार से गिरा देते हैं जसै बूढ़े नेताओं द्वारा कुर्सी खाली न करने पर उन्हें नए नेता पीछे धकेल देते हैं। अपने इस कथन से लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि मनुष्य को अपनी अवस्था तथा स्थिति के अनुरूप कार्य करना चाहिए। समय की रफ्तार को पहचान कर स्वयं को उसी के अनुसार ढाल लेना चाहिए। अधिकार का लालच सदा नहीं बना रहना चाहिए। जिस प्रकार पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तो नये पत्ते उन के स्थान पर आ जाते हैं उसी प्रकार से मनुष्य को भी कुर्सी से चिपके रहने के स्थान पर बुढ़ापा आने पर अपने उत्तराधिकारी की वह स्थान सौंप देना चाहिए। इस से युवा पीढ़ी को अनुभवी पीढ़ी को निर्देश में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। जिस प्रकार बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मृत्यु एक सत्य है उसी प्रकार से मृत्यु के स्वागत के लिए भी सदा तैयार रहना चाहिए और उसके आकस्मिक रूप से आने से पहले ही सब प्रबन्ध कर देने चाहिए नहीं तो जैसे शिरीष के पुराने खड़खड़ाते फल को नये पत्ते और फल धकेल कर गिरा देते हैं वैसे ही अधिकार के लालची व्यक्ति को भी लोग धकेल देते हैं वह मनुष्य को गांधी जसै बनने के प्रेरणा देता है जो शिरीष के फूल के समान कोमल और शिरीष के फल के समान कठोर भी थें वे शिरीष के समान वातावरण से ही जीवन-वायु खींच कर संघर्ष करते हुए देश को स्वतंत्र कर सके थे।

इस प्रकार लेखक ने ’शिरीष के फूल’ निबंध के माध्यम से मनुष्य को प्रेरित करते हुए यह कहा है कि उसे सुख-दुख में समभाव से रहते हुए जीवन संघर्ष से कमी निराश नहीं होना चाहिए, अपितु शिरीष के समान वायुमण्डल से ही जीवन-रस प्राप्त कर विपरीत स्थितियों का सामना उसी प्रकार से मुस्कराते हुए करना चाहिए जैसे शिरीष के फलू भीषण गर्मी में भी लहलहाते रहते हैं। कबीर विपरीत स्थितियों में भी अपने फक्कड़पन से समाज को अपना संदेश सुनाते रहे, कालिदास अनासक्त भाव से अपने सौंदर्य निरूपण में लगे रहे, गांधी जी अपने आस-पास के वातावरण से जीवन-रस प्राप्त कर विपरीत स्थितियों का सामना करते हुए विदेशियों से देश-स्वतंत्र कराने में सफल हुए। अतः वही व्यक्ति जीवन में सफल तथा महान बन सकता है जो शिरीष के समान वायुमण्डल से रस खींचकर विपरीत स्थितियों में भी लहलहाता रहे और कोमलता तथा कठोरता का सहज मिश्रण हो। क्यों क ऐसे अवधूत ही महान साहित्यकार, समाज सुधारक अथवा जननायक बन सकते हैं।

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