राजा निरबंसिया कहानी की मूल संवेदना - Raja Nirbansiya Kahani ki Mool Samvedna

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राजा निरबंसिया कहानी की मूल संवेदना

'राजा निरबंसिया' कहानी में दो कहानियां साथ-साथ चलती है एक पौराणिक कथा जिसमें राजा निरबंसिया और रानी लक्ष्मी की कहानी थी। दूसरी आधुनिक कथा जो जगपती और चन्दा से संबंधित है।

इस कहानी में कमलेश्वर ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि अर्थ प्रधान इस युग में अर्थ के मोह के कारण जगपती किस प्रकार अपनी पत्नी के शरीर की बिक्री करता है । वह व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किसी भी मूल्य को त्यागने के लिए तैयार है। इस मानसिकता का शिकार चंदा होती है वह किसी भी स्तर पर स्त्री के पत्नीत्व को सुरक्षित रखने का प्रयत्न नहीं करता। 

राजा निरबंसिया कहानी की मूल संवेदना को निम्नलिखित बिन्दुओं से जाना जा सकता है-

1. कर्जदार व्यक्ति की मनः स्थिति का यथार्थाकन

इस कहानी के माध्यम से कर्जदार व्यक्ति की परिणति का वर्णन किया है। आज भी बैंक आदि लोन की सुविधा देकर लोगों को कर्ज़दार बनाते हैं फिर उसका सारा जीवन इस कर्ज को चुकाने में ही निकल जाता है और अगर वह नहीं चुका पाता तो उनकी सारी संपत्ति पर बैंक का अधिकार हो जाता है और उस समय ऋणी व्यक्ति अपने आप को इतना विवश मानता है कि वह आत्महत्या करना ही श्रेष्ठ समझता है। इस कहानी में जगपती पहले तो एक वकील के पास मुहर्रिर था पर दुर्घटना के बाद जब वह बेरोज़गार हो जाता है। अपने घायल होने पर वह बचन सिंह से कर्ज़ लेने के लिए चंदा को मना करता है। उसे कर्ज़ से सख्त नफरत है। वह चंदा से कहता है- "तुम नहीं जानती कर्ज़ कोढ़ का रोग होता है। एक बार लगने से तन भी गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है।" पर कर्ज़ के इस सैद्धान्तिक विरोध के मूल में जगपती का कोई आदर्श टिक नहीं पाता और वह अपनी बेरोज़गारी दूर करने के लिए बचन सिंह से उधार लेता है। पर उसके पास चन्दा के सिवा कोई दूसरी पूंजी नहीं है। इसलिए वह चंदा को संकेत से कहता भी है वह तो अपना ही आदमी है और आड़े वक्त काम आने वाला आदमी है ... जिससे कुछ लिया जाएगा, उसे दिया भी तो जाएगा।" अब रोजगार के लिए वह बचन सिंह से कुछ रूपये कर्ज लेता है और उस कर्ज़ के बदले बचन सिंह उसकी पत्नी से संबंध बनाता है। जगपती जानता है उधार की पूंजी चंदा के शरीर से वसूल होने वाली है- फिर भी वह चुप रहता है। वह प्रत्यक्षता इस को सहन नहीं कर पाता क्योंकि जब वह बचन सिंह की उपस्थिति घर में देखता है, अजीब सी घुटन उसके दिल को बांध लेती है और जीवन की तमाम विषमताएं भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगती है। कई बार उसे यह भी लगता है कि इतने बड़े सौदे की क्या सचमुच आवश्यकता थी। पर यह सौदा किस लिए यह सोच उसकी आत्मा में एक नासूर सा बन जाता है। बचन सिंह के सामने उसका अस्तित्व उसे डूबता हुआ लगता है क्योंकि वह जानता है कि अपने काम के लिए उसने अपने परिवार को ही दाव पर लगा दिया है। रचनाकार ने उसकी विवशता को स्पष्ट करते हुए लिखा है "पता नहीं कौन-कौन से दर्द एक दूसरे मिलकर तरह-तरह की टीस - चटख और ऐंठन पैदा करने लगते।" इससे स्पष्ट है कि कर्ज़ का विरोध करने वाला जगपती हर तरह से कर्ज़ में दब गया। तन से, मन से, इज्जत से वह अपने घर के तिनके - तिनके को बिखरते हुए अपनी आंखों से देखता है। पत्नी के मायके चले जाने पर वह निरन्तर कर्ज़ और पत्नी के संबंध में सोचता रहता है और व्यथित होता है जैसे कि निम्न पंक्तियों से पता चलता है, "करीब के खेत ही मेड़ पर बैठे जगपती का शरीर भी जैसे कांप—कांप उठता। चन्दा ने कहा था, लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया......क्या वह ठीक कहती थी। क्या बचन सिंह ने टाल के लिए जो रूपये दिए थे, उसका ब्याज इस तरह चुकता हुआ ? क्या सिर्फ वही रूपये आग बन गए, जिसकी आंच में उसकी सहनशीलता, विश्वास और आदर्श मोम से पिघल गए ?" उसे बार-बार महसूस होता है कि चंदा की बर्बादी के लिए वह खुद जिम्मेदार है। चंदा के चले जाने पर उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस 'काम' और 'अर्थ' के लिए उसने चंदा का प्रयोग किया। वह सब निरर्थक है। वह बार- बार सोचता है - " कितने बड़े पाप में ढकेल दिया चंदा को... वह ज़रूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया । "

जब जगपती को पता चलता है कि चन्दा के लड़का हुआ है और वह दूसरा विवाह करने लगी है तो वह अंदर ही अंदर और कुढ़ता है एवं स्वयं को दोषी मानता हुआ कहता है कि मैंने ही चन्दा को यह सब करने के लिए विवश किया। प्रस्तुत शब्दों में जगपती की मनःस्थिति स्पष्ट है, 'चन्दा के लड़का हुआ है ..... वह कुछ और जनती, आदमी का बच्चा न जनती..... वह और कुछ भी जनती, कंकड़-पत्थर ! वह नारी न बनती बच्ची ही बनी रहती, उस रात की शिशु चन्दा!” अब वह इस बात से भी नफ़रत करता है कि चंदा ने बचन सिंह के बेटे को जन्म दिया है वह इस बात को स्वीकार नहीं करता। इसलिए कहता है चंदा शिशु ही बनी रहती तो यह सब संकट नहीं आते। मैंने उसकी जवानी को देखकर उसका शरीर बेच दिया है वह चंदा के अभाव में अपने आप को अधूरा मानता है। और तब शकूरे के वे शब्द उसके कानों में गूंज गए, "हरा होने से क्या, उखड़ तो गया है वह स्वयं भी तो एक उखड़ा हुआ पेड़ है, न फल का, न फूल का, सब व्यर्थ ही तो है।" वह इतना पश्चाताप करता है कि उसे सब कुछ खोखलापन लगता है। अब मृत्यु के सिवा दूसरा कोई पर्याय उसके सम्मुख नहीं है इसलिए वह आत्महत्या का निर्णय लेता है। मरते समय उसके द्वारा लिखे गये पत्र उसकी मानसिक यातना को स्पष्ट करते हैं। उसने चंदा को लिखा- "आदमी को पाप नहीं पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था।" इस एक वाक्य से उसका सारा पश्चाताप सामने आ जाता है। इससे पता चलता है कि जगपती के भीतर का 'आदमी' तो उसी दिन मर गया था जिस दिन उसने चंदा को कर्ज़ चुकाने का माध्यम माना था।

इस प्रकार रचनाकार ने एक कर्ज़दार व्यक्ति की आर्थिक दुरावस्था, उसकी विवशता, उसके संघर्ष, छटपटाहट और स्वयं ही स्वयं के मूल्य रौंदने की पीड़ा का सटीक वर्णन किया है।

2. संतानहीन व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का वर्णन

रचनाकार ने समाज में संतानहीन व्यक्ति के सामाजिक स्तर पर भी प्रकाश डाला है कि संतान न होने पर लोग कैसे-कैसे प्रताड़ित करते हैं। समाज में उसका मुंह देखना भी अशुभ माना जाता है। कहानी में राजा निरबंसिया संतानहीन होने पर जब मेहतरानी सुबह - सुबह उसका मुंह देख लेती है तो वह पीटना शुरू कर देती है कि हाये राम आज राजा का मुंह देख लिया पता नहीं खाना नसीब होगा या नहीं। इस से राजा इतना व्यथित होता है कि वह घर छोड़कर ही चला जाता है।

इसी तरह जब जगपती अस्पताल से घर लौटता है तो उसकी चाची भी उस पर व्यंग्य कसती हुई उसे 'राजा निरबंसिया' नाम से संबोधित करती है जैसे कि प्रस्तुत शब्दों से पता चलता है, "जब जगपती के घर का दरवाजा खड़का, तो अंधेरे में उसकी चाची ने अपने जंगले से देखा और वहीं से बैठे-बैठे अपने घर के भीतर ऐलान कर दिया - राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए.....कुलमा भी आई है।" कहानीकार ने संतानहीन दंपति की उस स्थिति का वर्णन किया है जब स्वयं तो उन्हें संतानहीनता का आन्तरिक दुःख एवं पीड़ा है ही पर दूसरे लोग कैसे उन्हें शब्द बाणों से बेधते हैं।

3. रोगी की मनोवृति का चित्रण

रचनाकार ने रोगी व्यक्ति की उस मनोवृत्ति का वर्णन किया है जब उसके पास धन न होने के कारण दूसरों के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं। जिंदगी का मोह तो हर व्यक्ति को होता है और अच्छे स्वास्थ्य के लिए दवाओं की आवश्यकता भी होती है और जब पैसा न हो तो व्यवस्था कैसे हो। यह प्रश्न भी रोगी को विचलित करते हैं। जगपती को अस्पताल में पड़े जब कई दिन हो गये। जगपती भी चाहता है कि जल्दी ठीक हो जाए चंदा बताती है कि कम्पाउंडर साहब दवाईयों की बात कर रहे थे पर वह यह नहीं चाहता कि उधार खाने से उसका इलाज हो। इसलिए वह कहता है- "नहीं चंदा उधार खाने से मेरा इलाज नहीं होगा चाहे ... चाहे एक के चार दिन लग जाएं।" पर चंदा की कुर्बानी से तीसरे दिन दवाईयां आ जाती हैं। उस समय उसकी प्रतिक्रिया क्या थी निम्न पंक्तियों से स्पष्ट है-

"और तीसरे रोज़ जगपती के सिरहाने कई ताकत की दवाईयां रखी थीं और चन्दा की ठहरनेवाली कोठरी मैं उसके लेटने के लिए एक खाट भी पहुँच गई थी। चन्दा जब आई, तो जगपती के चेहरे पर मानसिक पीड़ा की असंख्य रेखाएं उभरी थी, जैसे वह अपनी बीमारी से लड़ने के अलावा स्वयं अपनी आत्मा से भी लड़ रहा हो..... चन्दा की नादानी और स्नेह से भी उलझ रहा हो और सबसे ऊपर सहायता करने वाले की दया से जूझ रहा हो।" फिर न तो वह अच्छी दवाईयों का विरोध करता है और न बचन सिंह की दया का । ठीक होकर जब वह घर आ जाता है तो चन्दा के सिरहाने सोने के कड़े देखता है तो वह अंदर से पूरी तरह से टूट जाता है और सोचता है कि चन्दा ने उससे झूठ क्यों बोला जो कि प्रस्तुत शब्दों से पता चलता है, 'चन्दा झूठ बोली ! पर क्यों ? कड़े आज तक छुपाए रही। उसने इतना बड़ा दुराव क्यों किया ? आखिर क्यों ? किसलिए ? और जगपती का दिल भारी हो गया। उसे फिर लगा कि उसका शरीर सिमटता जा रहा है और वह एक सींक का बना ढांचा रह गया...... नितान्त हल्का, तिनके-सा, हवा में उड़कर भटकने वाले तिनके - सा । फिर कम्पाउंडर का घर में आना-जाना भी उसे खलता है।

इस प्रकार रचनाकार ने रोगी की मनःस्थिति को चित्रित किया है और यह भी बताया है कि जब उसके हाथ से कुछ फिसलता है तो उसकी क्या दशा होती है। जगपती की भी ठीक वही दशा थी ।

4. नारी स्वातन्त्र्य पर प्रकाश डालना

कमलेश्वर की मूल संवदेना भारतीय नारी के साथ है। उसकी सभी कहानियों में नारी सक्षम दिखाई देती है। रचनाकार स्वयं स्वतन्त्र, निर्णायक, स्पष्टवक्ता गुणों से युक्त नारी की कामना करता है। रचनाकार चाहता है कि नारी अपने पैरों पर खड़ी हो ताकि उसे कोई अपने अधीन न कर सके। कहानीकार ने इसलिए अपनी कहानियों में ऐसी ही नारियों को वर्णित किया है जो प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र हो, स्वयं निर्णय लेने वाली हो, पतिव्रता हो इत्यादि।

जगपती जब चन्दा के चरित्र पर उंगली उठाता है तो वह स्वयं यह निर्णय ले लेती है कि वह अपने मायके जा रही है वह जगपती से पूछती तक नहीं है बल्कि सीधे अपना निर्णय सुनाती है- 'तभी चन्दा ने बड़े सीधे शब्दों में कहा, कल मैं गांव जाना चाहती हूँ। चन्दा फिर बोली, मैंने बहुत पहले घर चिट्ठी डाल दी थी, भैया कल लेने आ रहे है।" और जगपती जब उसके चरित्र पर उंगली उठाता है तो वह दृढ़ता से अपना पक्ष रखती हुई कहती है कि "तुमने मुझे बेच दिया।” इसलिए वह ऐसे विवश पति का परित्याग कर रही है।

5. सरकारी अस्पतालों की कार्यशैली का वर्णन

रचनाकार ने राजा निरबंसिया में जगपती के माध्यम से सरकारी अस्पतालों की स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। यहां पर डॉक्टर तो आते नहीं और अस्पताल कम्पाउण्डर के आसरे पर चलते हैं। जगपती की जांघ पर गोली लगने के कारण उसे अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। यहां पर उसकी देखभाल कम्पाउण्डर ही करता है। कहानी के प्रस्तुत शब्दों से अस्पताल की स्थिति का पता चलता है, "कस्बे का अस्पताल था। कम्पाउण्डर ही मरीजों की देखभाल रखते। बड़ा डाक्टर तो नाम के लिए था या कस्बे के बड़े आदमियों के लिए। छोटे लोगों के लिए तो कम्पाउंडर साहब ही ईश्वर के अवतार थे। मरीज़ों की देखभाल करने वाले रिश्तेदारों की खाने-पीने की मुश्किलों से लेकर मरीज की नब्ज़ तक संभालते थे। छोटी-सी इमारत में अस्पताल आबाद था । *

इस प्रकार रचनाकार ने सरकारी अस्पतालों के सच से परिचित करवाया है यहां पर न तो डॉक्टर की व्यवस्था होती है न दवाई की। जहां तक रोगी ज़्यादा आ जाए तो उन्हें नीचे लेटाने से भी परहेज नहीं किया जाता। कम्पाउंडर रोगियों और उनके घरवालों से कैसा भी व्यवहार करें लोग सहन करते हैं। किसके पास शिकायत की जाए कोई सुनने वाला नहीं होता है।

6. ग्रामीणों की गरीबी का यथार्थाकन

रचनाकार की संवेदना उस परिवेश के साथ भी है जिसमें जगपती रहता था। जिसमें उसे कर्ज़ लेने के लिए पत्नी को दांव पर लगाना पड़ा। क्योंकि वह ऐसे गांव से संबंध रखता है जहां पर बहुत गरीबी है कोई किसी की आर्थिक सहायता करने के लिए तैयार नहीं है और न ही काम दे सकता है। रचनाकार ने मैनपुरी गांव की गरीबी वाले परिवेश का वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में किया है- "मुहल्ले के लोग... जो एक-एक पाई पर जान देते है, कोई चीज खरीदते वक्त भाव में एक पैसा कम मिलने पर मीलों पैदल जाकर एक पैसा बचाते हैं, एक-एक पैसे की मसाले की पुड़िया बंधवाकर ग्यारह मर्तबा पैसों का हिसाब जोड़कर एकाध पैसा जोड़कर, मिन्नतें करते सौदा घर लाते हैं, गली में कोई खोंचे वाला फंस गया, तो दो पैसे की चीज़ को लड़-झगड़कर चार दाने ज़्यादा पाने की नीयत से-दो जगह बंधवाते है। भाव के ज़रा से फर्क पर घंटों बहस करते हैं, शाम को सड़ी-गली तरकारियों को किफायत के कारण लाते हैं, ऐसे लोगों से किस मुंह से मांगकर वह उनकी गरीबी के अहसास पर ठोकर लगाएं!" 

इस प्रकार रचनाकार ने जगपती और चंदा के माध्यम से एक कर्ज़दार व्यक्ति की विवशता का वर्णन तो किया ही है उसके साथ ही अर्थ प्रधान इस समाज में परिस्थितियां कैसे व्यक्ति को घेर लेती हैं इसके प्रति भी चिंता व्यक्त की है। रचनाकार ने ऋण के कोढ़ से भी सचेत किया है।

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