महेस पांडे का चरित्र चित्रण - Mahesh Pande Ka Charitra Chitran

महेस पांडे का चरित्र चित्रण - महेस पांडे कमलेश्वर द्वारा रचित 'नीली झील' कहानी का मुख्य पात्र एवं नायक है। वह मध्यम वर्ग से संबंध रखता है और परिश्रम क

महेस पांडे का चरित्र चित्रण - Mahesh Pande Ka Charitra Chitran

महेस पांडे का चरित्र चित्रण - महेस पांडे कमलेश्वर द्वारा रचित 'नीली झील' कहानी का मुख्य पात्र एवं नायक है। वह मध्यम वर्ग से संबंध रखता है और परिश्रम कर रोजी रोटी कमाता है। वह अपने से अधिक आयु वाली धनवान विधवा पंडिताइन से विवाह करता है और काम करना छोड़ देता है। वह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता है इसीलिए वह उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए इच्छानुसार मंदिर एवं धर्मशाला बनवाने के लिए पैसे एकत्रित करता है पर पक्षियों के प्रति मोह होने के कारण वह पक्षियों की आवास स्थली 'नीली झील खरीद लेता है ताकि वह पक्षियों को सुरक्षा दे सके और उनकी खत्म होती हुई नस्ल को बचाया जा सके। वह समाज में एक नया आदर्श स्थापित करता है। पूरी कहानी महेसा के इर्द-गिर्द घूमती है उसके व्यक्तित्व में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती है-

स्वाभिमानी : महेस स्वाभिमानी व्यक्तित्व का स्वामी है। वह शिकार के लिए आए अंग्रेजों के साथ आई स्त्रियों की सहायतार्थ आगे आता है। लेकिन जब नीली साड़ी वाली स्त्री कहती है कि क्या कोई मज़दूर मिल सकता है? तो वह ठसक से कहता है, "हम लोग सरकारी गैंग के आदमी हैं। उसके इन शब्दों से स्पष्ट पता चलता है कि वह अपने को मज़दूर न मान कर सरकारी व्यक्ति मानता है जिसमें उसके स्वाभिमानी व्यक्तित्व के दर्शन होते है।

सैलानी स्त्रियों के प्रति विशेष आसक्ति

महेस सैलानी स्त्रियों को देख फौरन उनकी तरफ आकर्षित हो जाता है वह काम करते हुए भी चोर निगाह से उनसे आँखें मिलाने की कोशिश करता है और जब नीली साड़ी वाली स्त्री उससे मदद मांगती है तो वह झट से उसका समान उठा लेता है और उसकी सुकुमरता को देखते हुए उससे पानी वाली बोतल भी माँग लेता है। वह इन शहरी स्त्रियों के प्रति विशेष रूप से आसक्त होता है। इसलिए वह अपने आप को रोक नहीं पाता। उसे उनके साथ बातें करने में विशेष आनन्द की अनुभूति होती थी जैसे कि प्रस्तुत शब्दों से स्पष्ट हो जाता है, "पर अब भी, जब वह सैलानी लोगों को झील की ओर जाते देखता और उनके साथ कोई सुन्दर औरत होती, तो वह अपने को रोक न पाता, पीछे-पीछे चला ही जाता और चाहता कि वह औरत उससे बात करे। उसके हृदय में यह नारी आकर्षण इतना बना रहता है कि वह सारा-सारा दिन उनके पीछे घूमता रहता था। उसके देर से घर आने पर पार्वती भी उससे कई प्रकार के प्रश्न करती है पर वह काम का बहाना कर जाता है।

परंपराओं को तोड़ने वाला: 

महेस निडर स्वभाव एवं परंपराओं की परवाह न करने वाले नायक हैं। समाज में मान्यता है कि बड़ी उम्र का लड़का अपने से छोटी उम्र की लड़की से ही विवाह करता है और विधवा का विवाह विधुर से एवं अविवाहित का विवाह अविवाहित से होता है परन्तु महेस इन सब परंपराओं के बंधन को तोड़कर अपने से बड़ी एवं विधवा पारवती से विवाह करवाता है कहानी के प्रस्तुत शब्दों से स्पष्ट हो जाता है "यों पार्वती से दस साल छोटा था महेस, पर पार्वती की मौत के बाद वह उससे दस बरस बड़ा लगने लगा।" परंपरा के अनुसार सभी व्यक्ति अच्छे कर्म करते हैं जैसे मंदिर का निर्माण, धर्मशाला इत्यादि बनवाना । महेस की पत्नी भी अच्छे कर्म करने के लिए मंदिर एवं धर्मशाला का निर्माण करवाना चाहती थी परन्तु महेस इन सब की परवाह न करते हुए, मंदिर एवं धर्मशाला के लिए एकत्रित किए पैसो से नीली झील को खरीद लेता है। कहानी के प्रस्तुत शब्दों से स्पष्ट हो जाता है, "पार्वती की याद उसे फिर आई और नीलामी वाले दिन उसने तीन हज़ार की बोली लगाकर चबूतरे के पासवाली जमीन नहीं, दलदली नीली झील खरीद ली।" और वह पक्षियों के लिए मंदिर तथा धर्मशाला निर्माण को भी तिलांजलि दे देता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि महेस परंपरा की लीक पर चलने वाला नहीं था वह वही करता था जो उसे पसंद था। वह परंपराओं की परवाह नहीं करता है।

लापरवाह:  वह लापरवाह स्वभाव का मालिक है वह किसी की बात की तरफ ध्यान नहीं देता है उसे जो अच्छा लगता है वह वही करता है वह अंग्रेज औरतों के पीछे जाता है। दूसरे मजदूरों द्वारा उसे भला बुरा कहने पर भी वह उनकी परवाह किए बिना स्त्रियों की मदद करने जाता है। पंडिताइन से विवाह कर लेने पर लोग तरह-तरह की बातें करते हैं पर वह परवाह नहीं करता है। पूरी कहानी में वह पंडिताइन की देख-रेख और उसके प्रेम में इतना भावविभोर रहता है। ऐसा लगता है कि उसे किसी से कोई मतलब नहीं है। वह सिर्फ उसके साथ जीना चाहता है। कहानी के निम्न वाक्यों से स्पष्ट हो जाता है, "किसी का कहना था कि जवान देखकर पण्डिताइन ने फांस लिया और कोई कहता था कि महेस रूपया पैसा देखकर ढरक गया" लेकिन महेस ने किसी की परवाह नहीं की ।

अंत में पंडिताइन की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए मंदिर एवं धर्मशाला बनाने के लिए लोगों से पैसे तो एकत्रित करता है परन्तु उन पैसों से वह झील को खरीद लेता है। लोगों द्वारा उसे धोखेबाज इत्यादि नामों से सम्बोधित किया जाता है लेकिन वह किसी को कोई उत्तर न देकर अपने में मस्त रहता है।

आदर्श प्रेमी: वह अपनी पत्नी पार्वती से प्रेम करता है उसके कहने पर कलमें बड़ी करवा लेता है, चोटी में मोटी गांठ बांधता है एवं मेले में जाने के लिए बैलों की एक गोई और छोटा सा रब्बा भी खरीद लेता है ताकि अपनी पत्नी को शान से मेले में लेजाए और उसकी सुख-सुविधा का भी ध्यान रखता था । महेस जब भी हाफिज़ जी की दुकान पर जाता था तो पार्वती के लिए कुछ-न-कुछ लेकर ही जाता था जैसे कि पार्वती को फोटो फ्रेम दिखाते हुए महेस कहता है "इसमें मियां बीवी की तस्वीर लगती है। बड़े घरों में लोग इसे रखते हैं। तीसरे ही दिन उसने पार्वती को तैयार कराया, सारे गहने उसे पहनने को मज़बूर किया और खूब तेल लगाकर रामा फोटोग्राफर की दुकान पर जा पहुँचा और फोटो को फ्रेम में लगाकर वह ऐसे स्थान पर लगाता है जहाँ घर आते-जाते अपनी पत्नी को देख सके ।

वह अंत तक स्वीकार करता है कि जैसा उसका ख्याल पारबती रख सकती है वैसा कोई अन्य नहीं रख सकता है उसके स्वयं के शब्दों में, "पार्वती के बराबर कोई मेरा ख्याल करे तो सोचू. भी..... नहीं, तो भी न सोचूं । गलत बात बोल गया। ..... बेकार का मखौल मत किया करो। अब बूढ़ा हो चला ।" पत्नी की मृत्यु के बाद वह दूसरा विवाह करवाने की मनाही कर देता है और उसके विरह का प्रभाव उसके शरीर पर दिखाई देने लगता है। वह कुछ ही समय में बूढ़ा दिखाई देने लगता है।

महेस की पत्नी पार्वती अपने पैसे से मंदिर और धर्मशाला बनवाना चाहती थी वह महेस को कहती है कि तुम मंदिर एवं धर्मशाला बनवाने के लिए पैसे और मिस्त्री का प्रबंध करो। फिर वह साथ वाली ज़मीन खरीदने के लिए कहती है ताकि वहां पर धर्मशाला बनाई जा सके। जिससे धर्म कर्म का कार्य हो जाएगा। पार्वती की मृत्यु के पश्चात्म हेस के जीवन में एक ही लक्ष्य रहता है कि पत्नी की इच्छानुसार मंदिर और धर्मशाला का निर्माण करना। वह लोगों से पैसे इकट्ठे करना शुरू कर देता है। महेस के स्वयं के शब्दों से स्पष्ट हो जाता है, "बस, यही एक काम करना है हाफिज़ जी! किसी तरह मन्दिर और एक छोटी-सी धरमशाला बन जाए, तो मन को शान्ति मिले। पार्वती यही कहती - कहती मरी थी।"

परिवर्तनशील हृदय: महेस का हृदय परिवर्तनशील है। पत्नी पार्वती के कहने पर भी वह किसी को उधार दिए पैसे वसूलने नहीं जाता। पत्नी की मृत्यु उसे झकझोर कर रख देती है वह उसकी इच्छा को पूर्ण करने के लिए लोगों को उधार दिए पैसे वसूलने जाता है और वह इतना ज्यादा कठोर बन जाता है कि किसी के दुःख दर्द को भी नहीं समझता है। जगन नाई के घर पर पैसे के लिए महेस धरना लगा कर बैठ जाता है तो उसकी औरत के शब्दों में महेस की कठोरता के दर्शन होते है जो इस प्रकार बोलती है, "पण्डित, तुम तो इतने जालिम हो कि किसी की पत नहीं देखते....... पार्वती चाची मुँह से चाहे जितना बिगड़े पर आदमी की मरजाद और इज्जत का तो ख्याल करती थी......।

उसके इस परिवर्तित व्यवहार को देखकर लोग तब आराम की सांस लेते हैं जब वह कुछ दिनों के लिए पत्थर देखने बाहर चला जाता है।

संवेदनशील: महेस एक संवेदनशील व्यक्ति है वह अपनी पत्नी तथा पक्षियों की चीखों से उदास असंवेदित हो जाता है। पार्वती को अस्पताल में दर्द से कराहते नहीं देख पाता है जब पार्वती अपने अंतिम समय में महेसा को कहती है कि मंदिर जरूर बनवा देना तो महेसा की स्थिति प्रस्तुत शब्दों से स्पष्ट हो जाती है, 'मन्दिर! सोचकर ही महेसा का कलेजा फट गया था। आखिरी आस थी उसे, चीखकर बोला था, ऐसा मत कहो पार्वती ! बच्चा मर गया तो क्या हुआ, तू तो जीती-जागती है।"

पार्वती अंतिम समय में आंसू बहा रही थी जो महेस से देखे नहीं जाते है। पार्वती की मृत्यु का दुःख उसे अंदर से झकझोर देता है और लोगों द्वारा उसकी स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया जाता है, बस्ती के आदमियों का यही कहना था कि महेस पगला गया। जो आदमी आदमी का ख्याल नहीं करता, वह पागल नहीं तो और क्या है ? आदमी के दुःख-दर्द को जो नहीं समझता, उसे और क्या कहा जाए ? महेस, वह मुक्त और निश्चित महेस, एकदम बदल गया था।" उसके संवेदनशील स्वभाव का पता तब भी चलता है जब वह पक्षियों का शिकार होते हुए देखकर द्रवित होता है उसे सैलानियों का आना भी अच्छा नहीं लगता है उनके कंधे पर बंदूक देखकर वह उन्मत हो जाता है।

अंग्रजों द्वारा घायल पक्षी की चीखों में उसे पारबती की चीखें सुनाई देती हैं उसके स्वयं के शब्दों में, झील पर शिकार खेलने के लिए आदमियों की बहुत-सी टोलियां इस बीच आई और गई, और अपने घर पर बैठे या बस्ती में घूमते हुए उसने जब-जब चीत्कार सुने और साहब शिकारियों को नरम परवाली चिड़ियों को लटकाए ले जाते देखा, तब-तब उसे पार्वती की याद आई बेतरह । उसकी हालत भी तो उस सारस के जोड़े की तरह ही थी.......

पक्षी - प्रेमी: पूरी कहानी महेस के पक्षी प्रेम और पर्यावरण सुरक्षा के कथ्य को लेकर रची गई है। उसका पक्षी प्रेम देखते ही बनता है। घायल पक्षी को देखकर उसके आंसू आ जाते हैं। उसे पक्षियों के बोलने से ही उनकी खुशी, डर और सहम जाने का पता चल जाता है। वह पक्षियों के संबंध में प्रत्येक प्रकार का ज्ञान रखता है उसे झील पर आने वाले प्रत्येक पक्षी का ज्ञान है। सैलानी जब चिड़िया को देख सांप बोलते हैं तो महेसा हँस पड़ता है और उनको इस प्रकार जवाब देता है, "सभी कौतूहल से देखने लगे । महेसा खिलखिलाकर हंस पड़ा। कैसे समझाए इन साहबों को, वे इतना भी नहीं जानते! वह सिर्फ नीली साड़ी वाली को ही बताना चाहता था। एकदम बोला, पनिया सांप नहीं है, एक चिड़िया है वह । "

महेस को इस बात का भी ज्ञान है कि कौन सी चिड़िया कब झील पर आती है और कब वापिस जाती है जब पार्वती कहती है कि आजकल मैं नई-नई चिड़िया देखती हूँ वह पता नहीं कहाँ से आ जाती है तो महेस के उत्तर से उसके पक्षी ज्ञान का प्रमाण मिल जाता है, "ये चिड़िया मेहमान हैं ..... कार्तिक खतम होते आती है और फागुन- चैत तक चली जाती है।" उसे केवल पक्षियों की ही नहीं उनके अण्डों का भी ज्ञान है। उनकी देखभाल कैसे की जाए वह इसका भी ज्ञान रखता है। उसे हर एक पक्षी के अण्डे की पहचान है वह पार्वती को पक्षियों के अण्डे दिखाते हुए इस तरह बता रहा है, "देख पार्वती, यह वाक का अण्डा है, यह सारस का और यह सोना - पतारी का ! महेस एक-एक अण्डा उठाकर दिखाने लगा । "

मौसमानुसार कब पक्षी आते हैं और कब जाते हैं। उसके इस कथन से पता चलता है- 'फागुन आते-आते मेहमान पक्षी उड़ गए सवनहंस चले गए, सफेद सुरखाब अपने पुराने घरों में लौट गए। सुअर, संद, करकर्रा और सरप - पच्छी भी चले गए ।.... झील बहुत सूनी हो गई थी, पर महेस पांडे को विश्वास था कि ये फिर हमेशा की तरफ अपने झुण्डों के साथ कातिक- अगहन तक वापस आएंगे।" उसे मौसम आने पर पक्षियों के आने की प्रतीक्षा रहती है इसलिए वह दिन में झील के दो-दो चक्कर लगाता है। सैलानी जब पक्षियों का शिकार करने आते हैं तो उनकी सुरक्षा के लिए झील ही खरीद लेता है और झील बाहर पेड़ पर बोर्ड लगवाता है जिस पर लिखवा देता है, "यहां शिकार करना मना है और नीचे की पंक्ति थी, दस्तखत नीली झील का मालिक, महेस पांडे । इस प्रकार उसको पक्षियों के संबंध में सम्पूर्ण ज्ञान था ।

मार्गदर्शक : पूरी कहानी में वह मार्गदर्शक के रूप में दिखाई देता है वह बाहर से आए सैलानियों को मार्ग दिखाते हुए झील तक छोड़ने जाता है वह नीली साड़ी वाली औरत के साथ आए सभी सैलानियों के साथ-साथ चलता है परन्तु जब वह गलत रास्ते पर जाने लगते हैं तो महेसा उन्हें इस प्रकार सही रास्ता दिखाता है, ... उसे बोलने का फिर मौका मिला, गलत रास्ते पर मुड़ते देख वह लपककर नीली साड़ी वाली के पास पहुँचा और एकदम उनके अज्ञान पर जैसे चीख पड़ा, आप लोगों को रास्ता नहीं मालूम, हमारे साथ आइए। इधर से दलदल पड़ेगा ।"

वह एक अच्छे मार्गदर्शक की तरह उन्हें सही रास्ते का ज्ञान तो देता ही है उसके साथ ही झील की प्रकृति और हर मौसम में आने-जाने वाले पक्षियों का परिचय भी करवाता है। उसे जब पता चलता है कि सैलानी आए हैं

अंततः कहा जा सकता है कि महेसा पक्षी प्रेमी, पत्नी प्रेमी, स्वाभिमानी, संवेदनशील इत्यादि विशेषताओं से युक्त है वह पार्वती और अपने बच्चे की रक्षा करने में असमर्थ रहता है परन्तु पक्षियों की रक्षा के लिए झील को ही खरीद लेता है। वह अपने आप में मस्त रहता है। वह किसी की परवाह न कर स्वयं को अच्छे लगने वाले कार्य करता है। उसे उम्मीद है कि कातिक तक वह पक्षी पुनः झील पर आएंगे क्योंकि फागुन आने के कारण वह मेहमान पक्षी वापिस लौट गए थे।

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महेस पांडे का चरित्र चित्रण - Mahesh Pande Ka Charitra Chitran
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