डेविड ईस्टन के आधुनिक राजनीतिक के निर्माण सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।

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डेविड ईस्टन के आधुनिक राजनीतिक के निर्माण सम्बन्धी विचारों का उल्लेख कीजिए।

  1. अथवा डेविड ईस्टन का आगत-निर्गत सिद्धांत।

डेविड ईस्टन के आधुनिक राजनीति के निर्माण सम्बन्धी विचार 

  1. डेविड ईस्टन ने राजनीतिक इकाइयों तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं दोनों के सम्बन्ध में विचार व्यक्त किए हैं।
  2. ईस्टन राजनीतिक सिद्धांत की अवधारणा का वर्णन करते हुए ये विचार व्यक्त किए हैं। "सिद्धांत सम्वर्गों का प्रखर, आनुभाविक, संगितपूर्ण तथा तर्कपूर्ण एकीकृत समुच्चय है। यह राजनीतिक जीवन का विश्लेषण राजनीतिक व्यवहार की व्यवस्था के रूप में करना चाहता है।"
  3. ईस्टन ने अपने सिद्धांत में नैतिकता तथा मूल्यों को भी स्थान दिया है। जिसके कारण उसके सिद्धांत की वैज्ञानिकता पर प्रश्न चिह लग गया है।
  4. राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकता के सम्बन्ध में ईस्टन का कथन है, "राजनीतिक विज्ञान का भविष्य, उसके भविष्य निर्देशन व सामंजस्य की समस्या का समाधान राजनीतिक सिद्धांत द्वारा ही सम्भव है। एक ऐसा सामान्य सिद्धांत निर्मित किया जाए जो अनुशासन के रूप में राजनीतिक विज्ञान के सम्पूर्ण विषय-क्षेत्र को दिशा-निर्देश, सामंजस्य तथा व्यवस्था प्रदान कर सके।"
  5. ईस्टन ने अवधारणात्मक विचार बंध के सम्बन्ध में लिखा है कि, "जिन बन्धों का उद्देश्य सिद्धांतों का समुचित रूप में निर्माण करना होता है वे संरचनात्मक होते हैं। ये सभी अपने-अपने दृष्टिकोण से विषय-सामग्री का उल्लेख करते हैं। विषय-सामग्री के चयन में सभी प्रकार की परियोजनाओं को स्थान दिया जाना चाहिए।"
  6. ईस्टन ने लिखा है कि आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में विचार बंध भी आवश्यक है, क्योंकि बिना इसके कोई भी अनुसन्धान पूर्ण नहीं होगा। उनका कहना है कि विचार बंध एक प्रकार की विश्लेषण योजना के रूप में मानी जाती है। साथ ही इन विचारबंधों के द्वारा राजनीति तथा उससे सम्बन्धित विषयों के पारस्परिक सम्बन्धों को व्यक्त करने में भी सहायता मिलती है।
  7. डेविड ईस्टन ने राजनीतिक सिद्धांत के अवधारणात्मक विचारबंध के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट किए हैं। उन्होंने राजनीति की अपनी अलग से परिभाषा लिखी है, “राजनीति से अभिप्राय है, समाज के लिए मूल्यों के प्रावधान के विषय में समस्त गतिविधियाँ ।'

मीहान ने लिखा है, “पारसन्स की भांति ईस्टन सिद्धांत को व्याख्या की शब्दावली में नहीं वरन् अवधारणात्मक विचारबंध के अर्थों में सोचता है। इसका परिणाम एक ऐसी अमूर्त रचना है जो कि तार्किक दृष्टि से सन्देहास्पद, अवधारणात्मक आधार पर धूमिल तथा अनुभव के बिन्दु से अनुपयोगी है।" 

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