राजनीतिक सिद्धांत के पतन पर संक्षेप में एक लेख लिखिए।

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राजनीतिक सिद्धांत के पतन पर संक्षेप में एक लेख लिखिए।

राजनीतिक सिद्धांत का पतन

किसी भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल के न होने के कारण, डेविड ईस्टन के अनुसार - राजनीतिक सिद्धान्तों का पतन हो रहा है।

डेविड ईस्टन के अनुसार, “समसामयिक राजनीतिक विचार एक शताब्दी पुराने विचारों पर परजीवी के रूप में जीवित हैं और सबसे बड़ी हतोत्साही बात यह है कि हम नये राजनीतिक संश्लेषणों के विकास की कोई सम्भावना नहीं देखते हैं।"

राजनीतिक सिद्धांत के पतन का कारण इस विषय को इतिहास के अध्ययन से ढूँढा जा सकता है।

जी० एच० सेबाइन, डनिंग, ऐलन आदि लेखकों की रचनाओं से पता चलता है, इन्हें नये मूल्य सिद्धांत के विश्लेषण और निर्माण करने में रुचि की अपेक्षा पुराने राजनीतिक मूल्यों के ऐतिहासिक विकास एवं आन्तरिक संगतता व अभिप्राय के बारे में जानकारी को बनाये रखने के विचार से प्रेरणा मिलती है।

ईस्टन के अनुसार, इतिहासकारों की प्रवृत्ति में गतिशीलता का अभाव है। ईस्टन ने राजनीतिक हास सम्बन्धी वाद-विवाद का आरम्भ किया था।

कोबां नीको के अनुसार समसामयिक राजनीतिक सिद्धांत प्रगतिशील विज्ञान नहीं है। यह अपने आपको नई परिस्थितियों के प्रकाश में सुधार नहीं पाया है। यह एक घिसा हुआ सिक्का लगता है जिसको फिर से ढाले जाने की आवश्यकता है।

कोबां ने कहा कि राजनीतिक सिद्धांत सक्रिय राजनीतिक जीवन की उपज है।

लोकतान्त्रिक प्रणाली की सफलता को एक विशेष अर्थ में राजनीतिक सिद्धांत के ह्रास के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

कुछ महान् लेखकों और सिद्धांतशास्त्रियों की ऐसी सनक है जिसके द्वारा वह राज्य को सत्ता के रूप में देखते हैं।

कोबां भी अपने ध्येय के लिये इतिहासवाद की आलोचना करता है।

कोबां इस बात की ओर संकेत करता है कि समसामयिक राजनीतिक सिद्धांत में दिशा के भाव का अभाव है, इसमें ध्येय की कोई भावना नहीं है।

संक्षेप में कहा जा सकता है राजनीतिक सिद्धांत के पतन के निम्न कारण हैं - 

  1. वैज्ञानिक राजनीति सिद्धांत की अवधारणा अस्पष्ट थी।
  2. राजनीति विज्ञान की अभी तक प्राप्त सामग्री का विभिन्न संस्कृतियों से प्रभावित होना।
  3. राजनीति विज्ञान में राजनीतिज्ञों की रुचि का अभाव।
  4. राजनीति वैज्ञानिक राजनीति से जुड़ी समस्याओं से ही अनभिज्ञ थे।
  5. राजनीति के प्रत्यक्ष ज्ञान से राजनीति वैज्ञानिक अपरिचित थे।
  6. राज्य के शासकों या सत्ताधारी तन्त्र या सामाजिक वैज्ञानिकों द्वारा राज सिद्धांत के निर्माण के लिये राजनीति वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित न करना।
  7. परंपरागत राजनीतिक सिद्धान्तों को प्रतिपादक विचारकों दार्शनिकों में आधुनिक युग की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप नवीन सिद्धांत निर्माण के प्रति रुचि प्रवृत्ति का अभाव। 

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