प्रयोजनवाद का अर्थ परिभाषा और उद्देश्य (Prayojanwad ka Arth Paribhasha aur Uddeshya)

प्रयोजनवाद का अर्थ परिभाषा और उद्देश्य (Prayojanwad ka Arth Paribhasha aur Uddeshya) प्रयोजनवाद एक आधुनिक अमेरिकी जीवन दर्शन है। प्रयोजनवाद का उत्पत्त

प्रयोजनवाद का अर्थ परिभाषा और उद्देश्य (Prayojanwad ka Arth Paribhasha aur Uddeshya)

प्रयोजनवाद एक आधुनिक अमेरिकी जीवन दर्शन है। यह अमेरिकी राष्ट्र के जीवन तथा विचार प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुतः अमेरिका नव निवासियों का देश है।

प्रयोजनवाद का उत्पत्ति स्थल अमेरिका है, जहां एक दर्शन के रूप में इसका विकास हुआ। चार्ल्स पियर्स तथा विलियम जेम्स इस विचारधारा के जनक/प्रतिपादक माने जाते हैं। जेम्स ने मानव अनुभव के महत्व को स्पष्ट किया और मानव को समस्त वस्तुओं और क्रियाओं की सत्यता की कसौटी बताया। जेम्स के बाद अमेरिका के ही एक विचारक जॉन ड्यूवी ने इस विचारधारा क बढ़ाया। ड्यूवी ने व्यक्ति की इच्छा को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में स्वीकार किया। उनके अनुसार मानव प्रगति का आधार सामाजिक बुद्धि ही होती है। ड्यूवी के बाद अमेरिका में उनके शिष्य किलपैट्रिक ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाया और इंग्लैण्ड में शिलर महोदय ने। इन सबमें ड्यूवी का योगदान सबसे अधिक है। प्रयोजनवादी किसी निश्चित सत्य में विश्वास नहीं करते। उनके विचार से दर्शन भी सदा निर्माण की स्थिति में रहता है। चूंकि मानव जीवन परिवर्तनशील है, अतः इस प्रकार की शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्य चर्चा आदि का निर्माण न करके उनके निर्माण के सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं। इस विचारधारा के प्रमुख दार्शनिक एवं शिक्षाविद् जॉन ड्यूवी माने जाते हैं।

प्रयोजनवाद का अर्थ (Meaning of Pragmatism in Hindi)

प्रयोजनवाद आंग्ल भाषा के 'प्रेग्मैटिज्म' (Pragmatism) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है, जिसकी व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के 'प्रैग्मा' (Prama) शब्द से हुई है, जिसका तात्पर्य है 'क्रिया' अर्थात् ‘व्यवहारिक’ या ‘व्यवहार्य' । दूसरे शब्दों में प्रयोजनवाद वह विचारधारा है जो उन्हीं बातों को सत्य मानती है, जो व्यवहारिक जीवन में काम आ सके। प्रयोजनवादी मूर्त वस्तुओं, शाश्वत सिद्धान्तों और पूर्णता तथा उत्पत्ति में विश्वास नहीं करते। इनके अनुसार सदैव देशकाल तथा परिस्थिति के अनुसार सत्य परिवर्तित होता रहता है, क्योंकि एक वस्तु जो एक देश, काल तथा परिस्थिति में उपयोगी होती है वह दूसरे में नहीं। प्रयोगवाद को 'प्रयोजनवाद' भी कहा जाता है, क्योंकि यह 'प्रयोग' (Experiment] को ही सत्य की एकमात्र कसौटी मानता है। इसे हम 'फलवाद' भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें किसी कार्य का आधार उसके परिणाम या फल के आधार पर आँका जाता है।

इस प्रकार, “प्रयोजनवाद जिसे हम प्रयोगवाद या फलवाद भी कह सकते हैं, वह विचारधारा है जो उन्हीं क्रियाओं, वस्तुओं, सिद्धान्तों तथा नियमों को सत्य मानती है, जो किसी देश, काल और परिस्थिति में व्यवहारिक तथा उपयोगी हो ।”

प्रयोजनवाद की परिभाषा (Definition of Pragmatism in Hindi)

1. रस्क के अनुसार ( According to Rusk ) - “प्रयोजनवाद एक प्रकार से नवीन आदर्शवाद के विकास की अवस्था है, एक ऐसा आदर्शवाद जो वास्तविकता के प्रति पूर्ण न्याय करेगा, व्यवहारिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय करेगा और इसके परिणामस्वरूप उस संस्कृति का निर्माण होगा जिसमें निपुणता का प्रमुख स्थान होगा, न कि उसकी उपेक्षा होगी।

2. जेम्स के अनुसार ( According to Jams) - “प्रयोजनवाद मस्तिष्क का स्वभाव तथा मनोवृत्ति है। यह विचारों की प्रकृति एवं सत्य का भी सिद्धान्त है और अपने अंतिम रूप में यह वास्तविकता का सिद्धान्त है।” (Pragmatism is a temper of mind an attitude. It Is also a thing of nature of ideas and truth and finally it is a thing about reality)

3. रॉस के अनुसार ( According to Ross ) - “प्रयोजनवाद एक मानवीय दर्शन है जो यह स्वीकार करता है कि मनुष्य क्रिया की अवधि में अपने मूल्यों का निर्माण करता है और यह स्वीकार करता है कि वास्तविकता सदैव निर्माण की अवस्था में रहती है।” (Pragmatism is essentially a humanistic philosophy, maintain that man creates his own values in course of activity, that reality is still in making and awaits its past of completion from that future)

4. जैम्स प्रैट के अनुसार ( According to Jams Prett ) - “प्रयोजनवाद हमें अर्थ का सिद्धान्त, सत्य का सिद्धान्त, ज्ञान का सिद्धान्त और वास्तविकता का सिद्धान्त देता है।" (Pragmatism offers us a theory of meaning, a theory of truth, a theory of knowledge and a theory of reality.)

5. रोजन के अनुसार ( According to Rosen) - “प्रयोजनवाद के अनुसार सत्य को उसके व्यवहारिक परिणामों द्वारा जाना जा सकता है। इस कारण सत्य निरपेक्ष न होकर व्यक्तिगत या सामाजिक समस्या है।” (Pragmatism states that truth can be known only through its practical consequence and is thus an Individual or social matter rather than an absolute)

वास्तव में देखा जाए तो अर्थ क्रियावाद व्यवहारिकता या क्रिया पर बल देता है।

प्रयोजनवाद की शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Pragmatism in Hindi)

प्रयोजनवादी मानव की शक्ति पर विशेष बल देता है, क्योंकि वह उसके द्वारा अपनी आवश्यकताओं के अनुसार वातावरण बना लेता है। वह सफलतापूर्वक समस्याओं का समाधान करके अपने लिए सुन्दर वातावरण निर्मित कर लेता है। प्रयोजनवाद बहुत्ववाद का समर्थक है। रस्क महोदय ने इस तथ्य पर विचार करते हुए लिखा है- “प्रकृतिवाद प्रत्येक वस्तु को जीवन या (भौतिक तत्व), आदर्शवाद मन या आत्मा मानता है। प्रयोजनवाद बहुत्ववादी है । " प्रयोजनवाद के अनुसार केवल वही वस्तु अथवा विचार ठीक हैं जो हमारे लिए उपयोगी हैं और इसके विपरीत जो वस्तु या विचार हमारे लिए उपयोगी नहीं है वह हमारे लिए व्यर्थ हैं। प्रयोजनवादी व्यवहारिक जीवन से संबंध रखना उचित समझते हैं । ईश्वर, आत्मा, धर्म इत्यादि का व्यवहारिक जीवन से संबंध न होने के कारण इनका कोई महत्व नहीं है। हाँ, यदि व्यवहारिक जीवन में उनकी आवश्यकता अनुभव हो तो वे उन्हें स्वीकार करने में भी नहीं चूकते। कुछ भी हो प्रयोजनवादी आध्यात्मिक तत्वों की उपेक्षा करते हैं।

प्रयोजनवाद की शिक्षा का उद्देश्य न केवल व्यक्ति के जीवन की सफलता है वरन् सामाजिक जीवन की सफलता है इसलिए सभ्यता, व्यवसायिक तथा उदार शिक्षा के मूल्य,सभी उसमें आवश्यक हैं। शिक्षा के उद्देश्यों को निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं। 

1. जीवन का वास्तविक अनुभव प्रदान करना:- यह शिक्षा 'क्रिया के द्वारा सीखने के सिद्धांत' की पोषिका है। यह शिशू को जीवन का वास्तविक अनुभव प्रदान कर व्यवहारिक एवं सक्षम नागरिक बनाना चाहती है।

2. पूर्वाग्रह एवं रूढ़ी से मुक्ति:- नव युगों से परम्पराओं एवं रुढ़ियों का शिकार रहा है। अतः प्रयोजनवादी शिक्षा उसे मुक्ति दिलाकर प्रगति एवं विकास के पथ पर अग्रसर करना चाहती है।

3. गतिशील निर्देशन:- प्रयोजवादयों के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य छात्रों को गतिशील निर्देशन देना है । पर केवल इतना कह देना ही काफी नहीं है। गतिशील निर्देशन की व्याख्या की जानी आवश्यक है।

4. विद्यार्थियों का विकास:- प्रयोकजनवादियों के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य है- विद्यार्थियों का विकास । इस उद्देश्य की दो कारणों से अति कटु आलोचना की गयी है । इस विकास का न तो कोई अंत है। और न कोई लक्ष्य । सिवाय इसके कि विकास का और अधिक विकास हो। दूसरे विकास की दिशा गलत हो सकती है। अतः प्रयोजनवादियों को विकास की दिशा भी स्पष्ट होनी चाहिए थी ।

5. सामाजिक एवं उपयोगी मानव का निर्माण:- इस शिक्षा का दूसरा बडा उद्देश्य है कि सामाजिक एवं मानव का निर्माण । सामाजिक दक्षता एवं नागरिकता के गुणों से मानव को विभूषित करना इस शिक्षा का विशेष उद्देश्य है।

6. मूल्यों एवं आदर्शों के निर्माण करने की क्षमता का विकास :- प्रयोजनवादी दार्शनिकों के अनुसार बालक को स्वयं अपने मूल्यों और आदर्शों का निर्माता होना चाहिए। इस प्रकार प्रयोजनवादी शिक्षा का कोई उद्देश्य हो सकता है। तो वह यह है- बालक को अपने मूल्यों और आदर्शों का निर्माण करने के योग्य बनाना। इस उद्देश्य की प्रप्ति के लिए प्रयोजनवादी उन परिस्थितियों का निर्माण करने में सहायता देती है। 

प्रयोजनवादी पाठ्यक्रम (Pragmatism Curriculum in Hindi)

प्रयोजनवादी पाठ्यक्रम के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं:- (1) उपयोगिता का सिद्धान्त, (2) सानुबंधित का सिद्धांत, (3) बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम, (4) बालक के व्यवसाय, क्रियाओं एवं अनुभव पर आधारित

1. उपयोगिता का सिद्धान्त (Principle of Utility) - प्रयोजनवादियों के अनुसार पाठ्यक्रम में ऐसे नियमों को स्थान देना चाहिए, जो बालकों के भावी जीवन में काम दें और उन्हें ज्ञान तथा सफल जीवन की क्षमता प्रदान करें। इस दृष्टि से उनके अनुसार पाठ्यक्रम में भाषा, स्वास्थ्य विज्ञान, शारीरिक प्रशिक्षण, इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान-बालिकाओं को गृह-विज्ञान आदि विषयों को स्थान देना चाहिए, जो कि मानव प्रगति में सहायक हों। 

2. सानुबंधित का सिद्धांत (Principle of Integration) - प्रयोजनवादियों का विचार है कि जो विषय पाठ्यक्रम में निर्धारित किए जायें उन सबमें आपस में संबंध होना चाहिए, क्योंकि ज्ञान का पृथक-पृथक विभाजन नहीं होता। उनका विचार है कि बालकों को समस्त विषय एक-दूसरे से संबंधित कर पढ़ाने चाहिए, जिससे न केवल बालकों का ज्ञान प्राप्त करना सार्थक हो वरन् शिक्षकों को पढ़ाने में भी सुविधा हो ।

3. बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम (Child-Centered Curriculum) - प्रयोजनवादियों का विचार है। कि पाठ्यक्रम का संगठन इस प्रकार करना चाहिए कि उसमें बालक की प्राकृतिक अभिरूचियों का पूर्ण स्थान हो । बालक की ये अभिरूचियाँ मुख्य रूप से चार हैं-1. बातचीत करना, 2. खोज करना, 3. कलात्मक अभिव्यक्ति एवं 4. रचनात्मक कार्य करना । इस दृष्टि से पाठ्यक्रम में लिखने, पढ़ने, गिनने, प्रकृति विज्ञान, हस्तकार्य एवं ड्राइंग का अध्ययन करने के साधनों को स्थान मिलना चाहिए।

4. बालक के व्यवसाय, क्रियाओं एवं अनुभव पर आधारित (On the base of Child's Occupation Activities and Experience ) - प्रयोजनवादियों का विचार है कि पाठ्यक्रम का संगठन बालक के व्यवसायों एवं अनुभव पर आधारित होना चाहिए। उनका

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